Sunday, March 28, 2010

है तुझे भी इजाज़त....(तीसरी किस्त )


संगीत संध्या के कार्यक्रम में सिर्फ ४ दिन बचे थे जब संजय का फ़ोन आया कि वो भारत आ रहा है एक महीने की छुट्टी पर ॥और इतेफाक से उसके आने की तारीख वही थी जिस दिन रेवती का संगीत कार्यक्रम था ..सुबह की फ्लाईट से दिल्ली आ कर शाम तक वो पहुँच जाएगा रूडकी ..सुनते ही रेवती को सबसे पहला खयाल अपने संगीत कार्यक्रम का हो आया ..अब क्या होगा..उसी दिन शाम को संजय आयेंगे तो वो कैसे जा पाएगी और संजय को तो उसके बारे में कुछ पता भी नहीं है कि वो यह सब शौक रखती है ..मन दुविधा में फँस गया.. संजय ये बात पसंद नहीं करेंगे कि उनके आने पर वो घर पर नहीं है..इसी उधेड़बुन में २ दिन निकल गए ..रियाज़ भी बंद हो गया ..हर समय सोचों में घिरी रहती ..मन को जैसे किसी ने पिंजड़े में बंद कर दिया हो और वह छटपटा रहा हो बाहर निकलने के लिए ..स्वयं की पहचान की राह में एक पत्नी की पहचान बाधाएं उत्पन्न कर रही थी .एक मन होता की संजय को बता दे फिर लगता कि उनकी प्रतिक्रिया अगर एक दम नकारात्मक आई तो ..इन्ही सब सोचों में डूबी थी कि स्नेहा का फ़ोन बजा .उधर से चहकती हुई आवाज़ सुन कर मन पर जैसे ठंडी फुहारें पड़ गयी ..पर माँ की उदास आवाज़ स्नेहा से छुप नहीं सकी..उसके पूछने पर रेवती ने अपनी उधेड़बुन स्नेहा को बता दी..उसने कहा वह इस कार्यक्रम में शिरकत करना चाहती है पर डरती है कि संजय को कह देने के बाद उसने मना कर दिया तो वह बिलकुल ही नहीं जा पाएगी और बिना बताये जाने में संजय के आने पर घर पर नहीं रह पाएगी ..स्नेहा थोड़ी देर सोचती रही ..और फिर उसने कहा कि मैं पापा को दिल्ली रोक लेती हूँ मेरे साथ समय बिताने के लिए और वह रूडकी अगले दिन चले जायेंगे ..सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी ..रेवती को भी ये आइडिया पसंद आ गया ..और स्नेहा ने संजय को फ़ोन मिला कर कहा "पापा,माँ से पता चला की आप ६ तारीख को दिल्ली आ रहे हो.. शनिवार है ना उस दिन..मैं फ्री होती हूँ..उस दिन आप यही रुक जाओ ना कब से आपके साथ तसल्ली से मिलना नहीं हो पाया है..सोमवार से मेरे टेस्ट हैं वरना मैं रूडकी चलती ..और हम तीनो साथ समय बिताते..पर अब आप एक शाम तो मेरे साथ बिता ही सकते हो..रूडकी आप इतवार को चले जाना "..संजय भौंचक सा सुनता रहा ..बेटी की ओर से ये आग्रह !!!!.. पर उसे भी अच्छा लगा ये सोचना कि वो स्नेहा के साथ समय बिताएगा .. ज़िन्दगी में भागते भागते शायद वो भी अब अपने बसेरे को मिस करने लगा था तो उसने हामी भर दी ..स्नेहा ने रेवती को खबर कर दी और रेवती के मन से धुंध हट गयी और वो उसी ग़ज़ल को गुनगुनाते हुए काम में जुट गयी जिसे उसने चुना था संगीत संध्या में गाने के लिए ..."रंजिश ही सही ..दिल ही दुखाने के लिए आ ..आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ " ..
शनिवार की शाम रेवती अपनी मनपसंद ढाकाई साड़ी में गरिमापूर्व व्यक्तित्व के साथ निश्चित स्थान पर पहुँच गयी..बहुत बड़ा आयोजन था देख कर रेवती को घबराहट होने लगी.. स्कूल कॉलेज में हुए फंक्शन्स में उसने स्टेज पर गाया था पर अब २० साल के बाद इतने बड़े जनसमूह के सामने गाने में उसे पसीने छूटने लगे ..स्नेहा की कमी उसे खलने लगी.. काश वह साथ होती ..कांपते कदमो से उसने प्रबंधकों को जा कर अपना परिचय दिया ..प्रबंधकों ने उसकी मुलाकात सुश्री चंद्रप्रभा जी से करवाई..रेवती ने उनका नाम काफी सुन रखा था स्थानीय समाचार पत्रों में उनका नाम प्राय: तीसरे दिन किसी ना किसी कार्यक्रम के सम्बन्ध में आता ही रहता था ..कभी कभी उनकी लिखी कहानिया और कवितायेँ भी रविवासरीय परिशिष्ट में उसने पढ़ी थी .उनको अपने सामने देख वह अभिभूत हो उठी और उनके व्यक्तित्व से बेहद प्रभावित..स्नेह से ओतप्रोत उनका चेहरा उसकी सारी घबराहट को दूर कर गया.. चंद्रप्रभा जी ने उससे परिचय का आदान प्रदान किया और उसको उस दिन कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले बाकी कलाकारों से मिलवाया ..१०-१५ मिनट में ही रेवती खुद को वहां का हिस्सा समझने लगी थी..
रेवती का नंबर जब तक आया तब तक उसकी सारी घबराहट आत्मविश्वास में बदल चुकी थी और उसने अपनी पूर्ण क्षमता के साथ ग़ज़ल प्रस्तुत करी..ग़ज़ल के शब्दों में जैसे उसके दिल का दर्द उतर आया था " आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ ..." सभी श्रोता उसके गायन में इतना डूब गए की हर किसी की आँखें नम थी ..
चंद्रप्रभा जी ने तो स्टेज से उतरते ही उसे गले से लगा लिया और कहा " कहाँ छुपी थी अब तक तुम ? ॥इतनी मीठी आवाज़ से अभी तक सुरों की दुनिया के प्रशंसकों को महरूम रखा ..." रेवती सकुचा गयी उसने तो कभी सोचा ही नहीं था की इतनी प्रशंसा की हक़दार है वह ...

(क्रमश:)

Saturday, March 27, 2010

है तुझे भी इजाज़त--(दूसरी किस्त)

रेवती कि ज़िन्दगी ने जैसे एक नया मोड़ ले लिया था . जहाँ पहले उसका समय काटे नहीं काटता था अब जैसे हर क्षण चुरा चुरा के अपने लिए जीना चाहती थी.सुबह आँख खुलने के साथ ही स्वयं के साथ समय बिताना शुरू होजाता ..मार्निंग वाक के बाद हल्का फुल्का योगा करके स्नेहा को स्कूल भेजती ..नौकरी ,क्यूंकि पहले समय काटने का एक साधन थी इसलिए अब उसने उसे छोड़ दिया ..उसके बाद घर के रोज़मर्रा के कामों से निवृत हो लाइब्रेरी चली जाती..कुछ पत्रिकाएँ उलटती पलटती और कुछ अपने मन कि पुस्तकें ले आती घर पर पढने के लिए ..शाम को स्नेहा के साथ समय बिताना उसे बहुत पसंद था..एक सितार ले आई थी वह और उस पर सुरों की साधना करना उसे खूब भाता था ..दिन प्रति दिन रियाज़ करने से गले में माधुर्य बढ़ता जा रहा था ..ज़िन्दगी को जैसे एक दिशा मिल गयी थी.. संजय का अस्तित्व उन दोनों के लिए बस एक नाम का ही रह गया था.. संजय भी उनसे मानसिक या भावनात्मक रूप से जुड़ा नहीं पाता था खुद को..उन लोगों को पैसे भेज कर ही जैसे उसके कर्त्तव्य की इतिश्री हो जाती थी..पहले जहाँ उसके साल में चक्कर भारत के लगते थे अब वो ही चक्कर तक सिमट कर रह गया था .रेवती ने सुना था कि संजय वहां एक शादीशुदा ज़िन्दगी बसर कर रहा है..पर वो जैसे संजय से निर्लिप्त सी हो गयीथी..एक सामाजिक बंधन के तहत ही सही संजय ने कभी उपेक्षा नहीं की थी उन दोनों की..इसलिए रेवती ने भी उससे कभी कुछ पूछने की ज़रुरत नहीं समझी..भारत आना भी महज एक खानापूर्ति सी रह गया था..ना स्नेहा को इंतज़ार होता था पिता का ना रेवती को पति का.. हाँ स्नेहा की उपलब्धियों को संजय बहुत गर्व से अपने नाम करा ले जाता था..दसवीं के बोर्ड में पूरे देश में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाली स्नेहा के पिता होने का गौरव उसने खूब भुनाया था .."आखिर बेटी किसकी है "..परन्तु वहीं जब स्नेहा ने दैनिक समाचारपत्र को दिए गए अपने interview में अपनी इस उपलब्धि का श्रेय माँ को दिया तो रेवती भीग उठी .सबकी नज़रें बचा कर उसने आँखों की कोरों पर छलक आये आँसुओं को पोंछ लिया ..स्नेहा ने अपनी दिशा चुन रखी थी.. उसे भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाना था और उसके लिए वो पूरी तरह तैयार थी ..देश विदेश की ख़बरों के बारे में अपडेट रहना ..देश की राजनीतिक उथलपुथल ..किसी भी विषय पर उसके अपने विचार और उनको कहने की क्षमता उसमें विकसित हो रहीथी..इसमें भी रेवती उसका खूब साथ देती थी ..दोनों दो सहेलियों की तरह आपस में बहस करती ..स्नेहा की दुनिया माँ तक और माँ की दुनिया स्नेहा तक ..बारहवीं की परीक्षा में भी स्नेहा ने देश में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया ..परन्तु अब उसके जीवन को गतिमय रखने के लिए उसे किसी अच्छे कॉलेज में एडमिशन लेना था और उसके लिए उसे रेवती से दूर होना था ..मन बैठा जा रहा था रेवती का ..पर ये तो होना ही था ..स्नेहा ने दिल्ली के लेडी श्री रामकालेज में एडमिशन ले लिया ..और अपने जीवन लक्ष्य को साधने में जुट गयी..रेवती की ज़िन्दगी में जैसे एक ठहराव गया ..वह ज़िन्दगी जो अब तक स्नेहा को केंद्र बना कर उसके इर्दगिर्द घूमती थी जैसे केन्द्र्हीन सी महसूस करने लगी खुद को..ना उसका पढने में मन लगता ना स्वर साधना में ..स्नेहा माँ के लिए चिंतित होने लगी थी..उससे हमेशा फ़ोन पर संपर्क बनाये रखती उसको प्रोत्साहित करती लाइब्रेरी जाने को लोगों से मिलने जुलनेको..रेवती भी चाहती थी स्वयं को और जानना समझना .. पर एक उदासी सी घिरती जा रही थी उसके मन पर..
अचानक एक दिन स्थानीय समाचारपत्र में एक संगीत संध्या के बारे में खबर पढ़ी ..उसमें आवाहन था स्थानीय कलाकारों को सामने कर अपनी प्रतिभा की पहचान कराने का मौका देने का .रेवती ने सोच लिया की उसे इस उदासी को झटक देना है नहीं हारेगी वो इन नकारत्मक विचारों के सामने.. स्नेहा नज़रों से ही तो दूर हुई है.. मेरी आत्मा में समायी हुई वो किस तरह दूर हो सकती है मुझसे.. और मुझे इस तरह दुखी देख कर क्या वो खुश रह पाएगी ..दृढ निश्चय कर रेवती ने उस समाचार में दिए हुए नंबर पर फ़ोन किया और रजिस्ट्रेशन की डिटेल्स ले कर अगले ही दिन जा कर रजिस्ट्रेशन करवा आई ..और डुबो दिया खुद को उस कार्यक्रम के लिए तैयार होने में ..फिर से ज़िन्दगी को कुछ दिन के लिए ही सही दिशा मिल गयी थी ...

(क्रमश:)
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Friday, March 26, 2010

है तुझे भी इजाज़त..(प्रथम किस्त)

शहनाई की धीमी पड़ती आवाज़ को पीछे छोड़ती हुई रेवती, थके क़दमों से ड्राइंग रूम में सोफे पर कर निढाल सी पड़ गयी.. शादी की भागदौड़ में पिछले एक महीने की व्यस्तता की थकन मानो आज ही उसके पोर पोर में समा गयी थी ..स्नेहा के विदा होते ही जैसे एक विराट शून्य सा भर गया उसकी ज़िन्दगी में ..उसके विदा होने से पहले यत्न से रोके गए आंसू अब उसका कहा नहीं मान रहे थे.. और पलकों की सीमाएं तोड़ कर बह निकले थे...पर बहते आँसुओं में एक सुकून का एहसास था ..बेटी से जुदा होने के ग़म के साथ साथ उसको एक खुशहाल और सुदृढ़ ज़िन्दगी देने का सुकून और मुंदती पलकों के साथ रेवती अतीत में खो गयी ...

उसकी
पढाई पूरी होते ना होते माता पिता की पसंद संजय उसको पसंद कर गए थे ..उसको ये जानने समझने का मौका भी नहीं मिला कि उसकी पसंद क्या है..अच्छा खानदान ,पक्की नौकरी करते संजय,रेपुटेड यूनिवर्सिटी से हासिल ऍम.बी. की डिग्री, एक विवाह योग्य लड़की के लिए इससे ज्यादा और क्या देखना होता है सम्बन्ध जोड़ते समय ? तो सम्बन्ध जुड़ गया.. परिवारों में पहले व्यक्तियों में बाद में और जुड़ा भी या नहीं कहा नहीं जा सकता संजय सहृदय इंसान थे पर बहुत व्यावहारिक भी और रेवती भावुक..कहीं कोई कोना रिक्त रह गया मन का .. पर नए जीवन की शुरुआत में उसका ध्यान नहीं गया ..व्यवहारिक विवाह के मापदंडों पर उनका विवाह १०० प्रतिशत खरा उतरता था ..कोई कमी दृष्टिगोचर हो तो वो किसी से कहे भी पर मन का उल्लास जैसे उमगने से पहले ही रेत पर पड़ी पानी की बूंदों की भांति मन में ही रह जाता था ..एक आदर्श पत्नी,बहु,भाभी सभी के मापदंडों पर खरी उतरती रेवती खुद को कहीं भूलती जा रही थी .. संजय और उसके विवाह के वर्ष के पश्चात् स्नेहा का जन्म हुआ था .रुई के फाहे सी सफ़ेद गोलमटोल नेही को बाँहों में ले कर रेवती पूर्ण हो उठी थी ..हर पल उसकी निगाह टिकी रहती नेही पर ..उसका सोते में मुस्कुराना उसका आँखें खोल इधर उधर देखना..उसका सबसे पहले नज़रें मिलने पर मुस्कुरा कर पहचान होने का सन्देश देना..कोई भी क्षण वो अनदेखा नहीं छोड़ना चाहती थी.. नेही ने कब खुद पलटना शुरू किया कब बैठना, कब खुद खड़े होना ,कब अन्न का पहला दाना खाया , कब उसने ग्लास से दूध पियाया कब उसने पहला शब्द बोला..सब क्षण रेवती ने क़ैद कर लिए थे डायरी में..इन नन्हे क्षणों को संजय से बांटना चाहती थी पर संजय अपनी दुनिया में मशगूल शुष्कता से कह देते थे की बड़ी होगी तो सब कुछ सीखेगी ही इतना नया क्या है इसमें ..धीरे धीरे रेवती की दुनिया जैसे स्नेहा के इर्द गिर्द सिमट गयी थी उसकी चुलबुली शरारतें उसकी तोतली भाषा में कविता सुनाना ..रेवती तो सौ सौ जान निहाल हो जाती उस पर.. बुद्धि की तेज़ स्नेहा वर्ष की उम्र में ही सैकड़ों कवितायेँ सुना देती थी..और रेवती की महत्वाकांक्षा जुड़ गयी स्नेहा से..उसको स्कूल में भरती करने के साथ ही उसको प्रथम स्थान पर देखने की महत्वाकांक्षा ..स्नेहा ने भी उसे निराश नहीं किया परन्तु आज रेवती को खुद से ग्लानि होती है..क्यूँ डाल दिया था उसने नन्ही सी जान पर अपनी महत्वकांक्षाओं का बोझ..रेवती को अच्छी तरह याद है जब प्रथम कक्षा में भारत के प्रथम राष्ट्रपति का नाम स्नेहा पंडित जवाहरलाल नेहरू लिख कर आई थी तो कितना झिड़का था उसने बेचारी को..मासूम स्नेहा निशब्द देखती रह गयी थी माँ को.. ४९ मार्क्स का जो पेपर वो सही करके आई थी उसके लिए माँ ने उसकी प्रशंसा नहीं की अपितु मार्क के लिए लानत मलानत कर रही है..स्नेहा के चेहरे के वो खिसियाये हुए भाव रेवती की आँखों में आज भी ताज़ा हैं..क्यूँ माँ बाप बच्चों को इतना बाँध देते हैं मार्क्स लाने के लिए ..संजय घर की दुनिया से बेपरवाह रहते थे..ऑफिस में उनका रुतबा, दिन पर दिन प्रोन्नति उनको रेवती और स्नेहा से काटती जा रही थी ..स्नेहा की बालसुलभ हरकतें संजय को परेशान कर जाती और वो झिड़क बैठते थे उसे ..और मासूम नेही सहम जाती थी ..पिता के घर में रहते हुए किताबों में घुसी रहती वहीं माँ के सामने चंचल बातूनी गुडिया बन जाती कैरियर को ऊंचाइयों तक पहुँचाने का जूनून संजय को बाहर देशों में नौकरी ढूँढने को प्रेरित करता था जबकि रेवती संतुष्ट प्रवृति की महिला थी पैसे से ज्यादा मन की शांति और परिवार की ख़ुशी उसके लिए अहमियत रखती थी ..धीरे धीरे संजय और रेवती के प्लेन्स अलग अलग होने लगे..घर का माहौल ना बिगड़े इसके लिए दोनों के वैचारिक संवाद बंद से हो गए ..वैसे भी संजय वैचारिक मामलों में रेवती को निकृष्ट ही समझते थे और दोनों ने सो काल्ड स्पेस के नाम पर एक दूसरे के मामलों में हस्तक्षेप करना बंद कर दिया. रेवती ने स्नेहा को परवरिश देने में अपने संस्कार अपने अनुभव और ज़िन्दगी के प्रति अपनी समझ का भरपूर प्रयोग किया और स्नेहा उत्तरोतर बढ़ती हुई कक्षा में थी जब संजय ने आबुधाबी के किसी बैंक में अपनी नौकरी पक्की हो जाने का ऐलान किया रेवती और स्नेहा को जल्द ही अपने पास बुला लेने का वादा कर वह पैसा कमाने चला गया .रेवती ने समय काटने के लिए स्नेहा के स्कूल में ही शिक्षिका की नौकरी कर ली..अब दोनों माँ बेटी पूरे समय साथ रहती ..समय बीतता गया संजय उन दोनों को वहां बुला नहीं पाया कभी कुछ कभी कुछ अड़चन आती ही रही ..साल में दो बार भारत आता भी तो स्टॉक मार्केट,इन्वेस्टमेंट्स, रियल एस्टेट..इन सब में ही उलझा रहता रेवती उसके बिना घर और बाहर दोनों में सामंजस्य कैसे बिठा रही है या उसकी भावनात्मक ज़रूरतों की तरफ उसका ध्यान नहीं जाता ..खुद की शारीरिक ज़रूरतें पूरी करने का साधन रेवती बन जाती जिससे रेवती के मन में वितृष्णा भर जाती थी..मन से जुड़े बिना तन जोड़ने की वैवाहिक मजबूरी रेवती को कभी रास नहीं आई और उसकी ये वितृष्णा संजय को उससे शारीरिक रूप से भी दूर करती गयी..स्नेहा कैशौर्यावस्था की दहलीज पर अपनी उम्र से ज्यादा समझदार थी .माँ के मन का खाली कोना उसे समझ आने लगा था ..एक दिन रेवती की पुरानी डायरी स्नेहा के हाथ लग गयी जिसमें ना जाने कितने गीत और गजलें रेवती ने इक्कठे किये हुए थे ..उसने माँ से पूछा कि क्या वो गाती है? रेवती ने कहा गाया करती थी..शादी के बाद तो कभी मौका ही नहीं मिला ..उससे पहले उसने साल का लाइट वोकल का कोर्स किया था ..तभी ये सब गजलें इक्कठी करी थी..स्नेहा ने जिद करके उससे कुछ गजलें सुनी..इतने साल बाद गाते हुए शुरू में रेवती को झिझक हुई पर फिर सुर गले से हो कर हृदय में उतरने लगे और उन सुरों में रेवती का मन डूबने उतरने लगा ..कैसे भूल बैठी वो खुद को....स्नेहा तो मंत्रमुग्ध सी उसे सुन रही थी उसकी माँ का ये रूप उसने जाना ही कब था.. वो क्षण उसे रेवती के बहुत करीब ले आये माँ बेटी से ऊपर उठकर एक अलग सा सम्बन्ध स्थापित हो गया दोनों में ..अब उसने खोद खोद कर माँ से उसकी पसंद नापसंद के बारे में जानना शुरू किया ..और ये जान कर कि माँ को पढने का शौक है पास की एक लाइब्रेरी में उसको रजिस्टर करवा दिया..रेवती अपनी बेटी की परिपक्वता देख कर हैरान थी ..सोच नहीं पा रही थी कि ये १४ वर्षीय लड़की उसके मन को कैसे समझ पा रही है..स्नेहा की ज़रूरतों का ध्यान उसे रहता है क्यूंकि उसने जन्म दिया है उसे..उसके लहू के एक एक कतरे को समझती है वह ..पर ये नन्ही सी जान..उसके मन को समझने लगी है..सोच कर प्यार से भर उठती रेवती ..

(क्रमश:)
.... ..

Friday, February 19, 2010

वह अजनबी -


"जब भी ये दिल उदास होता है .." गाना बज रहा था ऍफ़ एम पर और रिया महसूस कर रही थी एक उदासी को जो पसर रही थी उसके मन में .एक आत्मीय जिसको उसने कभी देखा नहीं, उसे खो देने का एहसास भारी कर दे रहा था उसके मन को, आत्मा को..उलझ गयी थी रिश्तों के तानोबानो में.. सोचें साल पहले की उस रोंग नंबर कल पर जा रुकी जिसने उसे एक ऐसे रिश्ते से जोड़ दिया था जिसका कोई नाम नहीं था ..एक अजनबी अचानक उसकी ज़िन्दगी में आया और दुनियावी रिश्तों से परे एहसास के रिश्ते का आभास करा कर चला गया ..
यादों की परतें खुलने लगी ..रिया को वो सब याद आने लगा जो कहीं उसके मन की गहराई में दबा पड़ा था ..वो शख्सियत जिसको उसने कभी अहमियत नहीं दी थी, आज अचानक उसी के लिए वो आंसू बहाएगी... यह उसने कभी सोचा तक नहीं था ..
"राज"..यही नाम बताया था उसने जब पहली बार गलती से फ़ोन मिल गया था ..और उसके बाद उसकी ओर से दोस्ती की पेशकश.. और रिया का ये कह कर ख़ारिज कर देना की वो अजनबियों से दोस्ती नहीं करती ..फिर उसका बार बार कॉल करके ये विश्वास दिलाना की वो खुद को अजनबी नहीं महसूस करता ..धीरे धीरे रिया के दिल में एक कोमल भाव उत्पन्न कर गया उसके लिए.. रिया संवेदनशील थी.. भावनाओ को समझने वाली पर खुद में बहुत पारदर्शी भी ..अपनी भावनाओं को भी अच्छी तरह जानने वाली ..राज ने उसे एकतरफा प्रेम किया और रिया ने उसकी भावनाओ का सम्मान किया ..इससे ज्यादा दोनों के बीच कोई रिश्ता नहीं था ..रिया ने उसे स्नेह करुणा.ममत्व दिया पर प्रेम वो उसे नहीं दे सकी.
दोनों में सबसे बड़ा अंतर जीवन के प्रति प्रेम का ही था ॥राज की हर बात में मायूसी झलकती थी तो रिया की हरबात में जीवन जीने की उमंग ..राज की दुनिया जैसे रिया तक सिमट कर रह गयी थी.. अपने जीवन का हर दुःख वो उससे बाँट लेना चाहता था ..और रिया सुनती रहती थी .. तभी उसने ये जाना की वो एक अच्छी श्रोता भी है..अभी तक उसे एक अनियंत्रित वक्ता के रूप में सब चिढाते थे ..पर संवेदनाओं से भरा उसका मन राज को उसके अंतस में भरे अवसाद को बहाने के लिए एक श्रोता बना चुका था ।आधे आधे घंटे वो बिना एक शब्द बोले राज को सुनती रहती थी ..राज को उसका साथ ..तपती दोपहर में ठंडी छाँव सा लगता था ..प्रेम को तरसता उसका मन रिया से उम्मीद लगा बैठा था प्रेम की.
पर प्रेम सोच समझ के तो होता नहीं..वो तो बस घटित हो जाता है.. और रिया के मन में करुणा थी पर प्रेम का कोई स्पंदन उसे महसूस नहीं होता था .. और यूँ राज का एकतरफा प्रेम खुद राज के लिए जीने की उमंग बन चुका था उसने रिया से बेशर्त प्यार किया था ..उसने सिर्फ इतना चाहा था कि वो रिया से बात करता रह सके..और प्रेम का सम्मान करने वाली रिया ने भी उसे निराश नहीं किया ..और फिर अचानक उसके फ़ोन आने बंद हो गए.. कुछ दिन यह सब रिया के खयाल में रहा फिर वो उसे भी एक सपना समझ भूलने लगी..दुनिया में ऐसे कितने लोग होते हैं जो समय काटने की खातिर ऐसे प्रेम का इज़हार करते हैं..रिया इस बात पर यकीन करना चाहती थी की राज भी उन्ही में से एक था..पर उसका दिल नहीं मानता था..करीब महीने बीत गए थे कि अचानक एक दिन फिर किसी अजनबी नंबर से फ़ोन कॉल आई ..और फ़ोन करने वाला कोई और नहीं राज था ..रिया तो लगभग भूल चुकी थी उसे..कुछ रहस्यमय सा लगा उस रोज़ राज उसे.. एक नयी जिद पकड़ ली थी उसने .. मिलना है .. सामने बैठ कर बात करनी है.. और रिया सामाजिक बन्धनों में जकड़ी.. साफ़ मना कर बैठी..आत्मिक जुडाव होना अलग बातहै..पर मिलना जुलना किसी अजनबी से.. ये तो उसके संस्कारों में नहीं था ..उस समय तक वह नहीं जान पायी थी कि इस जहाँ में कौन अजनबी है और कौन आत्मीय..सब कुछ तो परिभाषाओं के तहत झूठ ही हो जाता है ...और राज का यूँ कहना कि "तुम मिल लो मुझसे वरना बाद में पछताओगी "..उसे एक गर्वौन्मत कथन लग रहा था उसने भी बड़े गर्व से कह डाला था, "नहीं,मैं कभी मिलना नहीं चाहूंगी तुमसे.."

उसके बाद राज के फ़ोन अक्सर - महीने के अंतराल पर आने लगे॥रिया पूछती थी कि वह कहाँ है? उसकाजवाब होता, किसी दूर-दराज़ इलाके में हूँ, वहां फ़ोन नहीं है जब शहर आता हूँ तो दोस्त के फ़ोन से बात करता हूँ.. रहस्यमय सी बातें और साथ साथ ये कि तुम हर पल साथ होती हो..मुझे जीवन जीने का हौसला देती हो.. तुम्हें देखता रहता हूँ ...रिया ने पूछा देखते रहते हो ..कैसे?? तो राज ने कहा " लाल बोर्डर कि पीली साड़ी ..माथे पे गोल बड़ी बिंदी और खुले बाल ..एक दम देवी का स्वरुप "
भीग जाता था रिया का मन.. राज के पवित्र एहसासों पर ..वो उसे समझाना चाहती थी कि ये उसके स्वयं के एहसास हैं.. उसमें रिया का कुछ भी नहीं.. पर राज कि कोमल भावनाओं को क्षति पहुंचाए बिना ये वो उसे नहीं समझा सकती थी ..धीरे धीर रिया ने सब समय पर छोड़ दिया था ..ऐसे ही करीब .३० साल बीत गया .. हर - महीने में राज का फ़ोन आता और वो उससे मिलने कि गुजारिश करता ..और मना कर देने पर एक ही बात कि एक दिन आएगा जब तुम मिलना चाहोगी और मैं नहीं मिलूँगा "..
सोचते सोचते रिया कि आँखों से आंसू झर रहे थे ... राज के कहे हुए शब्द गूँज रहे थे उसके कानो में, उसके अंतर्मन में....कहा करता था वो " तुम्हारी हंसी मुर्दों में भी जान डाल सकती है ".... झूठ !!.. झूठ कहता था वो.. कहाँ डाल पायी वो जान एक जिंदा इंसान के भी एहसासों में.. पल पल टूटता रहा वो और एहसास भी नहीं होने दिया ..रिया को अपनी सारी जीवन्तता झूठ लगने लगी.. उसकी तस्वीर को सामने रख वो किसी एकांत स्थल पर जूझता रहा ब्रेनट्यूमर से अकेले ..इस कोशिश में कि जाने से पहले इतना कमा जाए कि उसके परिवार को कोई परेशानी ना हो ..उसका परिवार ..जिसमें एक अपने में डूबी पत्नी और दो छोटे बच्चे .. जिनके लिए वो जीना चाहता था ..पत्नी के लिए उसने रिया को बताया था कि बहुत प्रक्टिकल है..भावनाएं किसी के लिए भी नहीं है यहाँ तक कि उसके अपने माता पिता के लिए भी नहीं.. और राज .. ज़रुरत से ज्यादा भावुक इंसान.. कभी कभी लगता है इश्वर के घर से जोड़ियाँ कैसे बन के आती हैं? इन्ही को शायद ऋण बंधन कहते हैं ...
रिया को याद है कि एक बार जब उसके यही कहने पर कि मैं नहीं मिलूँगा जब तुम चाहोगी..वो उससे जिद कर बैठीथी कि ऐसा क्यूँ कह रहे हो..तब उसने बताया था कि पिछले साल से वो इसीलिए भाग रहा है.. ज़िन्दगी बहुत कम बची है ..जितनी बची है उसे उसके बाद जीने वालों के आराम के लिए इस्तेमाल कर रहा है
स्तब्ध रह गयी थी रिया ॥उसी पल उसने सोच लिया था कि चाहे कुछ भी हो इस जाने वाले इंसान कि एक दिली इच्छा तो वो पूरी कर ही सकती है.. वो उससे मिलेगी ..चाहे उसे संस्कारों को छोड़ना पड़े ..समाज के नियमों को तोडना पड़े..पर एक ऐसे इंसान कि इच्छा वो ज़रूर पूरी करेगी जिसने उसे निस्वार्थ प्रेम किया है ..और उसने उससे कहा कि अगली बार वो जब भी अपने शहर आये तो उसे बता दे वो कोशिश करेगी उससे मिलने आने की।
पर सोच को हकीकत में बदलना एक भरे पूरे घर की जिम्मेदार गृहणी के बस में नहीं होता .. दुनियावी रिश्ते कभीकभी आत्मीय रिश्तों की राह में बाधा बन जाते हैं..समय बीतता गया ..हर - महीने में राज का एक छोटा सा कॉल जाता था ..उसकी बीमारी अब खुल कर सामने चुकी थी .परिवार वाले हर संभव कोशिश कर रहे थे उसके इलाज की.आर्थिक ,सामाजिक जो भी सहारा उसे अपने दुनियावी रिश्तों से मिल सकता था वो मिल रहा था पर एक भावुक इंसान को जो मानसिक सहारा चाहिए वो उसे नहीं मिल पा रहा था और उसी की चाह में वो किसी भी तरह रिया को फ़ोन करता था . और एक दिन उसने कहा कि जब ये कॉल भी आना बंद हो जाए तो जान लेना की मैं अब दुनिया में नहीं हूँ...टीस सी होती थी रिया के दिल में ..लेकिन बस उसी समय तक जब तक उससे बात होती थी.. उसके बाद रिया अपनी दुनिया में मस्त हो जाती थी.. सोचते सोचते रिया को खुद से नाराज़गी सी होने लगी.. "सहानुभूति के तौर पर भी तू क्यूँ नहीं सोच पायी उसके बारे में कितनी खुदगर्ज़ हो गयी थी .." जैसे रिया कि आत्मा उसे धिक्कार रही हो सामने खड़ी.. " बहुत खुशनुमा बनती है .. सब कहते हैं हर समय हंसती रहती है ..क्या कर पायी तू उसके लिए .. बीमारी तो एक बहाना थी.. तूने उसे इतना भी साथ नहीं दिया कि वो बाहर पाए उस अवसाद से जिसमें घिर कर उसने आत्महत्या जैसा कदम उठा लिया " ...फूट फूट कर रो पड़ी रिया .....उसके इलाज के लिए USA जाने का पता उसके दोस्त के द्वारा लगा था रिया भी दोस्त के मार्फ़त उसके हाल चाल पूछ कर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ लेती थी
लौट के आने के बाद एक बार राज से बात हुई ।उसने बताया की एअरपोर्ट से बाहर आते ही मेरे दोस्त ने सबसे पहली न्यूज़ ये दी की तुम्हारा अक्सर फ़ोन आता रहा इस बीच मेरे बारे में पूछने को॥ कितनी ख़ुशी झलक रही थी उसकी आवाज़ में ..उसी से रिया ने उसके रेगिस्तान से तपते मन का अंदाज़ा लगा लिया की उसकी करुणा की कुछ फुहारें भी राज के मन को कितना शीतल कर गयी.. उसने पूछा की कैसा लगा ये जानना ..तो राज ने कहा -" मुझे उम्मीद थी की तुमने पूछा होगा ..इतना तो जानता हूँ तुम्हें.."

रिया को राज ने बताया की उसे ब्रेन ट्यूमर का अटैक कभी भी जाता है इसलिए वो अपने साथ फ़ोन नहीं रख सकता ..और जब कभी उसका दोस्त उससे मिलने आता है और वो अकेले होते हैं तभी वो कॉल कर सकता है.. धीरेधीरे ठीक हो रहा है.. कुछ दिनों में ऑफिस ज्वाइन कर लेगा ..ख़ुशी हुई रिया को जान कर .. उसके लिए मन से दुआ करी और फिर वक़्त गुजरने लगा अपनी गति से..पिछले महीने से राज कि कोई खबर नहीं थी और इस बार जब उसने दोस्त को कॉल किया तो पता चला कि राज तो चला गया ...संभावित सूचना थी इसलिए रिया को धक्का तो नहीं लगा ..बस उसने इतना कहा लेकिन वो तो ठीक हो रहा था ना..ट्रीटमेंट के बाद .. तो दोस्त ने बताया कि उसने तो suicide कर लिया... रिया पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा हो.. ऐसा क्या हुआ ..इतना बड़ा कदम उफ़ !!!!!
जो सुना उसको सुन कर उसे दुनियावी रिश्तों के खोखलेपन पर विरक्ति सी हो आई.क्यूँ परिभाषाओं के सामने भावनाएं गौण हो जाती हैं..राज के मन को उसके साथ रहने वाले क्यूँ जान नहीं पाए ...राज के दोस्त ने बताया कि उसकी तबियत को ले कर परिवार वाले उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते थे .अकेले से पड़ गए थे वो .उनको लगने लगा था कि मैं अब किसी के काम का नहीं रहा ..बोझ बन गया हूँ सब पर.. तो जब जाना ही है तो कुछ दिन महीने या साल का इंतज़ार क्यूँ करूँ.. सबको मुक्ति दे दूँ इस अनचाहे बोझ से.. और एक दिन उन्होंने फंदा लगा केअपनी जीवन लीला समाप्त कर दी......"
........स्तब्ध सी रिया ..कुछ बोल भी नहीं पायी.. सुन्न सी बैठी रह गयी.. उसे यकीन नहीं हुआ कि उसके जीवन से जुड़ा कोई इंसान इतना कमजोर भी हो सकता है .. सबसे ज्यादा गुस्सा उसे खुद पे आया .. क्या कर पाई वो उसके लिए.. क्यूँ भेजा था इश्वर ने उसकी ज़िन्दगी में उसे.. वो उसकी एक छोटी सी इच्छा भी तो पूरी नहीं कर पायी इतनी सक्षम भी नहीं हो पायी कि कुछ हँसते हुए पल किसी मरते हुए इंसान कि झोली में डाल दे.. और आंसू बहते रहे ..उस इंसान के लिए जिसके प्रेम को उसने कभी अहमियत नहीं दी.. आज उसकी वही आवाज़ गूँज रही थी कानों में " तुम मुझसे मिलना चाहोगी और मैं नहीं मिलूँगा "
और जिस इंसान को उसने कभी देखा भी नहीं था .ज़हन कि दीवारों पर उसकी एक परछाई सी उभर आई ॥साक्षात्मोहब्बत का अक्स हो जैसे..
और रिया बुदबुदा उठी.. " मैं तो तुमको कुछ नहीं दे पायी राज ..पर तुम मुझे सिखा गए कि प्रेम क्या होता है तुम्हारी पाक मोहब्बत को दिल से दुआ देती हूँ.. जहाँ हो .. खुश रहो.. और उस निस्वार्थ प्रेम को अपनी रूह में बसाकर फिर दुनिया में आओ.. और इस दुनिया को प्रेम करना सिखाओ.. परिभाषाओं से ऊपर उठ कर प्यार किसे कहते हैं ये तुम्ही से जाना ..जीवन का एक अध्याय पढ़ा गए तुम ..और मेरे दिल में अपने लिए एक कोना सुरक्षित कर ही लिया तुमने.. आखिर अपनी जिद के पक्के निकले ना " कहते कहते रिया रोते रोते भी मुस्कुरा पड़ी...और अब रिया जब भी हंसती है तो ये वाक्य गूँज जाता है उसके कानो में " तुम्हारी हंसी मुर्दों में भी जान डाल सकती है " ........

काश ये सच होता !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

वह अजनबी उसे मुहब्बत का पहला सबक सिखा गया था...
, .. .. " .. " .. ...

Tuesday, August 18, 2009

jamalo ki consultancy

बिज़्नेस में मुल्ला से तगड़ा झटका खाने के बाद जमालो बी कुछ दिन तो गुमनामी में डूबी रही .पर बहुत दिन किसी शै पर मलाल करना उसकी फ़ितरत में ना था.दिमाग़ के घोड़े दौड़ाए.मुदिता जी और महक़ जी से मंत्रणा की ( पता नहीं विनेश जी ने कब देख लिया )..मंत्रणा का सार निकला कि कुछ ऐसा किया जाए कि हींग लगे ना फिटकरी और रंग चोखो ही चोखो….
मुदिता जी और महक़ जी के साथ मीटिंग के बाद ये डिसाइड हुआ कि एक ऐसा प्रोफेशन है जिसके मंदा होने का तो कोई चान्स ही नहीं है .लागत कुछ नहीं बस बातों के लच्छे ..जिसमें तो जमालो बी का कोई सानी नहीं ..और मुनाफ़ा क्लाइंट के स्टेटस के हिसाब से..वाह भाई वाह. मज़ा आ गया ..जमालो को अपना मनपसंद धंदा मिल गया करने को…

जब से पूरी दुनिया में पति पत्नी का अस्तित्व हुआ है तब से उनमें मतभेदों का भी अस्तित्व हुआ है..या यूँ कहें की दोनो अस्तित्व एक दूसरे के बिना पूर्ण नहीं हैं ..और अब उन मतभेदों के लिए advice लेना स्टेटस सिंबल में शामिल होता जा रहा है .जो जितनी ज़्यादा बार marriage counsellor के पास गया वो ज़्यादा रुतबे वाला.. पैसे वालों में होड़ सी लगी रहती है advisors के पास जाने की..तो साहिब जमालो बी ने भी यही धंदा चुना..
with the backup of the experience of Mudita ji and Mehaq ji...

आनन फानन में इश्तिहार छ्प गये “ज़िंदगी बनाइए ख़ुशगवार..अपने जीवनसाथी को ढालें अपने अनुसार..अपने ही घर में चूहे से शेर बनने के 1001 तरीके ..एक बार मिल तो लें ..(jamalo consultant ltd. ) “

हर शादीशुदा मर्द अपने को चूहा ही समझता है.. समझे ना भी पर दूसरों को बताने में शान समझता है की वो चूहा है..तो उसी भावना के तहत लाइन लग गयी जमालो बी के दफ़्तर के सामने .जमालो बी का ऑलरेडी जमालो लिमिटेड का office setup था ही.उस फ्रंट पर भी उनको कुछ खर्च नहीं करना पड़ा .AC office , फोन, फैक्स,कंप्यूटर सभी कुछ कायदे से install था तो फर्स्ट इंप्रेशन काफ़ी अच्छा था जमालो बी का .और उनकी प्रॅक्टिकल इंटेलिजेन्स काफ़ी थी दुनिया को राह दिखाने के लिए .एक फॉर्म भरना होता था जिसमें आवेदक को अपना नाम ,उम्र ,पता ,जेंडर और आय का ब्योरा देना होता था और आगे का agenda जमालो उसी के बेसिस पर तैयार करती थी..

तो साहिब धंदा चल निकला.मशहूरियत मुल्ला के कानो तक भी पहुँची ..मुल्ला वैसे तो जमालो से खार खाए बैठे थे पर अब जमालो को मूंडने के बाद उनके कलेजे को ठंडक मिल गयी थी और जैसे अमीरों के घर में मतभेदों का चलन ज़्यादा है वैसे ही मुल्ला भी अब ब्रेकप वाले मोड में पहुँच रहे थे ..तो मुल्ला जी ने सोचा की जमालो से अड्वाइज़ लेने में तो कोई हरजा ना है.. पसंद आएगी तो सुनेंगे वरना जैसी खुदा की मर्ज़ी..

मुल्ला विनेश जी को बिना बताए अपायंटमेंट फिक्स करवा आए जमालो बी से….(विनेश क्या जाने वैवाहिक जीवन की दुश्वारियां … commited person (ऐसा प्रोफाइल में लिखा है )..जाके पैर ना फटी बिवाई वा का जाने पीर परायी )..इसलिए इस बात का रिस्क मुल्ला जी ने खुद ही उठाना उचित समझा …मुल्ला जी का appointment फिक्स हो गया.1000 रु registration fee और advice के 500 रु अलग .और फिर मुल्ला के अपायंटमेंट का दिन आ आ गया..जमालो बी को मौका हाथ लगा अपनी कुछ रकम वापस उगहाने का …

जमालो ने शरबत पीला कर मुल्ला जी का स्वागत किया..
और मीठी आवाज़ में पूछा

जमालो-बताइए साहिब क्या परेशानी है आपको ?

मुल्ला- अरे बीबी.. एक हो तो बतायें,यहाँ तो सारे दिन की किच किच .हम तो पनाह माँग गये .

जमालो-बतायें भी..!

मुल्ला-हुमारी बेगम ने हमारा सोना -जागना , उठना - बैठना ,खाना -पीना ..अब कहाँ तक बतायें समझ लीजिए सब कुछ दूभर कर रखा है..ऐसे हँसो ऐसे बोलो.. ऐसे खाओ ऐसे सो...लाहौल बिला कूवत ..जैसे हुमारी कोई आइडेंटिटी ही नहीं है…

जमालो--ह्म्‍म्म्मम( गहन सोच की मुद्रा में)… ये तो मसला काफ़ी गंभीर हो गया है.. आइडेंटिटी क्राइसिस..मुल्ला जी i m sorry ( एक कुशल चिकित्सक की तरह चेहरे पर बेचारगी के भावः लाते हुए ) आपने काफ़ी देर कर दी.. अब दवा का नहीं.. .. i mean अब advice से नहीं product से काम लेना होगा ..

मुल्ला –कौन सा प्रॉडक्ट?

जमालो-अरे बड़ा useful प्रॉडक्ट है.हुमारी कंपनी ने पेटेंट करवा लिया है.. वो अपनी मुदिता जी और अतुल जी को जानते हैं आप?

मुल्ला –जी हाँ जी हाँ.!! बड़े खुशमिजाज मियाँ बीवी हैं.. दिल खुश हो जाता है उनकी जोड़ी देख कर …जैसे एक दूसरे के लिए बने हों ..

जमालो- बस ..इसी प्रॉडक्ट के कारण तो.. आप भी बन सकते हैं बिल्कुल वैसे..!!

मुल्ला जी की तो बांछे खिल गयी..इस प्रॉडक्ट को तो use करना चाहिए

मुल्ला-लेकिन कीमत??

जमालो—अरे मुल्ला जी अब शादीशुदा ज़िंदगी की खुशियों की कोई भी कीमत कम ही है..पर आपकी पुरानी ग्राहकी का ध्यान करते हुए सिर्फ़ आपके लिए 50% डिसकाउंट पर 5000 रु ..

मुल्ला –5000/-…( चक्कर सा आ गया मुल्ला को ..)

जमालो—अरे सोच लो मुल्ला..मुदिता जी और अतुल जी तो independently एक एक प्रॉडक्ट USE कर रहे हैं पिछले 10 साल से.. और अब सुना है महक़ जी भी उसके गुणों से प्रभावित हो कर उसे लेना चाहती है..

मुल्ला—चलिए दे दीजिए एक ..और इस्तेमाल का तरीका भी समझा दीजिएगा

जमालो-ज़रूर ज़रूर..!
कह के घंटी पर हाथ मार कर peon को बुलाती हैं और एक "खुशियाँ पाओ "प्रॉडक्ट को लाने का ऑर्डर देती है.. और एक 5500 की रसीद काट कर मुल्ला के हवाले करती है.. मुल्ला ज़ब्त-ए-दिल करके 5500 रु ( 5000 प्रॉडक्ट कॉस्ट+500 अड्वाइज़ कॉस्ट )..जमालो की नज़र करते हैं..और जमालो प्रॉडक्ट का पैक मुल्ला के हवाले करती हुई बताती हैं की user's guide में इस्तेमाल का तरीका तफ़सील से लिखा है..

मुल्ला खुशी खुशी घर आके पैकेट खोलते हैं तो उसमें से निकलते हैं..

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रबड़ के ear muffs ………………..या अल्लाह….

खैर मुल्ला उनको कानों में लगा के आराम से पेपर पढ़ रहे हैं और उनकी बेगम 6500 रुपये फूँक आने के एवज में अपनी संपूर्ण योग्यता के साथ उनकी सात पुश्तें तार रही हैं..
पर मुल्ला बहुत relaxed हैं.. और अख़बार पढ़ना बहुत enjoy कर रहे हैं… क्यूँ ना हो!!!!!!!!!!!!!

THE PRODUCT IS PROVEN BY ATUL JI AND MUDITA JI ...!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!

Friday, August 7, 2009

jamalo ka dhandha ..kabhi na manda ..

नाम तो उनका जमीला रखा था उनके वालिदैन ने पर मोहल्ले भर में वो फजीहत बी के नाम से मशहूर थीं.इस नामकरण के पीछे भी एक पूरा इतिहास है.२० वर्ष हो गए जब जमीला उर्फ़ जमालो निकाह करके किराने वाले जुम्मन मियां कि शरीके हयात बन के इस मोहल्ले में आयीं थीं .इत्र फुलेल लगाये जुम्मन मियां अकड़ अकड़ के चलते हुए अपनी बेगम के साथ जब दाखिल हुए गली में तो सारे मोहल्ले में हाहाकार मच गया ..कमसिन खूबसूरत जमीला खातूनों के रश्क का और हज़रात के इश्क का सबब बन गयी.दबी दबी आवाज़ में सरगोशियाँ शुरू हो गयी ..सुना है मैट्रिक पास है ..बहुत सलीका और शउर है दुनिया का ...किस्मत खुल गयी जुम्मन मियां कि तो... जुम्मन मियां सातवें आसमान पर ..उनकी शाम कि लगने वाली बैठकें ख़त्म हो गयी दुकान से भागने कि जल्दी रहती मियां को ..जलेबी खस्ता के दोने उठाये घर में घुसते और उसके बाद दोनों कबूतरों कि गुटरगूं सुनने को कई शोहदे कान लगाये पाए जाते उनके दरवाजे पर ...किराने कि दुकान पे नौकरों ने हाथ साफ़ करना शुरू किया तब जुम्मन मियां कि गफलत टूटी..और वापस पहुँच गए जुल्फों कि छाँव से निकल कर नून तेल लकडी के जुगाड़ में ..उधर जमालो ने भी एकआम खातून कि ज़िन्दगी में कदम रखा ..चूल्हा चौका आस पड़ोस ...जो उन्हें ज्यादा दिन रास न आया..इस दिन के लिए मैट्रिक कि पढाई थोड़े न कि थी ..एक दिन जुम्मन मियां के अच्छे मिजाज देख के उन्होंने अपना इरादा उनके सामने रखा -" मियां .हम दिन भर खाली रहते हैं घर में ..सोच रहे हैं कि आमदनी में कुछ इजाफा किया जाए "..मियां का मुंह खुला का खुला ..सुभानअल्लाह ..जे बात तो आजतक मोहल्ले की किसी भी बीबी ने न सोची होगी. मियां तो सौ सौ जान निछावर हो गए अपनी इस खूबसूरत और intelligent बेगम पर ..--" बताइए बेगम आपने क्या सोचा है.. ??".बेगम ने कहा बस आप हमें ५०० रु दीजिये.. और हम आपको उन्हें बढ़ा के ही वापस करेंगे.. जुम्मन मियां ने ख़ुशी से झूमते हुए ५०० रु निकाल के बेगम की नज़र किये buisness establishment के लिए .......

अगले दिन के अखबार में एक इश्तिहार छपा..
''अब आप भी बन सकते हैं मिस्टर इंडिया. ..आखिर हमने इजाद कर ही दिया वो product जिसे पहन कर आप तो सारी दुनिया को देख पायेंगे पर आपको कोई नहीं देख पायेगा ..तो देर न करें first come first serve के आधार पर प्रोडक्ट दिया जाएगा तुंरत फ़ोन करें xxxxxxxxxx is नंबर पर ..प्रोडक्ट की cost २००० रु और post & handeling का खर्चा अलग .प्रोडक्ट आपको VPP से भेजा जाएगा पैसे चुका के डिलिवरी लें और उसके बाद हो जाइए इस दुनिया की नज़रों से ओझल ....."....

खलबली मच गयी साहब पूरे शहर में ..चोर, आशिक, खाविंद ,किरायेदार सभी इस प्रोडक्ट के फायदे अपने अपने हिसाब से लगाने लगे ..और हमारे मुल्ला जी तो ठहरे हरफनमौला ..उनको तो इसमें अपनी ज़िन्दगी बचती नज़र आने लगी..मकानमालिक से डर कर घर में पलंग के नीचे नहीं छिपना पड़ेगा ..बाजार में लेनदारों के सामने से सीना तान के निकाल जाऊंगा ..कम्बखत देख भी न पायेंगे मुझे.. गुदगुदी सी होने लगी मुल्ला के दिल में.. और घर का छोटा मोटा सामान तो यूँही आ जायेगा अब..कितनी बार लाला ने पकड लिया मुझे तेल साबुन उठाते हुए.. भाई वाह ..जिसने भी इजाद किया है ये प्रोडक्ट.. जी चाहता है हाथ चूम लूँ उसके ..दिल खुश कर दिया ..पर ..ये २००० रु कहाँ से लाऊंगा??...दिमाग के घोडे दौडाए... अरे ... ये अपने प्रॉफेसर साहब कब काम आयेंगे ( वैसे जबसे उनका परिचय पत्र बनाया है कुछ उखड़े उखड़े से हैं ..... अमाँ यार इन छोटे छोटे सचों से कोई इतनी पुरानी दोस्ती टूटती है भला .. मेरा यार है विनेश ..मना तो कर ही नहीं सकता ).... तो साहब इन self dialogues के बाद मुल्ला जी पहुँच गए हमारे मास्टरजी के घर अपनी सबसे बढ़िया अचकन पहन कर ..विनेश जी के sixth sense ने उन्हें चौकन्ना किया ..एक तो वैसे ही उनकी सच्चाई उगल देने के कारण मुल्ला जी उनकी ब्लैक लिस्ट में शुमार हो चुके थे ऊपर से उनके घर पधारना... दाल में कुछ.. अरे नहीं पूरी दाल ही काली है ... फोर्मल hi hello का आदान प्रदान हुआ.. मुल्ला जी ने एक एक करके घर में सबकी तबियत पूछी ...विनेश जी..अन्दर ही अन्दर .. मुल्ला !!!! come to the point ..उवाच रहे थे ....ultimately मुल्ला जी ने कहा ..यार विनेश क्या बताऊँ पिछले हफ्ते तुम्हारी भाभी ने..मुझे मेरी १८वी माशूका के साथ पार्क में देख लिया..तुम समझ सकते हो क्या गत बनायीं होगी मेरी

विनेश जी ने चेहरे पर हमदर्दी के भावः लाने की कोशिश की ..मुल्ला जी बेचारगी से बोले यार वो मिस्टर इंडिया वाला प्रोडक्ट लॉन्च हो रहा है मार्केट में फर्स्ट come फर्स्ट serve basis पर ..पर पैसो का जुगाड़ नहीं हो रहा ..विनेश जी की टिमटिमाती ट्यूब लाइट भक्क से जल उठी ओहो तो ये माजरा है ..विनेश जी ने कहा ...-----यार मुल्ला ..पैसे तो मैं तुम्हें दे देता पर आजकल मेरा भी हाथ थोडा तंग चल रहा है ..कालिज वाले पेमेंट नहीं कर रहे और tours के सारे खर्चे भी मुझे अपनी जेब से देने पड़ रहे हैं ( spontaneous झूठ ..जिसमें उन्हें महारत हासिल है.. ) ... मुल्ला दीन बन गए..पैरों पे गिरने को तैयार ..बड़ी मुश्किल से विनेश जी ने उन्हें संभाला.. और मुल्ला जी की दीनता देख हमारे कोमल ह्रदय प्रॉफेसर ज्यादा देर तक टिक न सके अपनी बात पे.. १००० रु ला कर रख दिए मुल्ला के हाथ में और कहा की मेरे भाई इसी से काम चलाओ अभी ..मुल्ला गदगद हो उठे ..गले से लगा लिया विनेश जी को..और कहा यार जब भी तुझे अदृश्य होने की ज़रुरत हो..मांग लेना मुझसे वो प्रोडक्ट.. ( हर किसी को ज़रुरत पड़ती है कभी अदृश्य होने की ) ... और मुल्ला जी ख़ुशी ख़ुशी घर वापस आ गए ..बाकी के १००० रु उन्होंने बाज़ार से उधार उठाये ये सोच कर कि एक बार अदृश्य हो जाऊंगा तो कौन कर पायेगा वसूली मुझसे ........
और साहब मुल्ला जी ने फुनवा गुमाई दिया .....
फ़ोन पर सुरीली आवाज़ सुनते ही मुल्ला जी तो गश खाते खाते बचे
हमारी जमालो बी बड़ी नफ़ासत से पूछ रही थी -----कहिये क्या खिदमत कर सकते हैं हम आपकी ?
मुल्ला ----ज्ज्ज्ज्ज्जीईईईईइ...व्व्व्व्व्व्व्ब् ब्ब्ब्ब.. ईई श्श्श तितिती हार .....
जमालो ----जी हाँ कहिये वो मिस्टर इंडिया वाला?
मुल्ला -----जी हाँ जी हाँ .... !!
जमालो----- बताइए कहाँ भिजवाना है?

और मुल्ला जी ने फटाफट अपना पता लिखाया ..और जमालो ने एक मीठे शुक्रिया के साथ फ़ोन रख दिया.. मुल्ला तो बहुत देर फ़ोन के चोगे से ही मिठास का अनुभव करते रहे ...

अब मुल्ला जी रोज़ डाकखाने के चक्कर लगाते ..कि कहीं डाकिया आके बेगम को प्रोडक्ट न पकडा जाए ..चौथे दिन मुल्ला जी का इन्तेज़ार ख़तम हुआ ..एक VPP पार्सल डाकखाने में आया था उनके नाम से...मुल्ला जी ने रु २११५(मय डाकखर्च) चुकाए और लपकते क़दमों से पैकेट को सीने से लगाये घर में दाखिल हुए.. चोर नज़रों से देखा कि बेगम ने उन्हें देखा तो नहीं.. और झट से अपना कमरा बंद करके बेसब्री से पैकेट खोलने लगे ..दिल कि धड़कने बढ़ी हुई थी ..आँखें तरस रही थी प्रोडक्ट के दीदार को ..और जैसे ही उपरी पैकिंग उतार के मुल्ला ने डब्बा खोला ...उनकी चीख निकल गयी.. और वे बेहोश हो कर ज़मीन पर गिर पड़े....

आप जानना चाहेंगे कि पैकेट में क्या था......
scroll down ................




बुरका ...!!!!!!!!!! .........

अरे बाप रे ई का !!!!!! .... मुल्ला जी ..इतने ज़हीन होते हुए न सोच पाए कि भैया हमारी बेगम जब बाज़ार जाट हैं तो वो तो सभैय को देख पाती हैं ..पर उनको तो काउ न देख पायिब ... बुरका जो पहने रखती हैं.....

आखिर मिल ही गया न सेर को सवा सेर..मुल्ला जी को पहली दफा किसी ने चूना लगा दिया था ......

मुल्ला जी के होश में आने के बाद उनके reaction का हमें भी इंतज़ार है... विनेश जी के १००० रु तो गए ही समझो... अब विनेश जी कैसे वसूलेंगे मुल्ला से ये एक अलग कहानी होगी....

इंतज़ार कीजिये ऐसे और भी किस्सों का जिसके कारण हमारी जमालो बी.. फजीहत के नाम से मशहूर हुई ...तब तक के लिए विदा ...

Tuesday, August 4, 2009

RISHTON KI DOR.................


आज नलिनी का मन किसी काम में नहीं लग रहा था. यंत्रचालित सी बस घर के काम निबटाने में लगी हुई थी और फिर आके बैठ गयी सोफे पर सोचते हुए..आज दिन की घटनाओ को ...आज दोपहर में किसी काम से वो बाज़ार गयी थी तो हर तरफ चहल पहल थी.दुकानों पर रंगबिरंगी राखियाँ मिठाई की दुकानों पर भीड़ और कितने भाई अपनी बहनों के लिए गिफ्ट खरीदते हुए ..याद आया की कल तो रक्षा बंधन है !!!!.............
अतीत के भवंर में डूबती उतरती वो घर लौट आई .बचपन के दिनों से लेकर जवानी के वो खिलखिलाते पल..भाई के साथ गुज़रे लम्हे सब एक चलचित्र की भांति नज़रों के सामने से गुज़र रहे थे .पापा की लाडली नलिनी कैसे अपने से दो साल बड़े विक्रम की झूठी सच्ची शिकायतें कर उसकी डांट पड़वा देती थी ..और माँ के हाथ के बने लड्डू बराबर बाँट दिए जाने के बाद ..अपने हिस्से के जल्दी जल्दी ख़तम कर टुकुर टुकर तकती थी भाई को खाते देख...तब माँ कैसे घुड़कती थी भाई को..- बहिन देख रही है और तू खा रहा है ..शर्म नहीं आती तुझे..चल दे उसे भी... और विक्रम बेचारा हमेशा घाटे में रह जाता ......कितना सीधा था मेरा भाई..था क्या.. आज भी है..सोचते सोचते नलिनी की आँखें भर आई ...कॉलेज का वो पहला साल..भाई के होने से कितना सुरक्षित महसूस करती थी वो...और विक्रम भी तो हमेशा उसके चारों तरफ अपनी निगाहों का जैसे घेरा बना के महफूज़ रखता था उसे ...घूमने फिरने पिकनिक पिक्चर हर जगह हंसते खिलखिलाते दोनों भाई बहिन अपने दोस्तों में सबके प्रिय थे ...अविरल से प्यार की भनक भी भाई को ही सबसे पहले मिली थी ...और उसने ज़मीन आसमान एक कर दिया था उसकी जांच पड़ताल करने में.सब तरफ से तसल्ली होने के बाद उसने नलिनी के सर पर अपना हाथ रख दिया था - तू चिंता मत कर मैं हूँ न... और फिर सचमुच जैसे ढाल बन गया था वो परिवार के हर तीर के सामने..गैर जाती का अविरल उस ज़माने में इतनी सहजता से स्वीकार्य नहीं था पर विक्रम ने उसे उसकी खुशियों से मिलाने का अपना वादा बखूबी निभाया .....
हर राखी पर सुबह से ही नलिनी घर को सजाती..दरवाजों पर सोन रखती..एक तरफ नलिनी एक तरफ विक्रम लिख कर सौ सौ दुआएं देती भाई को ..और अपनी स्नेह्सिंचित राखी भाई की कलाई पर बाँध मजबूत कर लेती अपने प्यार की इस डोर को ..पर......... एहसास नहीं था उसे की ये डोर कमज़ोर हो सकती है..दुनियावी बातों का असर इस रिश्ते को भी धुंधला कर सकता है ........
शादी के बाद नलिनी हर राखी पर स्वयं अपने हाथों से राखी बांधने घर आया करती थी ...भाई की शादी के बाद भी दस्तूर जारी रहा शुरू में कुछ साल भाभी का प्यार बरसता रहा नलिनी पर पर धीरे धीरे नलिनी को दूरियों का एहसास होने लगा और उसने अपना आना बस रक्षाबंधन तक ही सीमित कर लिया ...एक बार वो बिना बताये भाई को चौंकाने के लिए घर पहुँच गयी ..बहुत उत्साह से दोनों भतीजों के लिए कपडे खिलोने..भाभी के लिए साडी..और भाई के लिए घडी की खरीदारी की थी उसने .घर की doorbell दबाने के लिए जैसे ही हाथ बढाया उसने भाभी की अन्दर से आती हुई आवाज़ ने उसका हाथ रोक दिया..भाभी फ़ोन पे बात कर रही थी...

हाँ माँ ..अच्छा है इस बार दीदी नहीं आ रही है..न ही उनका कोई फ़ोन आया ..वरना विक्रम तो जैसे घर लुटाने के लिए तैयार रहते हैं बहिन के लिए .....ह्म्म्म हम्म... हां.. हाँ और क्या.. हमारे भी तो खर्चे बढ़ रहे हैं.. अब आती है तो खाली हाथ विदा भी तो नहीं कर सकते..उसका क्या है.. इंजिनियर पति है.. खता पीता घर है.. पर मेरे पास तो इतना पैसा नहीं है न.. आ जाती है तोहफे ले कर अपने पैसों का रौब दिखाने.. फिर उसी हिसाब से हमें लौटना भी तो पड़ता है....जैसे तैसे तो मैंने उसका आना साल में एक बार तक सीमित कराया है...... अच्छा है ..आना बंद हो तो मैं चैन पाऊं .....

नलिनी स्तब्ध सी ..वंही की वंही पत्थर सी जम गयी... आँखों से आंसुओं की धार फूट पड़ी.मन हुआ वंही से वापस लौट जाए पर अविरल को क्या कहेगी.. भाभी का ये ओछापन बता पाएगी उन्हें?? कुछ पल यूँही खड़ी रही ..भाभी की आवाज़ आनी अब बंद हो गयी थी ..खुद को संयत कर करीब १५ मिनट के बाद नलिनी ने घंटी बजायी.भाभी ने दरवाजा खोला और एक पल के लिए हतप्रभ हो..गले से लगा लिया नलिनी को..
-अरे दीदी फ़ोन कर देती.हम आ जाते लेने .विक्रम तो कितने उदास थे ..बच्चे भी बुआ क्यूँ नहीं आ रही ..रट लगाये हुए थे ...विक्रम कितने खुश होंगे.. .....

और नलिनी एक फीकी मुस्कराहट के साथ सोच रही थी की इंसान कितने मुखौटे लगा सकता है ..उसी पल उसने अगले साल से न आने का प्रण कर लिया था ....कितने साल उसे अपने न जाने के झूठे कारन अविरल से बताने पड़े थे...फिर उनको भी समझ आ गया था ..एक कर्त्तव्य की तरह वो राखी भेज दिया करती थी..भाई ने एक दो बार पूछा फिर वो भी अपनी दुनिया में ज्यादा सहज हो गया .
हर राखी के बाद भाभी का दो line लिखा हुआ moneyorder आ जाता था जो नलिनी को एक भारी बोझ सा लगने लगा था ... रक्षाबंधन से १५ दिन पहले से दुविधा शुरू हो जाती..राखी भेजूं की न भेजूं .पूरे साल खबर भी नहीं मिलती भाई की...कितना बदल देता है वक़्त इंसान को...राखी भेजने से ही क्या रिश्ता निभता है.....मेरे बच्चे कब बड़े हो गए..कब कॉलेज गए .. उनके मामा को पता ही नहीं है ....राखी भेजना और जवाब में पैसों का आ जाना ..वितृष्णा होती थी नलिनी को ...उन दोनों के बीच का प्यार स्नेह कब भौतिकता की भेंट चढ़ गया पता ही नहीं चला ....अंतत: नलिनी ने राखी भेजना भी बंद कर दिया और फिर किसी शुभचिंतक से पता चला था की भाभी ने खूब कसीदे काढ़े हैं उसके लिए ...
---भाई की जरा चिंता नहीं है..अरे बड़ी होगी अपने घर की.... राखी भी नहीं भेजती... मैं तो खुद ही खरीद कर बंधवा देती हूँ.. रस्म तो निभानी चाहिए...

जिस साल राखी बिना भेजे आये हुए moneyorder को वापस किया था नलिनी ने ..वही साल था सारे धागों के टूट जाने का ..... वो डोर जिसके हर बात में विक्रम और नलिनी का प्यार बसा था.... खुलती चली गयी और एक एक करके धागे टूटते चले गए .... और आज नलिनी को ये भी पता नहीं चला की रक्षाबंधन आ चुका है ............................

सोचते सोचेत कब अँधेरा हो गया नलिनी को पता ही नहीं चला..
अविरल की आवाज़ ..--------अरे भाई नीलू कंहा हो..ये अँधेरा क्यूँ कर रखा है घर में....?

खुद को संभालती नलिनी उससे पहले बत्ती जल उठी... और उसकी सूजी आँखें देख अविरल सब कुछ समझ गए..

मुस्कुराते हुए उसे बाँहों में समेटा और कहा ---छूटने दो नीलू जो छूट रहा है..पकड़े रहोगी तो कभी खुश नहीं रह पाओगी.. वो खुश हैं.. स्वस्थ हैं.. और तुमको क्या चाहिए..तुम दिल से दुआ करो ..और तुमको क्या पता विक्रम भी तुमसे जुड़ा हो .. रिश्तों की डोर चाहे बाहरी तौर पर न दिखे पर मजबूत इतनी होती है कि सिर्फ उससे बंधे हुए लोग ही उसका जुडाव महसूस कर सकते हैं ...खुश रहो और किसी भी बात का कोई गिला मत रखो..यही तुम्हारे भाई को तुम्हारा राखी का गिफ्ट होगा ..

नलिनी मुस्कुरा उठी.. और ये सोचते हुए चाय बनाने चल दी कि कल सुबह सबसे पहले उठ कर भाई को फ़ोन करेगी..और अपने रक्षाबंधन कि एक खूबसूरत शुरुआत करेगी...