Friday, October 5, 2018

मुग्धा:एक बहती नदी (तीसरा अंक)


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राजुल बी.एससी. करने के बाद न जाने किस शहर में  चला गया और मुग्धा भी उस कॉलेज से स्नातक की पढाई करने के बाद स्नातकोत्तर शिक्षा के लिए यूनिवर्सिटी चली आई ..कभी कोई कॉमन फ्रेंड मिलता तो उसके बारे में उड़ती हुई खबरें सुनने को मिलती.. कभी जॉब कर रहा है कभी कोई कोर्स कर रहा है..मुग्धा को अफ़सोस होता कि उसकी मेधा व्यर्थ जा रही है उसमें इंजिनीयर बनने के सभी गुण थे .. बारहवीं कक्षा में ही न जाने कैसे कैसे प्रोजेक्ट बनाता रहता था जो दैनिन्दिन जीवन में उपयोगी होते थे ..किन्तु समय के थपेडों ने न जाने क्या सोचा हुआ था उसके लिए ...

फिर एक दिन एक मित्र के माध्यम से सन्देश आया उसका कि वह मुग्धा से मिलना चाहता है .. मुग्धा को क्या आपत्ति हो सकती थी ..मुग्धा ने तो जैसे कुछ रोकना जाना ही नहीं था .. उसका यही व्यवहार उसे सामाजिक नियम कायदों से अलग करता था .. और शायद यही कारण था उस पर लगे हुए " बदचलन ' के ठप्पे का.. जो " चलन " से हट कर व्यवहार करे वह बदचलन ..!!!

राजुल को क्या बात करनी है इसका जरा भी अंदाज़ा मुग्धा को नहीं था ..

मिलते ही राजुल ने गड़े मुर्दे उखाड़ने शुरू किये ..पुरानी बातों को याद दिला दिला कर उसको गलत ठहराना ...मसलन ..गाने इतनी तेज आवाज़ में क्यूँ सुनती थी ..सबको अपनी ओर आकर्षित करने का तरीका था क्या.. कॉलेज में पढ़ने आती थी कि हँसने ..और तो और पता नहीं कहाँ  से खबर सुन के आया था कि मुग्धा की बदचलनियों  के चलते उसके पापा ने उसकी खूब पिटाई की थी और शर्म के कारण  वे १५ दिन की  छुट्टी ले कर अपने गांव चले गए थे ...मुग्धा से उसने इन सबका जवाब माँगा ..मुग्धा हक्की बक्की सी उसे देखे जा रही थी ..और सोच रही थी कि कितना कचरा भरा है इसके दिमाग में ... राजुल ने दुनिया भर में उसके बारे गढ़ी हुई कहानिया सुन कर कुछ धारणाएं स्थापित कर ली  थी ..जिनको  गलत सिद्ध करने का मुग्धा के पास न तो साधन था और न ही मानस   .. राजुल उससे कहता रहा ..वो सुनती रही और बस यही कहती रही कि जैसा तुम ठीक समझो.. मुझे खुद को साबित नहीं करना है किसी के भी सामने ..मैं जो हूँ वह हूँ ..मेरा परिवार जानता  है कि मैं क्या हूँ उनका विश्वास मेरे साथ है और मुझे किसी की  परवाह नहीं कि कोई मेरे बारे में क्या सोचता है और क्यूँ सोचता है ..

राजुल ने कहा - समाज में रहना है तो उसी के हिसाब से रहना होता है..तुम्हें बदनामी से डर नहीं लगता ? कोई शादी भी नहीं करेगा तुमसे  इस बदनामी के चलते ..

वितृष्णा हो आई मुग्धा को ..किस कुघड़ी  में उसने इससे मिलने के लिए हाँ कह दिया था ..अच्छी खासी सरल ज़िंदगी जी रही है ..कहाँ की गन्दगी भर के ले आया है दिमाग में..

प्रकट में मुग्धा ने इतना ही कहा कि मनगढंत बातों का मेरे पास कोई जवाब नहीं ..तुम चाहो तो सच मानों   वरना मुझ पर यकीं कर लो..तुम्हारी इच्छा ..

और राजुल एक दम से विनम्र हो गया और बोला - बस अब तुमने कह दिया कि सब झूठ है मुझे तसल्ली  हो गयी .. और यह कहते हुए उसने विदा ली मुग्धा से कि अब हम जब भी मिलेंगे अच्छे दोस्तों की तरह मिलेंगे .. सब गलतफहमियां  दूर ..और अब हम परिपक्व हो गए हैं बचकानी बातों पर ध्यान नहीं देना चाहिए ..

मुग्धा ने राहत  की साँस ली ..और राजुल के अपरिपक्व व्यवहार को भी सहज मान के ज्यादा ध्यान नहीं दिया ...

मुग्धा ने सर को झटका दिया ..कॉलेज की यादों में और भी बहुत सी बातें हैं उसे रह रह कर राजुल की बातें ही क्यूँ याद रहती हैं ...सुरभि,मोहित , आस्था और नमिता ..उसकी तो शादी भी तय हो गयी थी बी.एससी. करते करते ..और उसका मंगेतर जब उससे मिलने आता था तो हम सब सहेलियां उसकी कितनी खिंचाई करते थे ..आखिरी बार उन सबसे नमिता की शादी में ही मिलना हुआ था ..२५ साल बाद सबसे मिलना होगा कितना मज़ा आएगा ..मोहित और सुरभि से तो कभी कभी फोन पर बात हो जाती है किन्तु अपनी अपनी दुनिया में उलझे हुए मिलने का मौका मिल ही नहीं पाया ..मोहित ने ही नेट पर से ढूंढ ढूंढ कर अधिकतर दोस्तों के पते ठिकाने मालूम किये हैं और सबको इस शनिवार मिलने का मौका भी उपलब्ध कराया है ..मुग्धा को ऐसा लग रहा था कि वो वही २० साल की तरुणी बन गयी है ...आँखों के सामने सहेलियों के साथ मूवी देखने जाना ..चाट खाना ..कितने मजेदार दिन होते थे वे..उस समय लगता था कि मम्मी लोगों के मजे हैं..हमको तो पढ़ना पड़ता है ..अब एहसास हुआ कि एक पत्नी, एक माँ बनने में कितनी तपस्या और सहनशीलता चाहिए होती है ..विचारों का ताना बाना चलता रहा ,कभी मुग्धा खुद में ही डूबी मुस्कुरा पड़ती कभी उदास हो जाती ..अखिल ने तो उसको छेड़ना भी शुरू कर  दिया था कि अपने पुराने दोस्तों से मिलने से पहले ही यह हाल है..बाद में मुझे तो डर है कि इकलौती बीवी से हाथ न धो बैठूं ...

अखिल लखनऊ  के एक जाने माने मनोचिकित्सक थे ..मानव मनोविज्ञान के गूढ़ रहस्यों को बेहतर तरीके से जानना  समझना उनका पेशा ही नहीं वरन  पैशन था ..और मुग्धा विज्ञान  के क्षेत्र से होते हुए भी साईकोलोजी में बेइंतिहा रूचि रखती थी और दोनों का यही कॉमन इंटरेस्ट उनको आपस में जोड़ने में बहुत मददगार साबित हुआ..मुग्धा के कजिन की शादी में पहली बार अखिल से मुलाकात हुई जो चाचा के दोस्त का लड़का था ..और यंगस्टर्स का अलग ग्रुप बन गया जहाँ उन दोनों ने एक दूसरे को पहचानने में कोई गलती नहीं करी ...और अब एक मैत्रीपूर्ण वैवाहिक जीवन के २० वर्ष पूरे करते हुए मुग्धा कितने ही केसेस में डॉ. अखिल श्रीवास्तव की असिस्टेंट होती है.. और कई बार तो पेचीदा केसेस की जड़ों तक अखिल मुग्धा से विमर्श के कारण ही पहुँच पाता है ..



क्रमशः

Thursday, October 4, 2018

मुग्धा: एक बहती नदी (भाग २)


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कॉलेज  में उसी 'राजुल' को अपने साथ की सीट पर बैठा देख कुछ पल के लिए उसे असुविधा सी महसूस हुई किन्तु 'राजुल' का मुस्कुराता  चेहरा देख उसने खुद को आश्वस्त किया कि अब हम बच्चे नहीं हैं ..और शायद राजुल पुरानी सभी बातें भुला कर एक नयी दोस्ती की  शुरुआत कर सके ..यह सोच कर उसने भी उस मुस्कुराहट का प्रतिउत्तर हलकी मुस्कुराहट से देते हुए पूछ लिया -"कैसे हो ? "

राजुल ने कहा," मैं ठीक हूँ ...तुम ? "

मुग्धा बोली 'मैं भी ठीक हूँ .."

इतने में सर आ गए और क्लास शुरू हो गयी ...

समय अपनी गति से बढ़ता रहा ..पढाई में 'राजुल' और 'मुग्धा ' दोनों ही मेधावी थे ..दोनों एक दूसरे की  यथासंभव सहायता करते और नोट्स का आदम प्रदान करते ..कि अचानक एक दिन मुग्धा ने अपनी किसी दोस्त के जरिये सुना कि राजुल के घर में उसे ले कर बहुत क्लेश हो रहा है ..राजुल की  मम्मी नहीं चाहती कि वह मुग्धा के साथ बात करे ..क्यूंकि मुग्धा एक बदचलन लड़की  है . उनके बेटे की बदनामी मुग्धा के कारण हो रही है... और राजुल की बहन ने भी कहा कि वह नहीं चाहती कि उसका भाई एक कैरेक्टरलेस लड़की से बात करे .लेकिन राजुल मुग्धा से बात करना छोड़ने को तैयार नहीं ...मुग्धा यह सुन के मानों  ज़मीन पर आ गिरी.. राजुल की बहन 'तनुश्री' जो उससे कितनी अच्छी तरह मिलती है.. ढेरों बातें करती है ..पीठ पीछे उसके लिए ऐसा कैसे कह सकती है.. और मुग्धा चरित्रहीन है !! ...क्यूंकि वह बिना किसी पूर्वाग्रह के लड़कों से बात कर पाती है.. लेकिन  सामने सामने शालीन और छुईमुई बने रहने  और छुप छुप कर लड़कों से मिलने वाली लडकियां बहुत सुसंस्कृत और चरित्र वाली हैं !! क्या है कैरेक्टर की परिभाषा?? मुग्धा को घर से किसी बात के लिए रोक टोक नहीं थी और इसीलिए वह एक जिम्मेदार युवती थी हर किसी से सहजता से मिलना बात करना बिना किसी कंडिशनिंग के उसके व्यक्तित्व में शुमार था और शायद यही उसे बाकी लड़कियों से अलग करता था ...तथाकथित चरित्रवान लड़कियों से ...

मुग्धा अपनी मम्मी से कुछ नहीं छुपाती थी... उसका मानसिक और भावात्मक संबल उसका परिवार था.. उसने यह सब कह डाला अपनी मम्मी से... और एक बार फिर राजुल और उसकी दोस्ती पर ताले लग गए ...मुग्धा ने अपनी तरफ़ से राजुल से बात करना बंद कर दिया..

ऐसे में एक दिन मुग्धा ने पाया कि किसी दूसरे कॉलेज का एक मवाली सा लड़का रोज ही उसका पीछा करता है जब वह कॉलेज आती है ..और ३-४ दिन बाद तो उसने उसका रस्ता रोक कर बात करने की कोशिश करी .. मुग्धा अकेली आती  थी अपनी साइकल पर ..वो बुरी तरह घबरा गयी ..और उसे एकमात्र सहारा राजुल ही दिखा जिससे वह मदद मांग सकती थी . किन्तु जब उसने राजुल से बताया तो उसने कहा- " अपना मतलब पड़ा तो मुझसे बात करने चली आई..!!

मुग्धा ने जवाब दिया , "मुझे अकेले आने में डर लगता है ..अगर तुम मेरे हॉस्टल से कॉलेज तक मेरे साथ आओ तो वह लड़का एक दो दिन में पीछा करना छोड़ देगा ."

राजुल ने व्यंग से कहा ,"क्यूँ ? मैं क्यूँ आऊँ  ? तुमने ही उसे सिग्नल दिए होंगे ..तभी तो वो आता है तुम्हारे पीछे ..वैसे तो मुझसे बात नहीं करती और अब जरूरत पड़ने पर मदद मांगने चली आई

मुग्धा हतप्रभ सी राजुल को देखती रह गयी...अफ़सोस हुआ उसे कि क्यूँ इतना कमजोर समझा उसने खुद को जो इस घटिया इंसान से मदद मांगने चली आई ..अपनी जंग हर किसी को खुद ही लड़नी होती है ..खुद ही सोचेगी वह कुछ और .. अब इस राजुल के सामने कभी हाथ नहीं फैलाएगी मदद के लिए .. उसे लगा था कि जो कुछ भी पुराने सम्बन्ध रहे हैं  उनके नाते ही राजुल को उसकी सुरक्षा की  चिंता होगी ..किन्तु उसकी सोच जान कर उसे बहुत अफ़सोस हुआ ...और उस दिन के बाद मुग्धा के लिए राजुल के अस्तित्व का कोई मतलब नहीं रह गया था ..




क्रमशः

Wednesday, October 3, 2018

मुग्धा -एक बहती नदी


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(धारावाहिक कहानी -प्रथम अंक)
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मुग्धा बहुत उत्साहित थी . अगले शनिवार को उसके ग्रेजुएशन  बैच का  गेट टुगेदर था .२५ साल ..ओह .!! कितना लम्बा अरसा बीत गया ..२५ साल ऐसा लग रहा है बीच में से हवा के झोंके  के साथ उड़ कर कहीं चले गए हैं और मुग्धा वापस अपने कॉलेज के दिनों में पहुँच गयी ..

कॉलेज का पहला दिन..पहली बार रंगीन कपड़ों में पढने आना ..बड़े होने का एहसास और स्वयं सबसे जूनियर होने का एहसास दोनों ही एक अजब सी मनोस्थिति बना दे रहे थे मुग्धा के लिए ..बारहवीं तक सह-शिक्षा स्कूल में पढने वाली  बिंदास मुग्धा इस समय सहमी सहमी सी किसी जाने पहचाने चेहरे की तलाश में कोरिडोर में बढ़ी जा रही थी . नोटिस बोर्ड पर लगे क्लास शेड्यूल के अनुसार रूम नंबर ढूँढने में उसे दिक्कत नहीं हुई ..बी.एससी. प्रथम वर्ष की  कक्षा पहले तल पर थी ..जब मुग्धा क्लास में पहुंची तो लगभग सभी सीट्स भर चुकी थी ..तीसरी पंक्ति में एक सीट खाली देख मुग्धा वहीं जा कर बैठ गयी ...और उसे एहसास हुआ कि उसके बराबर में बैठा हुआ छात्र लगातार उसे देख रहा है.. उसने अचकचा कर उसकी तरफ देखा तो हतप्रभ रह गयी.."राजुल" और यहाँ ..!!!

और पिछले ४ साल की  घटनाएं उसकी नज़रों के सामने दौड गयी ..नवीं कक्षा में पापा के ट्रान्सफर के साथ ही सिन्हा अंकल का भी ट्रान्सफर उस प्रोजेक्ट पर हुआ था जो अभी शुरू ही हुआ था ..गर्मियों की छुट्टियाँ पहाड के समान हो गयी थी ..जब तक स्कूल न खुले तब तक कहाँ मन लगाये मुग्धा ..कोई संगी साथी नहीं .. ऐसे में सिन्हा अंकल का आना और उनके दो हमउम्र बच्चों का साथ बियाबान में फूल खिलने के समान था .. सिन्हा अंकल  की बड़ी बेटी तनुश्री मुग्धा से दो साल बड़ी थी और उनका बेटा राजुल मुग्धा के ही बराबर .. मुग्धा को तो मानो  पंख मिल गए .. सारे सारे दिन तीनो की  बैठक जमती ..कभी ताश कभी कैरम ..कभी लूडो ..और शाम को लंबी  दूरी का टहलना .. तीनो की खूब जमती थी एक दूसरे से ..' राजुल ' जब देखो तब टांग खिंचाई करता रहता था मुग्धा की.. और संवेदनशील मुग्धा रो पड़ती थी..फिर राजुल उसको घंटो मनाया करता था ..दोनों का एडमिशन भी एक ही स्कूल में हो गया था ..तनुश्री का स्कूल दूसरा था ..लेकिन जाते तीनो एक ही बस से थे .. बचपन की मासूमियत को झटका तब लगा जब एक दिन मुग्धा की मम्मी ने उसे कहा कि  वो राजुल के साथ खेलना बंद कर दे...और दुनिया की ऊँच  नीच समझा बुझा कर यह भी बताया कि राजुल की मम्मी नहीं चाहती कि वह लड़कियों के साथ खेले और जब उन्होंने राजुल को मना किया तो राजुल ने साफ़ इनकार कर दिया कि वह मुग्धा के साथ खेलना नहीं छोड़ेगा ..इसलिए उन्होंने मुग्धा को समझाने के लिए कहा है ..मुग्धा मान गयी और उसने राजुल से बात करना बंद कर दिया ...दो मासूमों की मित्रता दुनियादारी की भेंट चढ गयी .. और उसकी प्रतिक्रिया राजुल पर बेतरह उलटी हुई.. उसने मुग्धा की हर बात पर नज़र रखना शुरू कर दिया .. वह किससे  बात कर रही है ..कैसे बात कर रही है .. कैसा करना चाहिए ,कैसा नहीं करना चाहिए ....और जब तब उसके व्यवहार पर आक्षेप लगाने उसके घर आ कर उसको दो चार सुना जाता ..मुग्धा को एक हमउम्र भाई की कमी महसूस होती थी और इस तरह का व्यवहार उसे एक सुरक्षा का एहसास कराता था जो शायद बालमन की सहज अनुभूति थी ...जो भी रहा हो दोनों के ही मन में एक दूसरे के लिए स्नेह और अपनापन था  और दुनियादारी निभाने के लिए वे आपस में बात नहीं करते थे .. हालांकि स्कूल आते जाते समय या क्लास में कभी नज़रें मिल जाती तो एक स्नेहयुक्त मुस्कुराहट दोनों के ही चेहरों पर आ जाती थी ..राजुल के तमाम आक्षेपों के बावजूद मुग्धा के मन में उसके लिए कड़वाहट नहीं थी..

समय बीतता गया ... राजुल  की पसेसिवनेस  उसे समय असमय मुग्धा पर कटाक्ष करने  को प्रेरित करती रहती थी ..किन्तु मुग्धा ने उसे कभी अहम् का मुद्दा नहीं बनाया ..किन्तु  धीरे धीरे उसके स्नेह और ममत्व के भाव कम होते चले गए और 'राजुल' उसके लिए सिर्फ एक पूर्व परिचित बन कर रह गया ...



क्रमश:

Tuesday, September 25, 2018

बेगम का जन्मदिन उर्फ़ मुल्ला का रोमांस


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उम्र के साथ कुव्वत बदलती है, हालात भी बदलते हैं,,,,मगर इंसान की तमन्नाएँ नहीं बदलती. बदले भी कैसे....इल्मी कहते कहते थकते नहीं....काहे के बूढ़े हो गए,,,,बूढ़ा होना महज एक दिमागी ख़याल है.....हमें सोचों से हमेशा जवान बने रहना चाहिए. यही बात जब अंग्रेजी में कही जाय  तो और दमदार हो जाती है, जैसा कि अमूमन देखा जाता है.
कहा जाता है, " To be young means living state of mind."....और यही तो हुआ मुल्ला नसरुदीन के यहाँ कल ही.

मुल्ला नसरुदीन की बेगम साहिबा 'लाल बीबी'  की साल गिरह थी 2 अक्टूबर को. कहा करती है, लोग गा गा के बावळे हुए फिरते हैं, आज के दिन दो फूल खिले थे जिनसे महका हिन्दुस्तान." अरे भाई 2 अक्टूबर महज़ मोहनदास करमचन्द गांधी और लाल बहादुर शास्त्री का ही हैप्पी बर्थडे नहीं, इसी दिन यह लाल बेगम उर्फ़ लैला जान भी इस जमीन पर नमूदर हुई थी. सीनियर सिटीजन होने के बावज़ूद भी बच्चों की मानिंद बहुत एक्साईंटेड होती है हमारी लैला भाभी अपने हैप्पी बर्थडे के लिए.

हाँ तो किस्सा यह हुआ कि 1 अक्टूबर की रात,,,,घडी के दोनों कांटे जवान मोहब्बत करने वालों की तरह मिले, बारह बजे,,तारीख बदली,,,नसरुदीन ने लैला भाभी से कहा, "मुबारक हो बेगम साहिबां, साल गिरहा मुबारक हो".
मुल्ला का यह बोलना नेताजी याने मुलायम सिंह यादव स्टाइल में था.
'मुबाअक हो सा' गिरा' टाइप्स.

बेगम बोली, मियाँ आज सूखे सूखे मुबाअकबाद से काम नहीं चलने का...याद करो वो जमाना जब तुम मुझ से बड़ी मोहब्बत किया करते थे,,,,कभी उंगली,,,,,कभी कुछ,,,,,,ऐसा काटते थे,,,,,बड़ी लुत्फ़ वाली आह निकलती थी,,,नीले नीले निशान कायम हो जाते थे.

मुल्ला भी मूड में आ गया था. बोला बेगम नीले निशान पर याद आया.....अर्ज़ किया है :

"क्या क़यामत है कि आरिज़ उनके नीले पड़ गए,
हमने तो बोसा लिया था ख़्वाब में तस्वीर का !!"

शायरी के दौर ने जरा बेगम को और डिमांडिंग बना दिया.
करने लगी इसरार, मुल्ला आज मेरी सालगिरह है,,,आज तो तुम को मेरी उंगली काटनी ही होगी.

मुल्ला बोला, काहे रात ख़राब कर रही हो नींद आ रही है, सो जाना चाहिए. कल देखेंगे.

लैला बेगम को कल कहाँ, हियर एंड नाउ की थ्योरी सुनी हुई.
बोली ना आज और अभी.

मुल्ला को मज़बूरन हामी भरनी पड़ी. बिस्तर से उठा और वाशरूम की जानिब मुखातिब हुआ.

बेगम बैचैन,,,,पूछे,,,,मुल्ला कहाँ चल दिए,,,काटो ना.

नसरुदीन बोला, "बेगम ज़रा दांत तो ले आऊं."

😁😁😁😁😁😁😁😁😁😁😁😁😁😁😁😁😁😁

Wednesday, May 25, 2011

मुल्ला जी का लाइन में लगना

अक्सर देखा गया है कि हम लोग जो भी देखते, सुनते ,पढ़ते हैं उसका अर्थ अपने ही विचारों के अनुसार लगा लेते हैं जैसा उस दिन हमारे मुल्ला जी के साथ हुआ ..

हुआ यूँ कि एक दिन विनेश जी ने देखा कि मुल्ला जी बस स्टेंड पर बस का टिकेट लेने के लिए लाइन में लगे हुए हैं ..विनेश जी चौंक गए कि ये अचानक से मुल्ला कहाँ जा रहा है !! गए लपकते हुए मुल्ला जी के पास और बोले - यार मुल्ला कहाँ की तैयारी है ?

मुल्ला जी बोले - अरे मास्टर ! अच्छा हुआ तू मिल गया, अभी मैं तेरे ही बारे में सोच रहा था कि कैसे खबर करूँ तुझे ...

विनेश जी बोले - क्या हुआ भाई ? ऐसी क्या ख़ास बात हो गयी ?

मुल्ला जी बोले - देखो ना ये हमारी सरकार ..हम जैसे लोगों के लिए कितनी सुविधाएं मुहैया कराती है ..अब तो हम जैसों के लिए बस टिकेट काउँटरस पर भी इंतजाम कर दिया है ..मैं बस तुझे ही याद कर रहा था ..चल आजा तू भी लग जा लाइन में ..

विनेश जी बोले - लेकिन यार लाइन में क्यूँ लगा है तू ..कहाँ जाना है तुझे ..?

मुल्ला जी बोले - जाने का तो पता नहीं ..जहाँ भेज दिया जाएगा चले जायेंगे अपन का क्या .. पर लाइन में तो लग ना तू ..

विनेश जी बड़े असमंजस में , बोले - मुझे कहीं नहीं जाना ..मैं क्यूँ लगूं लाइन में? और तू भी कैसी बहकी बहकी बातें कर रहा है ..अरे टिकेट लेने से पहले ये तो पता होना चाहिए कि कहाँ जाना है ...

मुल्ला जी बोले - अरे मास्टर ..बड़ा पढ़ा लिखा बनता है ..हर समय ज्ञान की बातें .. जरा आँखें खोल के पढ़ भी लिया कर कि कहाँ क्या लिखा है .. देख टिकेट विंडो के ऊपर क्या लिखा है ...

विनेश जी ने टिकेट विंडो पर देखा तो वहां दो बोर्ड लगे थे एक ही सीध में

" महिलाओं के लिए "..." कृपया लाइन में आयें "

और हमारे मुल्ला जी उसे एक साथ पढ़ गए थे ..:) :) :)

Wednesday, March 30, 2011

मुल्ला नसीरुद्दीन की धारणा

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इन्सान अपनी कमाई हुई , जुटाई हुई या उधार ली हुई धारणाओं में जीने का आदी है .कहीं कुछ पढ़ लिया या किसी ने कुछ किसी के बारे में बता दिया तो बना ली धारणा अपने मन- मस्तिष्क में और फिर वह धारणा बदलना कई बार नामुमकिन सा हो जाता है. हर कोई अपनी धारणा को सही मान कर दूसरे को गलत साबित करने पर तुल जाता है और नतीजा होता है तर्क-कुतर्क ..अपनी गढ़ी हुई परिभाषाओं के मुताबिक हालात को उसी खांचे में फिट करने का रवैय्या होता है हम सभी का मगर हमारे मुल्ला जी जैसे जागरूक इन्सान अपने तुज़ुर्बों पर ही भरोसा करते हैं ..किसी के कहे सुने से नहीं उनकी धारणाएं अपने खुद की भोगी हुई हकीक़तों पर डिपेंड करती हैं अब पिछली होली का ही किस्सा सुनिए ..


मुल्ला जी अपने यार दोस्तों के घर खूब पकवान उड़ा कर आये .. अपने बूते से ज्यादा दारू, गोश्त और मिठाईयां भर ली पेट में .. कौन रोज रोज मौका मिलता है ..नोर्मल दिनों में तो दोस्त लोग दूर से देख कर दरवाजा बंद कर लेते हैं त्यौहार पर तो लिहाज करना ही पड़ता है उन्हें ..तो मुल्ला जी ने भी मौके का फायदा उठाया और बेहिसाब पेट भराई कर ली .कुदरतन उनके नाज़ुक पेट ने जवाब दे दिया .. मुल्ला जी टायलेट के चक्कर लगते लगते अधमरे हो गए ...और आखिरकार उन्होंने बिस्तर पकड़ लिया ..घर में कोहराम मच गया ..बीवी और आधा दर्जन बच्चे उनके बिस्तर को घेर कर उनके चुसे गन्ने से जिस्म को यूँ निहार रहे थे जैसे कि उनके आखिरी दीदार कर रहे हों ..तभी किसी दोस्त ने डॉक्टर को बुलाने की सलाह दे डाली ...मुल्ला ने बेहोशी की सी हालत में सुना कि डॉक्टर कह रहा था आपने मुझे बुलाने में बहुत देर कर दी.. मुल्ला जी तो अब चंद घंटों के मेहमान हैं ..छ: बजते बजते दुनिया से कूच कर जायेंगे ..रोना पीटना मच गया साहब .. मुल्ला जी की बेगम गाली दे दे कर मुल्ला को कोसती .." इतना मना किया था मरदूद को , इस भकोसने की आदत को छोड़ने के लिए कितनी बार समझाया मरे को लालच लगा था .हाय!! मैं इन नासपीटे छ: बच्चों के साथ कहाँ जा कर मरूंगी .. मेरी तो जिनगी बरबाद कर दी ..हाय ..हाय !! " ..छाती पीट पीट कर मुल्ला की बेगम ने वो दहाड़ें लगायी कि पूरे मोहल्ले में यह खबर फ़ैल गयी कि मुल्ला जी खुदा को प्यारे हो गए .. बच्चे भी सातवें सुर में अपनी अम्मी से छेखने चिल्लाने का मुकाबला कर रहे थे ..पूरा माहौल मातमी हो गया था .. मोहल्ले वाले भी आ करतसल्ली देने लगे और अपनी हमदर्दी ज़ाहिर करने लगे .." अच्छे आदमी थे मुल्ला जी .. इतने शरीफ कि बस पूछो ही मत ..क्या मजाल जो कभी किसी को बुरी नज़र से देखा हो .."

मुल्ला जी के कानों में सब बातें पड़ रही थी .. मुल्ला जी हैरान थे कि ये मोहल्ले वालों के सुर अचानक बदल कैसे गए ..हर जगह घुड़की खाने वाला मुल्ला आज इतना शरीफ कैसे दिख रहा है इनको.. और तब मुल्ला को एहसास हुआ कि मुल्ला जी खुदा को प्यारे हो गए हैं .. और इसीलिए इन्सान के भी प्यारे हो गए हैं ..इन्सान ऐसी हिमाकत कैसे कर सकता है कि खुदा को प्यारे हुए इन्सान की बुराई करे ..पूरा माहौल जोर शोर से एलान कर रहा था कि मुल्ला जी फौत हो गए हैं हैं ..मुल्ला जी भी आँख बंद करके पड़ गए और उन्होंने मान लिया कि जो कुछ मैं देख सुन रहा हूँ,वो मेरा जिस्म छोड़ चुकी मेरी रूह ही देख सुन रही है .. ..और मुल्ला जी ने कुरान की आयतें बुदबुदाना शुरू कर दिया ..और बीवी से कहा कि मौलवी को बुला लो ..बीवी ने घुड़क दिया कि मर कर भी चैन नहीं है तुम्हें ..चुपचाप पड़े रहो अब तुम मर चुके हो जो करना है हम कर लेंगे ..
मुल्ला जी बेचारे चुप हो कर पड़ गए ..धीरे धीरे सारी रस्में होने लगी मुल्ला जी की मय्यत तैयार हुई ..जब उनके अंतिम संस्कार के लिए मोहल्ले के कुछ लोग उनके पास आये तो उनको एहसास हुआ कि मुल्ला जी की सांसें तो चल रही हैं ..उन्होंने कहा कि मुल्ला जी तो जिन्दा हैं भाई.. इनको कैसे दफना सकते हैं हम
डॉक्टर से पूछा गया ..डॉक्टर बोला-" हाँ भाई मुल्ला जी तो जिन्दा हैं ..मौत की घडी टल गयी ..मुल्ला जी बच गए" ..मुल्ला जी को कहा गया कि आप बच गए बधाई हो ..मगर मुल्ला जी तो महसूस कर चुके थे मौत का.. बोले नहीं भाई मैं तो मर चुका हूँ अब मेरा इस दुनिया से कोई नाता रिश्ता नहीं .."
सब बहुत हैराँ परेशान हो गए ..मुल्ला जी ना खाना खाएं ना दवा पियें ..बार बार कहें कि मरे हुए आदमी को क्या खाना और क्या दवा ..मैं तो मर चुका हूँ ..किसी को समझ नहीं आ रहा था कि उनको कैसे यकीन दिलाएं कि वे जिन्दा हैं ..मुल्ला को आईना दिखाया कि देखो तुम्हारा अक्स दिख रहा है ना इसका मतलब तुम जिन्दा हो ..लेकिन मुल्ला बोले कि यह तो मेरा जिस्म है मेरी रूह इसको देख रही है जो अलग हो चुकी है इस जिस्म से ...ये तो मुल्ला के मरने से भी ज्यादा बड़ी मुश्किल हो गयी कि मुल्ला को उसके जिन्दा होने का यकीन कैसे दिलाया जाए .. आखिरकार डॉक्टर साहब को एक तरीका सूझा ..उन्होंने मुल्ला से पूछा कि मुल्ला तुम जानते हो ना कि मरे हुए आदमी के जिस्म को काटो तो खून नहीं निकलता ..मुल्ला बोले हाँ साहब बिलकुल जानता हूँ ..तो डॉक्टर साहब ने मुल्ला के हाथ में नश्तर से एक घाव किया और उसको आईने में दिखते अक्स से टपकता हुआ खून दिखाया ..और कहा देखो मुल्ला तुम्हारे जिस्म से खून टपक रहा है ..इसका क्या मतलब हुआ ??

मुल्ला बोले- हाँ डॉक्टर साहब ..बिलकुल सही ..मेरे जिस्म से खून टपक रहा है ..इसका ये मतलब हुआ ..कि मरे हुए आदमी के जिस्म से भी खून निकल सकता है.. अभी तक आप सबको ग़लतफ़हमी थी कि मरे हुए आदमी के जिस्म से खून नहीं निकलता ..मगर आज यह साबित हो गया है कि मुर्दा जिस्म से भी खून निकल सकता है ...डाक्टर साहब इस पर तफसील से लिखिए और मेडिकल इंस्टिट्यूट में पेपर पेश कीजिये ..आप भी क्या याद रखेंगे कि मरते मरते भी मुल्ला एक सच को जग ज़ाहिर कर गया ..!!!

Sunday, March 6, 2011

भय का भूत -मुल्ला नसीरुद्दीन का दर्शन

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एक बार की बात है ,मुल्ला जी अपने यार दोस्तों के साथ फिलम का आखिरी शो देखने के बाद और चिलम गांजे केसुट्टे लगाने के बाद अफीम की पिनक में घर की तरफ़ जा रहे थे ...अपने में मगन मुल्ला फिलम का कोई गीतगुनगुनाते हुए जा रहे थे .."मुल्ला बदनाम हुआ फजीहत तेरे लिए " टाइप .....इतने में उन्हें लगा कि कोई उनकापीछा कर रहा है ..चौंक के इधर उधर देखा तो नीम अँधेरा .. हाथ को हाथ न सूझे ..सिहरन सी दौड गयी मुल्ला केपूरे शरीर में...

झींगुरों की आवाज़. कहीं कहीं मेंढकों की टर्राहट और अँधेरे में चमकते जुगनुओं की रोशनी में पेड़ों के साये.. बहुतभयावह लग रहे थे ...मुल्ला की टांगें कांपने लगीं ..तभी उनके कानो में कुछ आवाजें पड़ी... दिल की धडकन कोरोकने की नाकाम कोशिश करके मुल्ला ने कान लगा दिए उन आवाजों पर...ऐसा लग रहा था की २०-२५ लोगों काझुण्ड उनकी तरफ़ बढ़ा आ रहा है... आवाज़ के लहकने से अंदाज़ा लग रहा था कि सबने दारू चढाई हुई है... मुल्लाने आँखें गड़ा गड़ा के देखा .. अब तक मुल्ला की नज़रें इस अँधेरे की अभ्यस्त हो चली थी... मुल्ला से १५-२० हाथकी दूरी पर
कुछ लोग सर पे साफा बांधे हुए ..कुछ एक के हाथों में बन्दूक ..हँसी ठठ्ठा करते चले आ रहे हैं..मुल्ला जी ने तुरंतनिष्कर्ष निकाला ..भैया आज तो फँस गए तुम "डकैतों' के चंगुल में... डर के मारे मुल्ला के होश फाख्ता हो गए..

वैसे लुटे जाने लायक कोई वस्तु मुल्ला के पास नहीं थी.... यहाँ तक कि अचकन भी उधार की पहने हुए थे मुल्ला.. लेकिन डकैत तो डकैत ... न उनका धर्म न ईमान.. गोली से उड़ाते देर नहीं लगेगी ..मुल्ला को अपनी कमसिन बीवीऔर ५ अदद बच्चों का खयाल आया .. और आनन फानन में मुल्ला सड़क के किनारे बनी एक चारदीवारी कोफलांग गए ..उनको चारदीवारी फलांगते उस झुण्ड में से एक आदमी ने देखा... और उनकी झोला सी अचकन को नाजाने क्या समझ के उसकी भी घिघ्घी बंध गयी.. हकलाते हुए उसने अपने बाकी साथियों को बताया .. सभी हल्लामचाते हुए उस चारदीवारी को कूद गए ...एक के पास दियासलाई थी..उसने एक तीली जलाई तो पाया कि वो एककब्रिस्तान है ...

अपने को बहुत दिलेर कहने वालों की भी रीढ़ की हड्डी सुन्न होने लगी...मुल्ला को काटो तो खून नहीं ..आँख बंदकरके मुल्ला ने कुरान की आयतें पढ़ना शुरू कर दिया.... झुण्ड में सबने एक दूसरे को चुप रहने का इशारा कियाऔर कहा देखो..कोई मुसलमान है .... इतने में मुल्ला जी ने महावीर विक्रम बजरंगी... बोलना शुरू कर दिया ..झुण्डमें सभी ने एक दूसरे को देखा और बोले नहीं भाई ये तो हिंदू है... मुल्ला हमारे धर्म निरपेक्ष ..ऐसे बुरे समय में वैसेभी कोई रिस्क नहीं लेना चाहते थे ...उन्होंने नानक नाम जहाज है बुदबुदाना शुरू किया और अंत में ..ओ' जीससओ' मेरी ...पढते हुए.. सीने पर क्रॉस का चिन्ह भी बना लिया ..

ये सब सुन कर उस पूरे समूह में भय की लहर दौड गयी... उनको लगा कि आज तो कोई आत्मा भटक रही है यहाँआत्मा का कोई धर्म नहीं होता ..ऐसा सभी ने सुना था ) ..माचिस की तीलियां जला जला कर अब खतम होने कीओर थी... उधर हमारे मुल्ला जी भी अँधेरे में छुपने की कोशिश में थे कि अचानक एक ताज़ी खुदी कब्र में जा गिरे.. जिसमें अगले दिन सुबह ..उनके पड़ोसी लड्डन मियां के शरीर को दफनाया जाना था जिनका आज ही इन्तेकालहुआ था ...अब मुल्ला जी डर वर सब भूल गए और चिल्लाने लगे जोर जोर से.... बचाओ बचाओ!!....

तभी उस भीड़ में से भी एक शरीर धडाम से मुल्ला जी के ऊपर आके गिरा ..और वो उन्हें मरा हुआ शरीर समझचिल्लाने लगा ..अचानक मुल्ला जी बोले- अरे मियाँ जुम्मन...तुम यहाँ ?तुम तो कल्लन मियाँ की शादी में गए थेन बाराती बन कर !!!

जुम्मन भाई भी मुल्ला जी को पहचान गए .. बोले- वहीँ से तो लौट रिये हैं हम सब.... मुल्ला तुम यहाँ क्या कर रहेहो....

मुल्ला जी ने कहा ..भाई जो तुम कर रहे हो... तुम्हारे कारण मैं और मेरे कारण तुम इस कब्र में पड़े हैं.... !!!

मुल्ला जी ने बातों ही बातों में एक गूढ़ दार्शनिक रहस्य प्रस्तुत कर दिया था

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