Thursday, May 2, 2019

मुग्धा:एक बहती नदी (बारहवीं क़िस्त)


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(अब तक आपने पढ़ा : पच्चीस साल बाद कॉलेज के दोस्तों के 'गेट टुगेदर' में मुग्धा बचपन के दोस्त राजुल से मिलती है, जहाँ राजुल का अभी भी वही पुराना अपरिपक्व और अस्तव्यस्त सोचों से ग्रसित व्यवहार देख कर उसका मनोविश्लेषण करने का कीड़ा कुलबुलाने लगता है. मुग्धा के पति अखिल एक जाने माने मनोचिकित्सक हैं और मुग्धा उनसे राजुल के बारे में डिस्कस करते हुए इस तरह के व्यवहार की जड़ों तक पहुंचना चाहती है
अखिल और मुग्धा पति पत्नी से ज़्यादा मित्रवत संबंध जीते हैं. मनोविज्ञान की बारीकियों के बीच गुदगुदाती हुई चुहल के साथ दोनों मॉल घूमने का निश्चय करते हैं. मॉल में अकस्मात लगभग आठ वर्षीय सोनू उनसे टकरा जाता है जो राजुल का बेटा है. राजुल और अखिल के बीच राजुल की पर्सनल लाइफ के बारे में कुछ बातें होती हैं और अखिल सोनू के हाथों पर कट्स के निशान देख कर चिंतित हो उठता है. घर लौट कर मुग्धा को बताता है कि यह बच्चे में एंग्जायटी और डिप्रेशन का संकेत है. दोनों सोनू की तरफ से परेशान हो कर बातें करते हुए  टहलने निकल जाते हैं. उधर राजुल अखिल और मुग्धा से मिलने के बाद हल्के मन से घर पहुंचता है तो उसकी पत्नी मधु उस पर तानों और आरोपों की बौछार कर देती है जिससे परेशान हो कर वो घर से निकल जाता है ....)
अब आगे-
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बारहवीं क़िस्त
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अखिल और मुग्धा टहलते हुए सोनू और राजुल की ही बातें कर रहे थे. मुग्धा महसूस कर रही थी कि अखिल को कहीं ना कहीं संतान की कमी खलती है. आज सोनू को देख कर उनकी आंखों में जो एहसास दिख रहा था वह मुग्धा को अंदर तक बेचैन किए जा रहा था. उसे भी बच्चे अच्छे लगते हैं लेकिन यह अपने हाथ में तो नहीं . शादी को कितने बरस हो गए किंतु वे संतान सुख से वंचित हैं और दूसरी ओर राजुल और मधु जैसे पेरेंट्स हैं जो अपनी आपसी लड़ाई में में प्रभु के उपहार मासूम बच्चों को पीस रहे हैं....आख़िर क्या गुनाह है इन नौनिहालों का ?

अखिल कह रहे थे: "सोनू की समस्या की जड़ तक पहुंचने के लिए राजुल और मधु के संबंधों को गहराई से समझना होगा. राजुल की बातों से ऐसा लग रहा था मुझे कि मधु कुछ एंग्जायटी या डिप्रेशन से ग्रसित है जिसे राजुल का कुंठित स्वभाव और खाद पानी देता है. तुम चाहो तो राजुल से दोस्ती को ज़रा रेफ़्रेश कर लो, उसी राह से हम मधु के लिए कुछ कर पाएँगे."

मुग्धा अपनी सोचों की तंद्रा से बाहर आते हुए बोली -"ठीक है ! मैं कोशिश करती हूं हालांकि उस चिड़चिडे इंसान को झेलना मेरे बस की बात नहीं. मुझे तो बचपन से ही उसके साथ कम्फ़र्ट लेवल नहीं रहा."

अखिल हँस पड़े -"जितनी बड़ी दुनिया है उतनी तरह के लोग हैं और फिर तुम भी तो राजुल की मदद करना चाहती थी. हो सकता है अस्तित्व ने इस के लिए हमें यह अनायास अवसर दिया है."


उधर घर से गुस्से से भरा हुआ निकला राजुल अपने ही ख़यालों में गाफ़िल  न जाने कितनी देर तक चलता रहा. अचानक ठंडी हवा ने उसके पसीने से भीगे बदन को छुआ तो ठिठक कर रुक गया. चलते चलते गोमती के किनारे आ पहुंचा था राजुल. नदी की तरफ से बह कर आती ठंडी हवा ने तन को ही नहीं मन को भी शीतलता पहुंचाई और वो वहीं किनारे बने एक पार्क की बेंच पर बैठ गया. मधु की बातों ने उसे बहुत अपसेट कर दिया था. ना जाने क्यों अखिल और मुग्धा के बारे में सोचते हुए उसे ईर्ष्या होने लगी थी. तभी उसके मोबाइल पर मुग्धा की कॉल आने लगी. एक अजब सी खुशी जैसे राजुल की रग रग में दौड़ गयी. उत्साह से उसने कॉल रिसीव की -"हाय मुग्धा ! कैसे याद किया ?"

मुग्धा ने पूछा-"कहाँ हो तुम ? मीटिंग ओवर हो गयी ?"

राजुल अचानक चौंक पड़ा-" अरे मैं तो भूल ही गया कि मुझे किसी से मिलना था. दरअसल घर पहुंचते ही मधु ने तमाशा खड़ा कर दिया और में गुस्से में घर से निकल आया. अब तो 7 बज रहा है ,मुझे दो मिनट दो मुग्धा, मैं ज़रा कॉल करके बता दूं क्लाइंट को, फिर तुम्हें कॉल बैक करता हूँ."

मुग्धा ने कहा -"हाँ हाँ कोई नहीं, मैंने तो ऐसे ही कर लिया था कॉल."

"नहीं मुग्धा अभी कॉल करता हूँ,तुम फ्री हो न ?" -पूछा राजुल ने

मुग्धा बोली -" हाँ राजुल तुम कर लेना कॉल."

दो मिनट बाद ही राजुल का कॉल आ गया . बहुत उत्साहित था वह .मुग्धा से पूछा-'कैसी हो तुम ? "
मुग्धा हँस के बोली- "अरे अभी कुछ ही देर पहले तो मिले थे इतनी देर में क्या बदल जाऊंगी."
राजुल बोला -"अरे उस समय तुमसे तो ज़्यादा बात ही नहीं हो पाई. मुझे संकोच हो रहा था, न जाने तुम्हारे पति क्या सोचें."
 मुग्धा ने कहा -"तुम दोस्त हो मेरे इसमें सोचने जैसा क्या है."

राजुल ने ठंडी सांस भरते हुते कहा-"तुम नहीं समझोगी मुग्धा.यह पति पत्नी का रिश्ता बड़ा अजीब होता है. अधिकारत्व की भावना इतनी प्रबल होती है कि दम घुटने लगता है कभी कभी तो."

मुग्धा ने बात बदलते हुए कहा -"अरे छोड़ो इन बातों को. अपने बारे में बताओ, क्या किया क्या कर रहे हो ? इतने साल कैसे गुज़रे ?"
राजुल शुरू हो गया. उसकी आवाज़ में जोश था, जैसे बहुत दिन बाद बन्द कपाट खुले हों और ताज़ी हवा में भीतर का सब जमाव पिघलने लगा हो..बहने लगा हो. फ़ोन की दूसरी और से राजुल की आवाज़ आती जा रही थी जिसका कुछ अंश मुग्धा सुनती और कुछ के परे जा कर उसका अर्थ समझने की कोशिश करती जा रही थी. राजुल ने उसे बताया, अपने विगत के बारे में और बताते हुए यह एहसास बहुत प्रखर था कि ज़िंदगी में उसे कुछ भी नहीं मिला.

राजुल का सेलेक्शन मर्चेंट नेवी के लिए टी .एस.राजेंद्रा में हो गया था किन्तु उसके पापा और मम्मी ने उसे वहाँ नहीं जाने दिया इकलौता बेटा था पूरे साल शक्ल  भी नहीं देख पायेंगे.फिर हमेशा शिप पर रहेगा ..हम लोग रिटायर होने के बाद अकेले कैसे रहेंगे. राजुल की आवाज़ में अपने माता पिता के प्रति खिन्नता थी ..मुग्धा को एहसास हुआ कि राजुल की सोचों पर उसके माता पिता का ही असर है ..एक परिधि से बाहर  जैसे उन्होंने देखना  नहीं सीखा वैसे ही राजुल भी एक सीमा के परे जा कर नहीं देख पा रहा था.
उसके बाद राजुल कभी कहीं कभी कहीं छोटे मोटे जॉब करता रहा . कभी मेडिकल रिप्रेसेन्टेटिव ,कभी लैब अस्सिटेंट ..कुछ अच्छे मौके मिले लेकिन गलत निर्णय के कारण हाथ से निकल गए ..उसी बीच में मधु से शादी ..मधु उसके घर के पास ही रहती थी और बेहद खूबसूरत मधु से हर कोई बात करने को लालायित रहता था ..राजुल से मधु ज्यादा खुली हुई थी और उसने राजुल से वादा  ले लिया था शादी का ..राजुल ने मुग्धा को बताया कि जब तक मधु के साथ रहा उसे लगता रहा कि  वह उसे प्यार करता है ..लेकिन कुछ सालों के लिए दूसरे शहर जाने के बाद उसको उस एहसास में कमी नज़र आने लगी ..किन्तु मधु से किये वादे ने उसको शादी से मुकरने नहीं दिया ..और उसने सोचा की शादी तो करनी ही है.. किसी अनजान से करने से अच्छा है मधु से ही सही.. और यदि राजुल मधु से शादी करने से इनकार करता तो मधु टूट जाती ..और फिर कोई ऐसा कुछ था भी तो नहीं जिसकी वजह से मधु से शादी करने के लिए मना किया जाए.

मुग्धा को ये सब बातें सुन कर महसूस हुआ कि राजुल स्वयं को शहीद समझता है ...उसे लगता है उसने मधु को खुश करने के लिए उससे शादी की.. मम्मी पापा को खुश करने के लिए मर्चेंट नेवी का जॉब छोड़ा..एक धारणा उसके मन में गहरे पैठी है कि उसने सभी की  खुशी के लिए त्याग किया है एक आदर्श पुत्र और पति बनने की कोशिश की है  जिसके कारण आज भी वह खुद को सेटल नहीं कर पा रहा है ..अपनी इस अस्तव्यस्त ज़िंदगी का जिम्मेदार वह अपनी ज़िंदगी से जुड़े सभी लोगों को मानता है.

 राजुल ने मुग्धा से पूछा उसकी ज़िंदगी के बारे में ..मुग्धा एक सहज ज़िंदगी जीने वाली ..उसने  बिना किसी लाग लपेट के अपने और अखिल के मिलने और शादी के बारे में बताया .. राजुल की ईर्ष्याजनित टिप्पणी थी -"तो तुम बिना किसी उतार  चढ़ाव के एक खुशहाल ज़िंदगी जी रही हो..कितनी खुशकिस्मत हो तुम, समय पर शादी....सब कुछ अपनी जगह सेट्ट ...लेकिन मैं इतना किस्मत वाला नहीं ..पता नहीं कौन से कर्मों का बोझा ढो रहा हूँ."

मुग्धा ने कहा - " हो जाता है जीवन में ऐसा..कभी कभी कुछ गलत निर्णय ज़िंदगी को अस्तव्यस्त कर देते हैं ..लेकिन उनसे उबरना होता है हमें ..आगे बढ़ना होता है उन्ही का मातम नहीं मनाते रहना होता."

राजुल बोला - " मुग्धा ! तुम नहीं जानती कुछ भी. ज़िंदगी ने कैसे कैसे मजाक किये है मेरे साथ.  मुझसे मेरा बेटा छीन  लिया ..और मेरी बीवी...उसने मेरी ज़िंदगी नरक बना रखी है....मुझ पर हर पल शक रहता है उसे ..अजीब अजीब इलज़ाम लगा लगा कर मुझसे लड़ने के सिवाय और कुछ आता ही नहीं..कितनी बार वह आत्महत्या की कोशिश कर चुकी है ..उसी के कारण मैं घर से बाहर  भटकता रहता हूँ... जब सब लोग सो जाते हैं, तभी घर में एंटर होता हूँ ..डॉक्टर कहते हैं कि उसे कोई मानसिक बीमारी है ..लेकिन मुझे तो लगता है वह नाटक करती है."

मुग्धा ने कहा-'हो सकता है उसे सच में ही कोई प्रॉब्लम हो..क्या होता है मुझे डिटेल्स  बताओ .नाटक क्यूँ करेगी वह ?"

राजुल ने कहा -" कहती है कि कोई उसके खिलाफ साजिश करता है. कोई उसे मारने  का षड़यंत्र  करता है. एक बार तो उसने पुलिस में मेरे खिलाफ रपट तक लिखा दी थी ..घर पर पुलिस  आई ..बेटे पर भी बहुत बुरा असर पड़ता है इन सब बातों का."

मुग्धा ने पूछा-"कब से है ऐसा ?"

राजुल बोला -"शादी के कुछ समय बाद से ही. दरअसल एक बार मेरी एक मित्र का फोन आ गया था बस तभी से उसे मेरी हर बात पर उसे शक होने लगा. मीनू नाम की मेरी मित्र का नाम ले ले कर वह मुझे कोसती रहती है ताने देती है."

मुग्धा ने पूछा - "डॉक्टर को दिखाया तुमने उसे ?"

राजुल बोला-"हाँ दिखाया है.. डॉक्टर कहते हैं कि पैरानॉयड पर्सनालिटी डिसऑर्डर है. लेकिन मुझे लगता है कि वह नाटक करती है. सब कुछ ठीक चलता रहता है. सबसे हंस कर बात करती है बस मुझे ही देख कर भड़क जाती है."

मुग्धा  बोली -"राजुल यह एक मानसिक डिसऑर्डर. तुम शायद मधु को गलत समझ रहे हो. उसको प्यार और अपनत्व की जरूरत है .. इस तरह की बीमारियों में परिवार वाले और ख़ास कर spouse बहुत बड़ा संबल होते हैं पीड़ित व्यक्ति के लिए."

राजुल ने कहा -'"तुम इतनी श्योरिटी से कैसे कह सकती हो ?"

मुग्धा बोली- "अखिल एक मनोचिकित्सक हैं और ऐसे कितने ही केसेज़ मैंने देखे है उनको हैंडल करते हुए. बहुत क्रिटिकल सिचुयेशन होती है ..तुम हौसला रखो मैं तुम्हारे साथ हूँ..मधु का ट्रीटमेंट पॉसिबल है ..हम बात करेंगे इस बारे में."

राजुल बोला -"तुम नहीं जानती मुग्धा ..तुमसे बात करके मुझे कितना अच्छा लग रहा है ..ऐसा लग रहा है मैं अकेला नहीं हूँ ...कोई है जो मेरी परेशानियों को समझ सकता है ..वरना मैं तो बहुत अकेला पड़ गया हूँ."

मुग्धा ने तहे दिल से कहा- "राजुल दोस्त होते किसलिए हैं. तुम परेशान रहना बंद करो. ऐसा करो, जल्द ही मधु और सोनू को ले घर चले आओ."

राजुल बोला- "मधु कहीं नहीं जाएगी मेरे साथ."

मुग्धा ने कहा -"अच्छा कोई बात नहीं, हम देखते हैं कि हम उसे कैसे कम्फ़र्टेबल कर सकते हैं."

राजुल मुग्धा से बात करके ख़ुद को बहुत हल्का महसूस कर रहा था.

.....और मुग्धा ? उसे तो अखिल को अपनी 'इन्वेस्टीगेशन रिपोर्ट' जो देनी थी.
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(क्रमश:)

Wednesday, January 23, 2019

मुग्धा:एक बहती नदी (ग्याहरवीं क़िस्त)


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(अंतराल ज़्यादा हो जाने के लिए पाठकों से क्षमा याचना सहित अबतक का सार संक्षेप :
मुग्धा कॉलेज के रीयूनियन में अपने बचपन के दोस्त राजुल से मिलती है और उसके कुंठित व्यक्तित्व के बारे में अपने पति अखिल जो एक मनोचिक्तिसक है ,से चर्चा करती है ,इतेफाक से दोनो मॉल में राजुल और उसके बेटे सोनू से टकरा जाते हैं , अब आगे ....)

(ग्याहरवीं  क़िस्त )

अखिल और राजुल काफी देर बातें करते रहे ,अखिल का तो पेशा ही था परेशान लोगों की मनोव्यथा सुनना और उससे बात करने में स्वतः ही लोग खुलते चले जाते थे ..मुग्धा को भी आश्चर्य हो रहा था कि  इतना अकड़फूँ राजुल कैसे अपने पारिवारिक जीवन का कच्चा चिठ्ठा खोल रहा है ...लेकिन अखिल को बताते हुए भी राजुल के वक्तव्य मधु की कमियों को ही बखान रहे थे और वह जैसे शोषित हो मधु द्वारा ...एक बेचारगी का भाव और उन सब विसंगतियों से पलायन करना मानों उसका अचीवमेंट हो ..

अचानक राजुल ने घडी देखी  और बोला-“अरे 4 बज गया ,आपके साथ समय का पता ही नहीं चला ,अब हमें चलना होगा सोनू को घर छोड़ने के बाद मुझे ६ बजे एक आर्डर के सिलसिले में मीटिंग के लिए जाना है “

अखिल ने भी उठते हुए हाथ बढाया और कहा – ओके राजुल ,बहुत अच्छा लगा आपसे और सोनू से मिल कर ,कभी मधु को ले कर घर आइये ...बहुत ख़ुशी होगी उनसे मिल कर..

राजुल ने सोनू का हाथ पकड़ते हुए हल्का सा सर हिलाया और मुस्कुरा कर विदा ली..अखिल ने सोनू को गाल पे थपथपा के प्यार करते हए कहा –बहुत ध्यान रखना अपना बच्चे .....

मुग्धा और अखिल को निर्निमेष देखता हुआ सोनू राजुल के साथ चल पड़ा...

मुग्धा और अखिल ने एक दुसरे को देखा ..जहाँ मुग्धा की आँखों में कई प्रश्न डोल  रहे थे वहीँ अखिल एक गहरी साँस ले कर बोला –God,Please help the child...!!

मुग्धा ने पूछा –“क्या हुआ अखिल ?”

अखिल बोला चलो घर चल के बात करते हैं ....और दोनों शौपिंग बैग्स  उठा कर कार की तरफ बढ़ लिए ,पूरे रास्ते न अखिल कुछ बोला न मुग्धा ...दोनों अपनी अपनी सोचों में आज के घटना क्रम का आकलन और विश्लेषण कर रहे थे..

घर आते ही अखिल बोला –“यार एक कप चाय चाहिए ...”

मुग्धा जानती थी की इस समय अखिल को उसी के हाथ की बनी चाय की ज़रुरत है ..वो खुद जा कर दो कप चाय बना कर लायी और अखिल के सामने आ कर बैठ गयी... अखिल अपने दायें हाथ की ऊँगली और अंगूठे से अपनी दोनों आँखें बंद किये सोच में डूबा था ...मुग्धा ने पूछा –क्या हुआ अखिल ,तुम विचलित से क्यूँ लग रहे हो ?

अखिल बोला –“यार ,उस बच्चे से न जाने क्यूँ अचानक एक लगाव हो गया है ...वो बहुत टेंशन में है स्ट्रेस्ड है..न जाने क्या चल रहा है उसकी लाइफ में ..उसी के बारे में सोच रहा था “

मुग्धा बोली- स्ट्रेस्ड  है !!..कैसे लगा तुम्हें ...?

अखिल ने कहा –“तुमने उसकी कलाइयों पर कट्स और प्रिकिंग के निशान देखे थे न ...बच्चे अपने स्ट्रेस को दबाने के लिए खुद को हर्ट करते हैं , इंटेंश्न्ली खुद को काटते हैं ब्लेड से या कंपास की नोक  चुभोते हैं , ऐसा करने से उनको जो दर्द होता है उसमें वो कुछ देर के लिए ही सही अपना स्ट्रेस भूल जाते हैं लेकिन धीरे धीरे डिप्रेशन की स्टेज पर पहुँचने लगते हैं .क्लीनिकली इसे “ non-suicidal deliberate self harm “ कहा जाता है ..आजकल ऐसे केसेस बहुत बढ़ गए हैं हम जैसे डॉक्टर्स के पास .अगर timely इसको डील नहीं किया जाता तो ये सुसाइड तक भी पहुंचा सकता है बच्चों को ..

मुग्धा सन्न बैठी सुन रही थी –“ ओह माय गॉड !!! तो वो निशान  इसलिए थे और सोनू इसीलिए फुल स्लीव्स पहने रहता है की किसी को पता न चलें..

“हाँ “,अखिल आगे बोला –“आजकल बच्चे कई तरह के स्ट्रेस से घिरे हैं .पढाई का स्ट्रेस ,करियर का स्ट्रेस, अकेलेपन का स्ट्रेस,माँ बाप के रिश्तों में खटास का असर जैसा कि सोनू के मामले में मुझे रूट कॉज दिख रहा है “

मुग्धा बोली- हाँ अखिल ! राजुल और मधु के संबंधों का असर इस मासूम पर पड़ रहा है ...

अखिल ने कहा –मुग्धा ! हमें इस बच्चे की मदद करनी चाहिए ... तुम राजुल की पुरानी  दोस्त हो ...थोडा ज्यादा अपनाइयत  दिखा कर उसके  पारिवारिक जीवन में घुसो और असलियत को जानने  की कोशिश करो ..जितना आज की बातों से राजुल को समझा हूँ वो सीधी  बात समझने वाला जीव नहीं है ,उसके आपने पूर्वाग्रह हैं ..उसे यदि सोनू के लिए हम अपना क्लिनिकल diganosis बताएँगे तो उखड़ जाएगा ,सोनू की भलाई के लिए हमें बहुत धैर्य और स्ट्रेटेजी से आगे बढ़ना होगा ..

मुग्धा बोली- बिलकुल अखिल ,मैं तैयार हूँ ..बहुत ही प्यारा बच्चा है ..और शायद हमसे टकराया भी इसीलिए कि ईश्वर चाहते हैं कि हम उसकी मदद करें ...

अखिल ने हँसते हुए  कहा – हाँ तुम्हारे ईश्वर ने तो पूरा प्रोग्राम फिक्स किया हुआ है ...चलो अब थोडा टहल आते हैं...तब से मन भारी था ..तुमसे बात करके अब हल्का लग रहा है ..अमूमन हम डॉक्टर्स इमोशनल नहीं माने जाते और हम रख  भी लेते हैं दूसरों  के इमोशंस  से खुद को अलग थलग लेकिन सोनू से कुछ लगाव हो गया था..

मुग्धा मुस्कुरा दी ..बोली हो जाता है ... चलो टहल आते हैं ....

उधर सोनू और राजुल भी अखिल और मुग्धा से हुई मुलाकात के असर से अछूते नहीं थे..दोनों अपनी अपनी मनस्थिति के अनुसार उन पलों को जी रहे थे जब वे उन दोनों के साथ थे ..
सोनू को अखिल का सुरक्षित आगोश याद आ रहा था तो वहीँ राजुल के ऊपर इस मुलाकात की मिक्स प्रतिक्रिया थी ,एक तरफ वह  अखिल के खुले व्यवहार के समक्ष खुद को कुंठित महसूस कर रहा था दूसरी तरफ अखिल के सामने खुद को खोल कर हल्का भी महसूस कर रहा था ...कुछ इर्ष्या भी थी मुग्धा के प्रति और खुद के प्रति ग्लानि भी ..

राजुल और सोनू ने इन्हीं भावनाओं से गुज़रते हुए घर में प्रवेश किया तो मधु ने तुरंत ही सवालों की बौछार शुरू कर दी ...” कहाँ थे इतनी देर... कब के निकले हो ...मेरी किसी को चिंता नहीं...”
राजुल उस समय अपनी ही सोचों में डूबा बिना कोई जवाब दिए बाथरूम में घुस गया ,सोनू दौड़ के मम्मी से लिपट गया और बोला ,” मम्मा ,आज पापा मुझे मॉल ले के गए थे और पता है वहां एक आंटी और अंकल मिले ..बहुत अच्छे थे दोनों ...आंटी ने मुझे बहुत प्यार किया और अंकल ने मुझे बहुत सारी चीज़ें खिलाई ...

मधु बोली –“कौन थे ये आंटी अंकल ?”

सोनू ने कहा –“ मालूम नहीं ,लेकिन आंटी पापा को जानती थी पहले से ..अंकल आज ही मिले...

इतने में राजुल बाथरूम से गुनगुनाता हुआ बाहर निकला तो मधु की त्योरियां चढ़ गयी ...एक दम चंडी का रूप ले कर वो कमर पे हाथ रख कर सीधे राजुल के सामने जा खड़ी  हुई –“ कौन सी माशूका मिल गयी आज तुमको ?”

राजुल अचकचा गया बोला –“ क्या बकवास कर रही हो ?”

मधु बोली –सोनू ने मुझे सब बता दिया है ...इतने खुश तो कभी नज़र नहीं आते ..आज कोई पुरानी  प्रेमिका से मुलाकात हो गयी ..जनाब की बांछें खिली हुई हैं ...इसीलिए मुझे छोड़ के गए थे ..सब जानती हूँ मैं ...” कहते कहते मधु ने रोना शुरू कर दिया ..अनवरत प्रलाप जारी था उसका –“ मेरी तो ज़िन्दगी ही ख़राब हो गयी ...न जाने किस घडी में इस आदमी से शादी के लिए हाँ कह दिया था ....”

राजुल पहले तो भौंचक्का सा देखता रहा फिर उसका चेहरा तमतमा गया ...बोला “दिमाग ख़राब है तुम्हारा और मेरा भी किये रहती हो हर समय ...एक पल का चैन नहीं इस घर में” ....कहता हुआ धडाम से दरवाजा बंद करते हुए घर से बाहर निकल गया...

सहमा हुआ सोनू एक तरफ खड़ा हुआ सारा नज़ारा देख रहा था ..मधु वहीँ सोफे पे बैठ के जोर जोर से रोते हुए बोले जा रही थी -' मैं तो पहले से ही जानती थी ..कहीं कोई चक्कर चल रहा है तुम्हारा ..इसीलिए इसी फिराक में हो कि कब मुझसे पीछा छूटे ..वो तो मैं एलर्ट रहती हूँ  वरना अब तक तो जान से मार डालते मुझको .."

और सोनू अपने कमरे में जा के औंधे मुंह बिस्तर पर पड़ गया ... आये दिन घटने वाले ये दृश्य उसके लिए नए नहीं थे ..उसे समझ नहीं आता था कि माँ जो सबसे ठीक तरह से बात करती है पापा के सामने ही एकदम बदल कैसे जाती है...
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क्रमश:

Tuesday, November 13, 2018

मुग्धा: एक बहती नदी (दसवीं क़िस्त)


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(अब तक आपने पढ़ा : मुग्धा २५ साल बाद कॉलेज के गेट टुगेदर में राजुल से मिलती है ,उसके अप्रत्याशित और अजीब से व्यवहार की चर्चा अपने मनोचिकित्सक पति अखिल से करते हुए उसके व्यवहार की जड़ों तक पहुंचना चाहती है ,रविवार की खुशनुमा सुबह अखिल और मुग्धा मॉल घूमने जाने का कार्यक्रम बनाते हैं और वहां अचानक ही उनसे सोनू टकरा जाता है जो अपने पिता से बिछड़ गया है .. सोनू को ले कर जब वे लोग इनफार्मेशन काउंटर पर जाते हैं तो मुग्धा सोनू के पिता के रूप में राजुल को देख कर चौंक पड़ती है .......)

अब आगे :
(दसवीं क़िस्त)
मुग्धा की आवाज़ पर अखिल ने चौंक कर राजुल को  देखा जो इस समय नज़रें चुराता हुआ सोनू को अखिल की गोद से लेने के लिए आगे बढ़ आया था ,उसके चेहरे पर सोनू के मिल जाने की ख़ुशी से ज्यादा कुछ झेंप और शर्मिंदगी के भाव थे , वो मुग्धा की ओर देख भी नहीं रहा था और मुग्धा अचरज की स्थिति में लगातार उसे ही देखे जा रही थी . राजुल ने सोनू को गोद में लेना चाहा तो वह अखिल से और ज्यादा चिपक गया ,राजुल झुंझलाता हुआ बोला –“ ये क्या बदतमीजी है सोनू, एक तो तब से परेशान कर दिया मुझे , पता नहीं कहाँ चले गए थे और अब ये जिद “.
अखिल ने सोनू को प्यार से सँभालते हुए बहुत ही कोमल स्वर में पूछा –“बेटा , पापा के पास जाना है न ? “
सोनू ने ना में गर्दन हिलाते हुए अखिल के कंधे में मुंह छुपा लिया .
राजुल के चेहरे पर तमतमाहट उभरी लेकिन अखिल ने हाथ के इशारे से उसे शांत रहने को कहा और मुग्धा से मुखातिब हो कर बोला चलो हम सब चॉकलेट कैफ़े  चलते हैं वही बैठ कर गपशप होगी . और कहने के साथ ही उसने उधर की तरफ कदम बढ़ा  दिए ,अखिल के पीछे मुग्धा और उसके पीछे अनमना सा राजुल मजबूरी में ही सही  चल दिया ..
मुग्धा के मन में अनेकों प्रश्न उमड़ घुमड़ रहे थे लेकिन..अखिल की बात को याद करते हुए उसने खुद को जज़्ब किया हुआ था.. वह उसे अक्सर कहा करता था कि तुम मौके की नजाकत समझे बिना शुरू हो जाती हो कहीं भी ..थोडा धैर्य रखना सीखो  ..
चॉकलेट कैफ़े  पहुँच के अखिल ने सोनू को कोमलता से खुद से अलग किया और एक सोफे पे बिठा दिया .गोल मेज के इर्द गिर्द वो तीनों भी बैठ गए . वेटर आ कर मेनू कार्ड रख गया था
अखिल ने कार्ड सोनू की तरफ बढ़ाते हुए पूछा -क्या खायेगा हमारा बेटा ..सोनू के लिए यह अप्रत्याशित था ,वो कुछ कहता उससे पहले झुंझलाता हुआ राजुल बोला-इसको खिलाने  पिलाने ही लाया था मैं ..लेकिन न जाने क्या नखरे हैं साहबजादे के तब से मुँह बांधे घूम रहा है और कब मेरा हाथ छोड़ के खिसक गया पता भी नहीं चला  .
मुग्धा ने राजुल के हाथ पर अपना हाथ रख के उसे चुप रहने का इशारा किया ..मुग्धा के स्पर्श से राजुल ऐसे झेंप गया जैसे कोई अनहोनी हो गयी हो ..अखिल ने राजुल की बात को इग्नोर करते हुए मेनू कार्ड में झांकते हुए सोनू से कहा  -यहाँ का ग्रिल्ड सैंडविच और पास्ता बहुत अच्छा है ,तुमको अच्छा लगता है पास्ता?...सोनू अचंभित सा अखिल का चेहरा देख रहा था ..उसे शायद खुद ही अपनी पसंद नापसंद का अंदाज़ा नहीं था ...अखिल भांप गया था सोनू की मनस्थिति ,उसने कहा हम पास्ता और ग्रिल्ड सैंडविच मंगाते हैं और ख़ास तौर पर सोनू के लिए चॉकलेट ट्रफल पेस्ट्री ..स्ट्रॉबेरी शेक  पियोगे न ..सोनू ने चमकती आँखों के साथ हाँ में गर्दन हिला दी ..अखिल ने वेटर को बुला कर आर्डर किया और उसके बाद रिलैक्स हो कर सोनू की तरफ प्यार भरी नज़रों से देखा, सोनू कुछ कुछ सहज नज़र आ रहा था ...
राजुल को गहरी नज़रों से देखते हुए उसने कहा – हेलो राजुल ,मैं अखिल ,मुग्धा का पति ,तुम्हारे बारे में मुग्धा ने कल बताया था ..इन परिस्थितियों में यूँ अचानक मुलाकात होगी नहीं सोचा था ..कहते हए उसने हाथ मिलाने के लिए आगे बढ़ा दिया ..राजुल ने भी सकुचाते हए उसकी आँखों के गहरेपन से बचने की कोशिश करते हुए अखिल से हाथ मिलाया और पूछा –क्या बताया मुग्धा ने मेरे बारे में ?
अखिल मुस्कुराया और कहा-यही कि आप लोग बचपन के दोस्त हैं ,कल सबसे मिल कर मुग्धा को बहुत अच्छा लगा .
मुग्धा तब तक उठ कर सोनू के पास सोफे पर बैठ गयी थी ..उसके घुंघराले बालों में प्यार से उंगलियाँ फिराते हुए उसने पूछा – बेटा आपने इतनी मोटी फुल स्लीव्स की T’shirt पहनी है ..गरमी नहीं लग रही ?
और राजुल की तरफ देखते हुए बोली –“इतनी गरमी में इतने भारी भारी कपड़े क्यूँ पहनाये हैं इसे?”
राजुल बोला न जाने क्यूँ यह कभी हाल्फ स्लीव्स पहनता ही नहीं ..मैं तो अक्सर बाहर  ही रहता हूँ महीने में २५ दिन तो टूर ही रहता है ..इसके लिए कितनी ही हाफ टी ले कर आया किन्तु सब ऐसी ही पड़ी हैं और ये अपने सब Attires खुद ही लेता है और खुद ही चुन के पहनता है
अखिल इन सब बातों को गंभीरता से सुन रहा था और उसका मस्तिष्क तेज़ी से विश्लेषण कर रहा था सोनू के व्यवहार का ...
अखिल ने मुग्धा के फ़ोन पर मेसेज किया –“ सोनू की स्लीव्स ऊपर उठवाने की कोशिश करो “
मुग्धा ने फ़ोन पे अखिल का मेसेज देखा तो चौंक के अखिल से आँखों ही आँखों में पूछा ,अखिल ने पलकें झपकाते हुए उसे स्थिति की गंभीरता का एहसास करा दिया था ..
अखिल ने राजुल से पूछा –आपकी मैडम नहीं आई ? क्या नाम है उनका ?
राजुल ने विद्रूपता से कहा – मधु ... उसको तो नाटकों से फुर्सत नहीं वो कहाँ आएगी हमारे साथ
“ओह थिएटर आर्टिस्ट हैं क्या मधु ?”- अखिल ने पूछा
राजुल हँस पड़ा ,बोला- “नहीं नहीं... वो बहुत क्लेश करती है ,हर समय मुझसे लड़ती है..कभी एक दम गुमसुम हो कर किसी कोने में बैठ जाती है ..कभी किसी जंगली बिल्ली की तरह झपटती है मुझ पर ..इन सबसे बचने के लिए ही मैं अधिकतर टूर बना के खिसक लेता हूँ घर से .सोनू बताता है  मेरे जाने के बाद वह एक दम सही रहती है .”

मुग्धा ने सोनू के चेहरे को देखते हुए हलके से विरोध के स्वर में राजुल को टोका – “किस तरह बोल रहे हो बच्चे के सामने “
सोनू का चेहरा और भी उदास हो गया ..बड़ी बड़ी आँखों में मोटे मोटे आँसू भर आये थे ..और बहुत ही धीमी आवाज़ में बुदबुदाते हुए बोला- “पापा झूठ बोल रहे हैं “..
राजुल बोला- अरे जो सच है वही कह रहा हूँ ..तुम नहीं जानती उसे ..इसलिए तुम्हें लग रहा है..
मुग्धा बोली –अच्छा बताओ मधु के बारे में ..कब और कैसे हुई तुम्हारी शादी ...
राजुल ने कहा – लव मैरिज थी हमारी ..
मुग्धा बोली-अरे वाह ..कहाँ मिली तुम्हें ..साथ पढ़ती थी क्या ?
राजुल ने कहा – “नहीं ,मै जब जॉब कर रहा था तो जिस घर में किराये पर रहता था उन मकान मालिक की लड़की थी ... मेरे पीछे दीवानी थी , मुझसे शादी का वादा ले लिया ...उस समय तो मुझे भी लगा कि मैं प्यार करता हूँ इससे..लेकिन जब दूसरे शहर गया और कुछ दिन उससे दूर रहा तो खुमार उतर गया ..लेकिन मधु की जिद और फिर यह सोचा कि कोई और है भी तो नहीं जिसके लिए इसे मना करूँ” ...कहते हुए राजुल ने कुछ अजीब नज़रों से मुग्धा की ओर देखा जो मुग्धा और अखिल दोनों की निगाहों से छुप न सका .....
तब तक वेटर उनका आर्डर ले आया था , अखिल ने शेक का गिलास सोनू को पकड़ाते हुए पूछा –“ आप किस क्लास में पढ़ते हो बेटा ?”
सोनू बोला-“फिफ्थ स्टैण्डर्ड में “
अखिल ने फिर पूछा –“अच्छा लगता है स्कूल जाना ? खूब सारे दोस्त होंगे ..”
सोनू ने पलकें उठा कर राजुल की तरफ देखा और फिर आँखें झुका ली
राजुल बोला –“इसका कोई दोस्त नहीं है ..ये बहुत INTROVERT है स्कूल से घर आते ही कंप्यूटर खोल कर बैठ जाता है .घर में भी किसी से बात नहीं करता”
मुग्धा ने पूछा – “बस यही बेटा है ?”
राजुल बोला –“अब यही है ...”
मुग्धा बोली –“मतलब?”
राजुल ने कहा – “ये मेरा छोटा बेटा है इससे बड़ा एक और बेटा विभु  था जिसके दिल में जन्म के समय से ही सुराख़  था ..डॉक्टर्स ने कहा की बड़ा होने पर ऐसे सुराख  खुद ही बंद हो जाते हैं अगर प्रॉब्लम होती है तब सर्जरी का आप्शन है  ... जब उसकी उम्र ७ साल हुई तो उसकी तबियत काफी ख़राब रहने लगी उसे साँस की परेशानी हाथों पैरों में सूजन और थकान  रहती थी ..सोनू उस समय 4 साल का था , डॉक्टर को दिखाने पर उन्होंने कहा की सर्जरी ही करनी होगी यह सुराख  बढ़ रहा है ..लेकिन सर्जरी के लिए जब एनेस्थीसिया दिया गया तो विभु कोलाप्स  कर गया ..कभी कभी मुझे लगता है की सर्जरी न कराने  का सोचते तो शायद कुछ समय वो और जी लेता .”
कहते कहते राजुल भावुक हो गया था ,अखिल ने उसके हाथ पर अपना हाथ रखते हुए पानी का गिलास उसे दिया और कहा –“जितना लिखा था उसका साथ उतना ही मिला ..वो कष्ट में रहता वो भी ठीक नहीं होता .”
मुग्धा ने अचानक कहा – “सोनू के हाथ पेस्ट्री से चिपचिपा गए हैं ,मैं वाश करा कर लाती हूँ ..”
राजुल उठने का उपक्रम करता हुआ बोला “मैं धुला लाता हूँ “
मुग्धा ने कहा – “नहीं, तुम अखिल से बात करो ,मैं आती हूँ “
मुग्धा सोनू को ले कर वाश रूम चली गयी , उसे मौका चाहिए था अखिल के कहे अनुसार सोनू की स्लीव्स उठवा के देखने का .....
राजुल अखिल के गर्माहट भरे व्यवहार से थोडा सहज हो गया था  ,किन्तु मुग्धा की और सीधे देख कर बात नहीं कर रहा था ..मुग्धा के जाने के बाद थोड़ी देर ख़ामोशी पसरी रही दोनों के बीच..
फिर अखिल ने पूछा – “और आप का जॉब कहाँ है इस टाइम ?”
राजुल ने कहा – “एक्सपोर्ट का बिसनेस है मेरा ,इंडियन हेंडीक्राफ्ट और बेडशीट्स एंड Bedcovers एक्सपोर्ट करता हूँ , कई छोटी छोटी मैन्युफैक्चरिंग यूनिट्स से कोलैबोरेशन है ,अमेरिका ,कनाडा  और यूरोप की कुछ कन्ट्रीज में भेजते हैं ..इसी सिलसिले में अक्सर बाहर रहना होता है ..कुछ घर के माहौल से दूर रहने के लिए भी बना लेता हूँ टूर.. जहाँ ज़रुरत नहीं भी होती वहां भी चला जाता हूँ “
अखिल ने कहा – “ये तो अच्छा है ,इस बहाने आपको कई कन्ट्रीज घूमने को मिल जाती हैं , लेकिन सोनू मिस करता होगा आपका साथ ...”
राजुल बोला- “मैं भी उसे मिस करता हूँ ,इसीलिए महीने में कुछ दिन के लिए आ ही जाता हूँ घर... “
तभी मुग्धा सोनू का हाथ पकडे हुए वहां आ गयी और अखिल को इशारा किया ,सोनू की स्लीव्स थोड़ी से मुड़ी हुई थी ,हाथ धुलवाने के बहाने मुग्धा ने फोल्ड कर दी थी , अखिल ने सोनू की कलाइयाँ देखीं तो एक दर्द की लहर उसकी आँखों से हो कर गुज़र गयी ,लेकिन उसने मुग्धा को इशारे से चुप रहने के लिए कहा ...
मुग्धा ने छूटे हुए क्रम को आगे बढ़ाते हुए राजुल से पूछा – “हाँ , तुम मधु के बारे में बता रहे थे न...”
राजुल ने कहा –“शादी के बाद से ही उसका व्यवहार बहुत अजीब होता चला गया ,जबकि हमारी लव मैरिज थी लेकिन बात बात पर शक करना ,ताने मारना ,मेरी किसी भी बात का उल्टा मतलब निकालना यह उसकी आदत में था लेकिन विभु की मौत के बाद तो उसका खुद पर जैसे कोई कण्ट्रोल ही नहीं रह गया है ..कभी कभी दौरे से पड़ जाते हैं उसे ...चीखने लगती है ..मुझ पर शक करती है कि मैं उसे मार डालूँगा ...अकेले खुद से बातें करती रहेगी कभी मन होगा तो घर के सब काम समय पर निबटा देगी वरना यूँही पड़े रहेंगे ..”
अखिल ने उसे बीच में ही रोक कर पूछा – “आपने कभी किसी डॉक्टर की सलाह नहीं ली ?”
राजुल बोला – “डॉक्टर को क्या दिखाना है ..? बीमार थोड़े ही है ..बस एक्टिंग करती है मुझे परेशान  करने के लिए “
मुग्धा बोली- नहीं राजुल –“ऐसा नहीं है ,हो सकता है उसे कुछ परेशानी हो ..”
राजुल बोला-“क्या परेशानी होगी ,हर चीज़ तो मुहैय्या है उसे ..पैसों की कोई कमी नहीं होने देता मैं ..शौपिंग का अंधाधुंध शौक ..कपडे गहने न जाने क्या क्या खरीदती रहेगी ..बातें भी सुनो तो ऐसी ज्ञान वाली की बड़े बड़े संत लोग भी पानी भरें .बस एक मुझसे ही न जाने क्या खार खाए रहती है ..”
 और राजुल  खुलता जा रहा था अखिल पूरे मनोयोग से उसको सुन रहा था और उसके वाक्यों से उसकी फितरत का अंदाज़ा लगा रहा था ...और मुग्धा  अखिल के मनोयोग को देख कर जान चुकी थी  कि चॉकलेट कैफ़े  का वह आउटलेट अखिल के क्लिनिक के चैम्बर  में परिवर्तित हो गया है ...

.
.
क्रमश:

Friday, October 26, 2018

मुग्धा: एक बहती नदी ( नवीं क़िस्त)


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( अब तक आपने पढ़ा : २५ साल बाद कॉलेज के दोस्तों के गेट टुगेदर में मुग्धा बचपन के दोस्त राजुल से मिलती है ,जहाँ राजुल का अभी भी वही पुराना अपरिपक्व और अस्तव्यस्त सोचों से ग्रसित व्यवहार देख कर उसका मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने का कीड़ा कुलबुलाने लगता है.. मुग्धा के पति अखिल एक जाने माने मनोचिकित्सक हैं और मुग्धा उनसे राजुल के बारे में डिस्कस करते हुए इस तरह के व्यवहार की जड़ों तक पहुंचना चाहती है ...)

अब आगे .....

अखिल गंभीरता से बोला, "देखो मुग्धा ,मैं राजुल
से मिला नहीं हूँ और न ही मेरी उससे कभी डायरेक्ट बात हुई है. तुमने जितना उसका बैकग्राउंड बताया उसी आधार पर मैं कुछ कह
सकता हूँ लेकिन हो सकता है वो आकलन पूरी
तरह सटीक न हो ..जो कुछ तुमने बताया उस
आधार पर यही कहा जा सकता है कि राजुल ने
बचपन से एक संकीर्ण दायरे में ही जीना देखा है
..उसकी मम्मी dominating नेचर की थी और
पापा घर की शांति के लिए उनकी हर बात चुप रह
कर मानने को बाध्य ..पापा की निरीहता का
एहसास राजुल के मन में घर कर गया और उसने
खुद के लिए एक अग्रेसिव बिहेवियर चुन लिया.
उसे खुद को ऊपर रखते हुए सामने वाली, चाहे वो
फ्रेंड हो बहन हो बीवी हो या प्रेमिका उसको नीचा
दिखाने  में संतुष्टि का एहसास होता है ,मम्मी ने
उस पर प्रतिबन्ध लगाये तो उसका बदला वो
विद्रोही व्यवहार अपना कर लेता है ..बहन के
ऊपर जो बंदिशें घर में देखी, समझता है कि  वही
मापदंड होने चाहिए किसी भी लड़की के लिए
..जोर से मत हँसो  ..बात मत करो.. अपोजिट
जेंडर के साथ खुले दिल से मत मिलो ...बहुत सी
सहज इच्छाओं का दमन करना पड़ा उसको इन
मापदंडों को निभाने और निभवाने में और वो दमन
ही उसकी कुंठाओं का मूल कारण है ...जो उसे
इन से आगे सोचने विचारने ही नहीं देता."

अचानक अखिल बात पलटते हुए बोला,  "अरे हाँ
मैं तो भूल ही गया बताना कि सेलेक्ट सिटी मॉल
में मार्क एंड स्पेंसर की ओपनिंग के तीन साल पूरे
होने पर  रेगुलर कस्टमर्स के लिए आज स्पेशल
डिस्काउंट का ऑफर है..चलो न हम लोग चलते हैं
..मुझे शर्ट्स लेनी हैं ..और तुम्हारा भी तो Olay
का ऑफर आया हुआ है २०% डिस्काउंट का
...दोनों काम हो जायेंगे. हम वहीँ लंच करके
मूड हुआ तो कोई मूवी देख लेंगे"

आवाज़ में शरारत भर कर बोला, "कम से कम
सन्डे को तो यार इन मनोवैज्ञानिक बातों से निजात
लेने दो मुझे."

मुग्धा हंस कर बोली, "मियाँ अखिल, मनोवैज्ञानिक
बातों से तो जनाब आप को कोई भी निजात नहीं
दिला सकता ..आपका तो जन्म  ही जन जन की
मानसिक गुत्थियाँ  सुलझाने के लिए हुआ है
..लेकिन जाइये माफ़ किया आज आपको... अब
उठिए और तैयार हो जाइए ..मैं तब तक किचन
समेटने की हिदायतें इन लोगों को दे देती हूँ."

१२ बजते बजते अखिल और मुग्धा मॉल के
लिए निकल चुके थे ..मॉल पहुँचने पर उन्होंने
देखा कि आज तो सेलिब्रेशन वाला माहौल है.
दरअसल इस मॉल की ओपनिंग एनिवर्सरी थी
और उसी उपलक्ष्य में मॉल में जैसे मेला सा लगा
हुआ था ..बंजी जम्पिंग ,बलून्स
और मिक्की माउस ,एंग्री बर्ड्स,टेडी बेअर्स  के
चोले में सजे किरदार इधर उधर बच्चों का
मन बहलाते दिख रहे थे. छोटे छोटे बच्चे उन के
साथ हाथ मिला कर  फोटो खिंचवा रहे थे. कोई
कोई फॅमिली की सेल्फी ले रहा था ..कुल मिला
कर बहुत ही रौनक वाला माहौल था ...

दोनों पहले 'Olay'  beauty products के रिटेल
शोरूम पर पहुंचे ..Olay Sales कन्सल्टंट उन
दोनों को देखते  ही आवभगत के लिए उठ आई.
मुग्धा को  देख कर मुस्कुराते हुए बोली –"Ma'm,
you are looking very gorgeous ..बहुत
दिन बाद आई आप...भारत में नहीं थी क्या ?"

अखिल फुसफुसा कर बोला –कस्टमर फँसाना
कोई इनसे सीखे..अब बोलेगी कि आप Olay
प्रोडक्ट यूज़ जो करती हैं इसीलिये  तो आपकी
स्किन बहुत अच्छी है ..मुग्धा  की हँसी नहीं रुक
रही थी अखिल को उस लड़की की नक़ल करते
देख कर लेकिन वो गंभीर बनी रही और अपनी
ज़रुरत का सामान आर्डर कर के बिल अखिल की
तरफ बढ़ा दिया .

अखिल बोला, "लो यहाँ भी जेब मेरी ही कटनी थी
क्या ... इसे कहते हैं अपना पैर कुल्हाड़ी पे दे मारना."

मुग्धा बोली चलो अब मार्क पर चलते है...अखिल
ने बिल पे करके पैकेट उठाया और बोला, "जो
हुकुम मेरे आका !"

दोनों प्रसन्न मन मार्क-स्पेंसर की ओर चल दिए थे
तीसरी वर्षगाँठ के उपलक्ष्य में शोरूम को बहुत
सुन्दर सजाया गया था ..हर आने वाले कस्टमर
को स्पेशल फील करते हुए एक एक रोज-बड दी
जा रही थी और एक काउंटर पर एक ट्रे में
खुशबूदार आर्गेनिक ड्रिंक्स रखे थे ..मुग्धा की
नज़र उधर उठते ही शोरूम का एक एम्प्लोयी उसे
उन फ्लेवर्स  की डिटेल्स देने के साथ टेस्ट करने
का आग्रह करने लगा ..मुग्धा को नयी चीज़ें ट्राई
करने का बहुत शौक था. रेफ्रेशिंग ड्रिंक्स देख
कर गर्मी की उस दोपहर उसने  हलके हरे रंग का
आँखों को शीतलता देता हुआ ड्रिंक उठा कर होठों
से लगा लिया ..तब तक अखिल ने अपने लिए
कुछ शर्ट्स सेलेक्ट कर ली थी और अब फाइनल
चुनाव और स्टैम्पिंग मुग्धा द्वारा होनी थी.

तभी शोरूम के इनफार्मेशन स्पीकर से एक
अनाउंसमेंट हुआ ... “कृपया ध्यान दें , एक बच्चा
जिसका नाम सोनू है ,उम्र कोई ८ वर्ष, गोरा रंग,
नीली आँखें ,घुंघराले बाल ,रेड एंड  ब्लू स्ट्राइप्स
की फुल टी शर्ट और ब्लू जीन्स पहने हुए है अपने
पापा से बिछड़ गया है. उसके पापा यहाँ
इनफार्मेशन काउंटर पर हमारे पास ही हैं. अगर
सोनू हमारी आवाज़ सुन रहा हो तो प्लीज़ काउंटर
पर आ जाए.यदि किसी को भी वह बच्चा मिलता
है तो उसे ले कर सीधे इनफार्मेशन काउंटर पर आ
जाएँ ,सोनू के पिता बहुत परेशान हैं,

अनाउंसमेंट सुन कर अखिल ने मुग्धा की तरफ
देखते हुए बोला, "हद्द है यार लोग कैसे लापरवाह
हो जाते हैं छोटे बच्चे की तरफ से. मुझे तो उसका
डिस्क्रिप्शन सुन कर ही लग रहा है कितना प्यारा
बच्चा होगा.

मुग्धा ने कहा, "छूट गया होगा साथ ..भीड़ भी तो
बहुत है.
"चलो ! शर्ट फाइनल करते हैं और ध्यान से देखते
हैं. शायद हमें ही दिख जाए सोनू."

अखिल की चुनी हुई शर्ट्स में से 4 शर्ट फाइनल
कर के बिल पेमेंट करके अखिल और मुग्धा
शोरूम से बाहर  निकले ही थे कि अखिल सामने
से आते सोनू से टकरा गया. इस टकराने पर पहले
से सहमा हुआ सोनू और भी रुआंसा हो गया
..अखिल ने लपक कर उसे गोद में उठा लिया
..और न जाने क्या था अखिल के स्पर्श में जैसे
कोई गौरैया का नन्हा कोमल सा बच्चा गौरैया के
पंखों में छुप जाता है. सोनू अखिल के सीने में
दुबक गया था. अखिल ने उसे बाँहों में कस लिया
था.सोनू का खोया खोया चेहरा और सूनी आँखें
अखिल के स्नेहिल स्पर्श से पल भर को चमकी थ
और फिर जैसे बुझ गयी थी.

संवेदनशील मुग्धा का अंतर्मन इस दृश्य से भीग
उठा ..उसने सोनू के घुंघराले बालों में हाथ फिराते
हुए प्यार से कहा, "डरो नहीं बच्चा ! अभी चलते हैं
पापा के पास."

और सोनू सबसे बेखबर अखिल की गर्दन में बाहें
डालें उसके कंधे पर अपने गाल टिकाये किसी
ठंडी फुहार की शीतलता को महसूस कर रहा था
और अखिल उसके स्पंदन पा रहा था, मन भीग
गया था अखिल का भी ..इतना प्यारा बच्चा ..ये
तो डिस्क्रिप्शन से भी ज्यादा प्यारा है ..लेकिन
इतनी वीरानी इसकी आँखों में ..बाल सुलभ
चंचलता का तो नामोनिशान नहीं ....क्या माता
पिता  से कुछ देर बिछड़ जाने का इतना असर
हुआ है इस मासूम पर ..सोचते सोचते उसने मुग्धा
के साथ इनफार्मेशन काउंटर की तरफ कदम बढ़ा
दिए.

पूरे रास्ते सोनू कस के चिपका रहा अखिल के
सीने से जैसे न जाने कब से तरस रहा हो ऐसे
संरक्षण को. काउंटर पर पहुँच कर एनाउंसर से
अखिल ने सोनू के पिता के बारे में पूछा तो उसने
सामने खड़े एक व्यक्ति की तरफ इशारा किया.

मुग्धा और अखिल ने एक साथ मुड़  कर देखा
और मुग्धा आश्चर्य से लगभग चीख ही तो पड़ी,
"अरे राजुल ..तुम !!! सोनू तुम्हारा बेटा है ..!
.
.
.
.

.क्रमश:

Wednesday, October 17, 2018

मुग्धा : एक बहती नदी (अंक ८ )


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मुग्धा चाय की ट्रे लेकर जब लिविंग रूम में  पहुँची तो
अखिल मगन होकर रंगोली के गानों के साथ ताल मिलाते
हुए झूम रहा था .”पूछे जो कोई मुझसे बहार कैसी होती है ..”.और अगली लाइन पर मुग्धा को आते देख बोला, -“नाम तेरा ले कर कह दूँ की यार ऐसी होती है “...."यारजी कुछ
भी हो,ओल्ड इज गोल्ड.. ये गाने कभी भी मन से नहीं उतर
सकते.

मुग्धा मुस्कुराते हुए चाय का एक कप अखिल के हाथों में
पकडाते हुए और एक ख़ुद लेकर बोली "अब गाने ही सुनते
रहोगे कि  आगे का भी कुछ सोचना है"

अखिल एयर इंडिया के महाराजा की तरह सीने पे हाथ
रख के झुकते हुए  बोला "जो मल्क़ा-ए-अखिल्स्तान हुकुम
दें....बंदा हाज़िर है ..."

मुग्धा नखरे से बोली –"नौटंकी ! कौन  कहेगा कि  तुम इस
शहर के टॉप मोस्ट सायकाटरिस्ट हो.पागलों का इलाज करते करते खुद पागलों जैसी हरकतें करने लगे हो"

अखिल नाटकीयता भरे मगर फ़लसफ़ाना अन्दाज़ में बोला,
"बेगम मुग्धाजान हर इंसान किसी ना किसी लेवल का
पागल ही होता है ...कुछ के हालात और माहौल 
उन्हें कुछ ज्यादा इम्बैलेंस  कर देते हैं बस इतना ही तो
फ़र्क़ है."

मुग्धा ताड़ गयी थी कि अब लोहा गर्म है और चोट करने
से अखिल का टेक्निकल  ज्ञान झरना शुरू हो सकता है
...झट से पूछ बैठी, "कैसे असर करते है माहौल और
सोशल रेस्पांसिज़ के हालात  किसी के व्यवहार पर ?"

अखिल पहले से ही समझ चुका था की आज मुग्धा से
पीछा छुड़ाना आसान नहीं, इसलिए गंभीरता औढ़  कर चाय
का सिप लेते हुए बोला, "देखो सोशल कंडीशनिंग किसी
भी व्यक्ति को ट्रेनिंग देने के लिए एक तरह का सामाजिक
प्रोसेस है  ताकि  वो समाज में स्वीकृत तौर तरीकों  आदर्शों
और  नियमों   के हिसाब से अपने व्यवहार को सुनिश्चित
करे ..और संस्कार मनुष्य अपने आस पास के माहौल से
इकठ्ठा करता है जैसे माता पिता ,टीचर्स ,राजनीतिबाज़
धार्मगुरु, मीडिया आदि किसी न किसी रूप में हमारी
कल्चरल वैल्यूज ,beliefs एथिकल सिस्टम को हमारे
सामने रखते हैं और इन सबके बीच हम खुद को कहाँ पाते
हैं यह सबसे  महत्वपूर्ण है."

मुग्धा बहुत ध्यान से सुन रही थी अखिल नमकीन बादाम 
कुतरता हुआ बोला – " पर्सनलिटी की ग्रोथ सोशल
कंडीशनिंग पर तो निर्भर करती ही है जो कि सोशल 
कल्चरल फैक्टर्स पर बहुत हद तक  निर्भर होती है .किसी
का भी व्यक्तित्व सिर्फ कल्चर पर निर्भर नहीं कर सकता
इंडिविजुअल डिफरेंसेस का फैक्टर भी बहुत मायने रखता
है. इसलिए एक सी कल्चर और माहौल  में पलने बढ़ने वाले
भाई बहिन भी कभी कभी बहुत ही अलग व्यक्तित्व रखते
हैं."

अखिल दम भर को रुका ,मुग्धा की तन्मयता देख कर आगे
बोला, "सबसे मुश्किल है किसी भी व्यक्तित्व का
मनोवैज्ञानिक आकलन ,मनुष्य मशीन तो नहीं बहुत कुछ है
.यदि सिगमंड  फ्रायड की माने तो मानव व्यवहार
चेतन,अचेतन और अवचेतन का सम्मिलित रूप है जो काम
या यौन द्वारा प्रभावित होता है ,फ्रायड के शिष्य एडलर और
जुंग ने लगभग आपके गुरु के मनोविश्लेषण सिद्धांत को ही
आगे बढाया यद्यपि उसने  फ्रायड के सेक्स पहलु पर
अत्यधिक जोर देने की बात को संतुलित किया था."

गला साफ़ करके और उसके बाद हलकी सी सीटी बजाते
हुए अखिल कह रहा था "व्यवहार बहुत बड़ा फैक्टर होता है
किसी भी इंसान को समझने में ..यधपि आज के दिन
ब्रिटिश अमेरिकन मनोवैज्ञानिक, रेमंड  बी कैटल द्वारा
प्रतिपादित ट्रेट अप्रोच पर आधारित व्यक्तित्व
सिद्धांत को एक बीते दिनों की बात समझते हैं लेकिन मैं
आज भी इसके बेसिक्स को स्वीकारता हूँ और अपने चिंतन
 में रखता हूँ ..केटेल ने चार प्रकार के ट्रेट्स पहचानी जो
मनुष्यों में कुल मिला कर पायी जाती हैं .
पहली है, कॉमन ट्रेट्स, जो सामान्य जनता में पायी जाती है
जैसे आनेस्टी , अग्रेशन  और कोऑपरेशन.

दूसरी होती  है, यूनिक ट्रेट्स जैसे temperamental और
इमोशनल रीऐक्शंस.

अखिल अब किसी राजनेता की मिमिक्रि कर रहा था,

"बहनों और भाइयों ! तीसरी को  कहते हैं, सरफ़ेस ट्रेटस जैसे कि Curiosity, dependebility,tactfullness"

अब "नौटंकीबाज़" अखिल मदारी के अन्दाज़ में बोल रहा था,

"मेहरबान क़द्रदान !......और चौथी को उस्ताद कहते हैं सोर्स ट्रेटस जैसे dominance, submission,emotionality वग़ैरह."

मुग्ध हो रही थी मुग्धा कि उसका मियाँ कितना हुनरमंद है कि सामने वाले को  बांधे रखने के ज़मीनी गुर जानता है.

मुग्धा पूछ बैठी, "उस्ताद ! यह तो बताओ कि किया कैसे जाता है आकलन किसी के व्यक्तित्व का ?"

शांत भाव से अखिल चाय का सिप लेते हुए बोला, "यह
जानने  के लिए कि व्यक्ति कैसे व्यवहार करता है
वास्तविक जीवन  स्थितियों में वे हैं : ऑब्जरवेशन
टेक्निक्स और situational tests ,लेकिन हमें व्यक्ति
की आत्मकथा (स्वक्ति),प्रश्नोत्तर जीवनी (परकथ्य) आदि
को भी कंसीडर करना होता है."

मुग्धा को इंटरेस्ट आ रहा था किन्तु कभी कभी ऐसा भी लग
रहा था कि कहीं अखिल उसे थकाने के लिए तो इस तकनीकी लेक्चर को लम्बा खींच रहा है ताकि मुग्धा थक हार कर विषय से  रुखसत ले ले...लेकिन मुग्धा जानती थी इस
मनोवैज्ञानिक से काम करवाना, अखिल सयिकोलोजिस्ट
था तो वो सुपर सयिकोलोजिस्ट.

बोली, "अच्छा अब नाश्ता लगाती हूँ बाकी बातें नाश्ते पर
होंगी ...और थोड़ी ही देर में पकोड़ों और हलवे की खुशबु से
घर महक उठा ..और कुछ ही देर में सद्यःस्नाता मुग्धा खूबसूरत महेश्वरी साड़ी में सजी अखिल की मनपसंद नोरिटा की सफ़ेद और सिल्वर क्राकरीसे सजी हुई नाश्ते की ट्रे
ले कर रूम में दाखिल हुई .

अखिल देखते ही निहाल हुआ सा  बोला, "भाई आज तो क़त्ल का पूरा साजो सामान ले कर चली हैं मोहतरमा."

भाप उड़ाती चाय और सोंधी सोन्धी पकोड़ों की खुशबू से अखिल पूरे मूड में आ गया ,लपक कर एक पकोड़ा उठा के मुंह में डालते ही बोला, "यार तुम कमाल हो,क्या ज़ायक़ा है हाथों में...जी करता है चूम ही लूं ."

मुग्धा  आँखों में ढेर सा प्यार भर के बोली -
"अखिल यार वह राजुल वाले सब्जेक्ट पर कुछ प्रैक्टिकल
पहलुओं को बताओ न ..मैं तो आज तुम्हारे श्री मुख से
राजुल के व्यक्तित्व का आकलन जानना चाहूंगी ..सुना है डाक्टर अखिल कांफ्रेंसेज में केस स्टडीज पर प्रेजेंटेशन दे कर झंडे गाड़ देते हैं."

प्यार करने वाला मर्द अपने पेशे में चाहे जितना भी
लोकप्रिय और सफल हो अपने जीवनसाथी की आँखों और
जुबान पर अपना नाम पेशे के एक्सपर्ट के रूप में भी चाहता
है मानों संगिनी एग्जामिनर हो और वो खुद एक नम्बर पाने
का इच्छुक स्टूडेंट.

शुरू हो गया था अखिल....,



क्रमशः

Sunday, October 14, 2018

मुग्धा : एक बहती नदी (अंक ७)



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अब तक का सार संक्षेप : मुग्धा एक उदार विचारों वाली सुसंस्कृत युवती है. उसका जीवन साथी अखिल एक मनोचिकित्सक. दोनों के बीच पति पत्नी से कहीं अधिक दोस्तों जैसा रिश्ता और आपसी समझ है. राजुल मुग्धा का बचपन का सहपाठी व्यक्तित्व में हीनभाव, सामाजिक पारिवारिक अनुकूल के चलते स्त्रियों के बारे में दक़ियानूसी सोच, असफलता जनित कुंठाएँ, राजुल का मुग्धा का कोलेज साथियों की पार्टी में मिलना, व्यंग्यात्मक और आधिकारिकता की बातें करना. मुग्धा का करुण हृदय अपने बचपन के दोस्त राजुल की मदद करना चाहता है अपने संगी अखिल की सहायता से.

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अंक सातवाँ
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अखिल की आवाज़ से मुग्धा ख़यालों से वापस लौटी ...अखिल कह रहा था कहाँ खो गयीं मैडम !! ज़रा कुछ चाय शाय इस गरीब को भी मिल जाती तो .....
 मुग्धा मुस्काराते हुए चाय बनाए चल दी  ...और अखिल उठ कर उन दोनों की पसंदीदा गज़लों का CD लगाने लगा ..फिज़ा में मेहंदी हसन की मखमली आवाज़ “ ज़िन्दगी में तो सभी प्यार किया करते हैं “...बहने लगी ...चाय की ट्रे ले कर आती मुग्धा को अर्थपूर्ण मुस्कराहट के साथ देखता हुआ अखिल गुनगुना उठा “ मैं तो मर कर भी मेरी जान तुझे चाहूँगा ... और मुग्धा के गाल किसी किशोरी की तरह लाल हो उठे .... और अखिल खिलखिला कर हंस पड़ा ,बोला – यही रंग देखना था मुझे ..यार इतने गंभीर डिस्कशन तुम्हारी शोखी चुरा लेते हैं ....

मुग्धा कुछ कह पाती इससे पहले अखिल के फ़ोन की घंटी बज उठी ... अखिल ने एक नज़र मुग्धा पर डाली और फ़ोन उठाया ,डॉ वर्मा थे दूसरी तरफ ..अखिल ने कहा कि  कुछ अर्जेंट न हो तो वो उनको १५ मिनट बाद कॉल बैक करता है ...और मुग्धा मुस्कुरा दी .. अखिल की ऐसी ही बातें उसके मन को गहरे छू जाती हैं...

फ़ोन रख कर अखिल ने मुग्धा की आँखों में झाँका और बोला-अब कहिये जनाब ...

मुग्धा जानते बूझते बोली –फ़ोन क्यूँ रख दिया ..बात कर लेते ...

अखिल शरारत से बोला –अरे चाय ठंडी हो जाती ....और फिर मेहँदी हसन साहब भी तो बुरा मान जाते ....कहते हुए खिलखिला दिया ...

अगले दिन इतवार था ...अखिल और मुग्धा के लिए रिलैक्स्ड दिन ....मुग्धा उनींदी  ही थी जब हर इतवार की तरह अखिल चाय की ट्रे ले के हाज़िर हो गया ..भोर की किरणों ने मुग्धा के चेहरे  को और भी रौशन कर दिया था .. मुग्धा के माथे पर चुम्बन अंकित करते हुए अखिल ने उसे जगाया तो मुग्धा को लगा जैसे पूरी कायनात उसकी बाहों में सिमट आई है....उससे ज्यादा खुशनसीब इस दुनिया में कोई नहीं ..अखिल के २० सालों के साथ ने उसे कितना कुछ दे दिया है ... उसके व्यक्तित्व को निखारने से ले कर उसकी मेधा को सही दिशा देने में हर समय अखिल उसके साथी के रूप में कदम दर कदम चला है ....

चाय का घूँट लेते हुए मुग्धा ने कहा – कितने साल हो गए तुमको चाय बनाते हुए ...

अखिल बोला –यार अब तुम जैसी नहीं बनती तो नहीं बनती ... पता नहीं  तुम्हारे हाथों का स्वाद आ जाता है क्या चाय में ...

मुग्धा खिलखिला उठी ,बोली –दिल से नहीं बनाते होगे न... मन तो तुम्हारा भटकता रहता है अपनी गोपियों में जो पेशेंट बनकर तुम कान्हा संग रास रचाने चली आती हैं कंसल्टेशन और काउन्सलिंग के बहाने.....

अखिल मुंह लटका के बोला –यार मैं तो अपनी पूरी बीइंग से बनता हूँ ..अपनी प्यारी बीवी के लिए ..लेकिन उसे कभी पसंद ही नहीं आती .....अब दूसरा राउंड खुद ही बनाये ...तो मुझे भी तृप्ति मिले ...

बेचारा अखिल गोपियों के बाबत अपनी ऐयर क्लीयर करे इस से पहले ही मुग्धा अगला राउंड चाय बनाने  के लिए उठ गयी और अखिल ने  लिविंग रूम में आ कर TV ऑन कर दिया ..इतवार की सुबह दोनों का पसंदीदा प्रोग्राम ‘रंगोली’ शुरू हो रहा था .. रंगोली के दौरान दोनों जैसे बच्चे बन जाते थे ...मुग्धा का फ़िल्मी गानों के प्रति बहुत रुझान था और उसे ज्यादातर गानों की जानकारी होती थी मसलन कौन सिंगर कौन सी मूवी कौन से एक्टर और उसे इसका गुमान भी था .. अखिल से पूछ बैठती कि  पहचानों कौन एक्टर और अखिल जानबूझ कर गलत बताता ...और मुग्धा बहुत गर्व से कहती नहीं ये नहीं है ..अखिल कहता लग जाए शर्त १००-१०० की .... और फिर हार जाता ...और मुग्धा शर्त जीत के खुश होती और अखिल उसकी ख़ुशी से...आज भी यही हुआ ....गाना बज रहा था “ये पर्वतों के दायरे ...” और हीरोइन थोडा कम जानी पहचानी सी थी....मुग्धा इतरा  के बोली बताओ कौन है....अखिल को नाम याद तो आ रहा था लेकिन वो मुग्धा के उत्साह पर पानी नहीं फेरना चाहता था ..बोला मुमताज़ लग रही है ...मुग्धा खिलखिला के हंस पड़ी...बोली तुमको तो सब एक सी लगती हैं ...अखिल बोला अरे नहीं..वही है... लगा लो शर्त... मुग्धा बोली आज तो १००० की लगाउंगी ..अखिल बोला भाई ये ज़ुल्म क्यूँ ..मुग्धा बोली -मुमताज़ तुम्हारी फेवरिट हीरोइन है और उसे ही नहीं पहचानते ...ये तो शर्त के साथ साथ जुरमाना भी हुआ .... अखिल भी अड़ गया कि  मुमताज़ ही है ...लग गयी शर्त ..और फिर मुग्धा ने बड़े गर्व से बताया की ये कुमुद चुगानी है ... और अखिल झूठा मातम मनाता हुआ सर पकड़ के बैठ गया “ लो इतवार की सुबह सुबह चूना लगवा दिया” ..और इन खुशनुमा पलों को जीते हुए दोनों ने सन्डे टाइम्स उठा लिया ..

मुग्धा की नज़र ह्यूमन साइकोलॉजी पर आधारित एक आर्टिकल पर पड़ी और उसने अखिल से कुछ पूछने को मुंह खोला ही था कि अखिल ने उसके हाथ से पेपर छीन लिया..बोला-“बस अब तुम शुरू हो जाओगी मेरा दिमाग खाली करने को..यार सन्डे को तो इन सब को backfoot पर रख दो.. चलो movie देखने चलते हैं “ ...कह कर पेपर  में नज़रें दौड़ाने लगा एक एक करके सब मूवीज के नाम बताये लेकिन मुग्धा का मन किसी पे अटका ही नहीं उसके दिमाग में तो साइकोलॉजी का कीड़ा कुलबुला रहा था और राजुल उसके दिमाग से हट नहीं रहा था ...उधर अखिल मूड में नहीं था गंभीर विषय को छूने के लिए ...

मुग्धा को अनमना देख अखिल पूछ बैठा- क्या हुआ देवी जी ..अब कौन सा कीड़ा घुस गया दिमाग में ...

मुग्धा बोली –यार आर्टिकल में लिखा है कि सोशल कंडीशनिंग का बहुत व्यापक असर होता है इस तरह की सोचों और व्यवहार पर.. राजुल के बारे में सोच रही थी की उसका व्यवहार इतना अजीब क्यूँ हैं ..रात तुमने  बात को उसके इन्फिरियोरिटी काम्प्लेक्स की तरफ घुमा दिया  और उसके मेरे प्रति अजीब व्यवहार के कारण को टाल गए   ....

अखिल ज्ञानी की मुद्रा में बोला- “बालिके !!! जितनी तुम्हारी पाचन शक्ति है उतना ही परोसूँगा न मैं ...कल भर के लिए उतना काफी था फिर एक layman की तरह बाकी बातों को टच किया था न उसमें कौन सी राकेट साइंस है ...अब तुम्ही देखो न..बचपन से देखा है मुग्धा देवी ने अपनी माताश्री को अपने पापा पर हुकुम चलाते तो  इस मासूम अखिल पर वही अप्लाई हो जाता है..” छेड़ते हुए बोला अखिल

मुग्धा सुन के चिढ़ गयी बोली- कब मैंने हुकुम चलाया तुम पर ...

अखिल ठहाके लगा के हंसा और शरारत से गाने लगा “जान मेरी रूठ गयी जाने क्यूँ हमसे ...आफत में पड़ गयी जान “ ...

मुग्धा भी उसकी अदाओं पर अपनी हँसी नहीं रोक पायी  ...लेकिन उसको तो राजुल की सोशल कंडीशनिंग की तह तक पहुंचना था ..अखिल को पटाने का तरीका जानती थी वो..

बोली – गोभी के पकोड़े और सूजी का हलवा खाओगे नाश्ते में.... अखिल के चेहरे पे ज्यूँ १००० वाट का बल्ब जल गया हो...बोला हाँ हाँ क्यूँ नहीं ..लेकिन उससे पहले एक चाय और चाहिए .... मुग्धा उठ के चाय बनाने चल दी और अपनी कुक को ज़रूरी इंस्ट्रक्शन दे कर बोली तुम सिर्फ तैयारी करो..मैं खुद बनाउंगी आज सब कुछ ..





(क्रमशः)

Wednesday, October 10, 2018

मुग्धा : एक बहती नदी (भाग ६)


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(अब तक आपने पढ़ा कि कॉलेज फ्रेंड्स के 25 साल बाद मिलने पर मुग्धा अतीत से होते हुए वर्तमान के राजुल तक पहुंचती है ..उसके व्यवहार से क्षुब्ध मुग्धा उसके इस व्यवहार के पीछे छिपे कारणों को जानने को उत्सुक हो उठती है ...अब आगे ....)
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घर आ कर उसने अखिल को राजुल द्वारा  की गयी टिप्पणियों के बारे में बताया.. अखिल ने कहा -" यह बहुत जड़ों तक पैठ जाता है कई लोगों के दिमाग में ..लड़की लड़के का फ़र्क ..लड़कियों के लिए बनाये हुए कुछ मानक जो न जाने किन परिस्थितियों में इजाद हुए ..और खुद की कुंठित भावनाएं इन सभी का मिला  जुला असर पड़ता है एक व्यक्ति की सोच पर ..तुम तो राजुल और उसके परिवार को बचपन से जानती हो ..कैसा था इसका बचपन का बैकग्राउंड ??

मुग्धा ने बताया- उसके मम्मी पापा संकीर्ण सोच रखते थे ...उस पर घर वालों के मापदंडों का बहुत प्रेशर था ,यह करो यह मत करो ..पढाई में अव्वल रहो ,ऊंचा चरित्र रहे इसके लिए लड़कियों से दूर रहो ...हर बात में critisize करते थे उसके परिवार के लोग ..उसे कुछ नया करते देख बोलते कि पढाई करो ये सब काम नहीं आएगा ..बारहवीं क्लास में उसने एक ट्रांसमीटर बनाया था उस पर भी उसकी तारीफ करने के बजाय यही बोला गया कि समय और पैसे की बर्बादी..बारहवीं के बाद इंजीनियरिंग में दाखिला नहीं मिल पाया था तब भी बहुत सुनने को मिलता था उसे ..हमारे साथ के एक लड़के के नम्बर इससे कम होते हुए भी उसे reservation policy के तहत एक प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग institute में एडमिशन मिल गया था उसका भी बहुत नकारात्मक असर हुआ था राजुल पर.

अखिल बहुत गंभीरता से मुग्धा की बातें सुन रहा था ,एक गहरी हुंकार के साथ उसने कहा – इसीलिए उसके व्यवहार में एक तरह का विद्रोह पनप गया था ,वह  अटेंशन और अप्रूवल के लिए लोगों का मुंह देखता था और खुद के प्रति हीन भावना घर कर गयी .

अपना चश्मा उतार कर मुग्धा को निहारता हुआ अखिल बोला:
 "an inferiority complex occurs when the feelings of inferiority are intensified in the individual through discouragement or failure .

 राजुल में इस inferiority complex का बीज उसी समय पड़ गया था जो आज एक भरा पूरा वृक्ष बन चुका है और इसी के चलते शायद वह suffer कर रहा है ....आजकल मनोवैज्ञानिक inferiority complex को “ lack of covert self esteem” भी  कहते हैं ."

मुग्धा ने पूछा –क्या इस हीन भावना का असर हमेशा नकारात्मक ही होता है ?

अखिल बोला : Alfred Adler नामक मनोवैज्ञानिक के अनुसार हम सभी में inferiority की फीलिंग होती है ,यह कोई बीमारी नहीं है बल्कि यह स्वस्थ सामान्य जीवन जीने के प्रयास के लिए stimuli हो सकती है यदि हम इसको समझ सकें और सकारात्मक दृष्टिकोण अपना कर इसे रूपांतरित कर सकें ..
हाँ !यह एक बीमारी जैसी अवस्था में बदल जाती है जब व्यक्ति  को खुद की अनुपयोगिता का एहसास बहुत गहरा होने लगे और वो प्रेरित होने के बजाय एंग्जायटी और डिप्रेशन की तरफ जाने लगे ..ऐसे केस में डेवेलप होने के बजाय डिक्लाइन होने लगता है इंसान और राजुल का केस कुछ ऐसा ही लगता है ..रहा सवाल उसके विकृत नजरिये का तो बचपन की टोकाटाकी ,लड़की लड़कों में फरक करना उसके अस्वस्थ मन में जड़ें जमा गया है ...पुरुषों को अधिकारिक्ता और possesiveness का एहसास हमारा समाज सदियों से कराता आया है और इसीलिए पुरुष और स्त्री के बीच मित्रता का खयाल  ही ऐसी कुंठित सोच वाले पुरुषों को अस्तव्यस्त कर देता है ..उनको लगता है कि स्त्री को लगाम को खींच कर रखना चाहिए ..जबकि उन्हें यह नहीं पता कि बेलगाम तो उनके अंदर की दमित भावनाएं हैं जो किसी स्त्री को सहज व्यवहार करते देख सरपट दौड़ने लगती है और जिसका दोषारोपण वे उस स्त्री पर करते हैं ....एक सीमित परिधि में देखना  और कुछ परिभाषाओं में किसी भी व्यक्तित्व को फिट करने की कोशिश  करना ऐसी सोच को बढ़ावा देता है ..सही गलत का निर्धारण ऐसे लोग अपनी मान्यताओं के हिसाब से करने लगते हैं ..और यह नहीं समझ पाते कि दूसरों से अधिक उनका खुद का नुकसान हो रहा है.. मित्रता  से वंचित ..मित्र न मिल पाने का दोष पूरे ज़माने पर रख देते हैं .. उनके दुखों के लिए हर कोई जिम्मेदार होता है .. सिर्फ उन्हें खुद को छोड़ कर...."

मुग्धा ने कहा -' हाँ ..पुराना मित्र होने के नाते मुझे उससे सहानुभूति है .. मैं चाहती हूँ कि वह ज़िंदगी को विस्तृत तौर पर देख पाये ..हो सकता है अभी तक उसकी कुंठित सोच को झकझोरने वाला कोई न मिला हो .. कई बार जिसे हम मित्र समझते हैं वही हमारी कुंठाओं को बढ़ावा देने वाला साबित होता है ..दूसरे आयाम न दिखा कर उसी सोच को समर्थन देना मित्रता कतई नहीं ..एक मित्र होने के नाते मैं उसे इस तरह की सोचों के दलदल से बाहर  निकालना  चाहती हूँ ..सफल होना या न होना अलग बात है..किन्तु ईमानदारी से प्रयास करना चाहती हूँ .."

अखिल ने कहा - " हाँ यही तो एक होशमंद इंसान होने के नाते हमारा कर्तव्य है ..यदि हमें कोई बात ऐसी लगती है जो किसी को  एक बेहतर जीवन जीने में सहायता कर सकती है उसे हमें दूसरों तक पहुँचाना अवश्य चाहिए ..अपनाना या न अपनाना उसकी मर्जी ..बस एक बात का ध्यान रखना ..वह तुम्हारे लिए ओवर प्रोटेक्टिव है ..कहीं कोई गहन भावना भी है ..तुम्हारी इस कंसर्न को वह कहीं एक 'प्रेम प्रसंग' समझने की भूल भी कर सकता है ..तुम मदद की मंशा लिए एक मनोविज्ञानिक केस स्टडी करते करते खुद न उलझने लगो.."

मुग्धा शरारत से मुस्कारते हुए कहा - " मेरा इलाज तो तुम कर ही लोगे .." और इसके साथ ही दोनों हंस पड़े ..मुग्धा मन में सोचने लगी कि कितने पति पत्नी होते होंगे इस तरह के मित्र .!! क्यूँ समझ नहीं पाते कि यह रिश्ता इसी मित्रता की भावना से पनप सकता है सुन्दर फूल खिला सकता है और इसी तरह की नयी पौध भी तैयार कर सकता है ...जीवन का सबसे गहन रिश्ता किस तरह परम्पराओं और मान्यताओं की भेंट चढ जाता है लोग कभी जान ही नहीं पायेंगे शायद ..




क्रमशः