खाना खा कर संजय तो सोने चला गया .रेवती रसोई समेट ही रही थी कि चंद्रप्रभा जी का कॉल आया.उन्होंने उसकोअखबार में फोटो छपने की बधाई दी और कहा कि आज शाम एक छोटा सा सांस्कृतिक कार्यक्रम है विकलांग बच्चोंके लिए चल रहे एक चेरिटेबल ट्रस्ट के सौजन्य से..तुमको वहां गाना गाना है..रेवती ने असमर्थता जता दी..चंद्रप्रभाजी ने पूछा -"क्यूँ क्या हुआ? "
रेवती ने कहा -"संजय आये हुए हैं और मैं नहीं आ पाउंगी "..
चंद्रप्रभा जी ने खुश हो कर कहा -"अरे यह तो बड़ी अच्छी बात है..उनको भी साथ ले कर आना" ...
रेवती ने कहा -"उनको शौक नहीं है इन सबका.."
चंद्रप्रभा जी ने कहा -"वह ना आना चाहे अलग बात है पर तुम क्यूँ नहीं आओगी? "
रेवती इस पर चुप रह गयी ..समझ नहीं पाई की क्या जवाब दे.. चंद्रप्रभा जी अविवाहित महिला हैं.स्वतंत्र हैं .वहक्या जाने एक विवाहिता की मजबूरियां .चंद्रप्रभा जी ने फिर पूछा तो रेवती ने कहा -"बस ऐसे ही संजय को पसंदनहीं"..
चंद्रप्रभा दो क्षण को मौन हो गयी फिर उन्होंने कहा अच्छा अभी मैं तुम्हारे घर की तरफ से ही गुज़र रही हूँ.. तुम फ्रीहो तो मिलती चलूँ..रेवती ने हुलस कर उनका स्वागत किया..कहा -"बिलकुल ,आइये ना आपका ही घर है..".
चंद्रप्रभा ने कहा -"ठीक ..मैं १० मिनट में पहुँचती हूँ तुम्हारे घर ".
रेवती को तो यकीन नहीं हो रहा था .इतनी मशहूर महिला सिर्फ एक दिन की मुलाकात के बाद उससे मिलने उसकेघर आ रही है.. जल्दी जल्दी उसने ड्राइंगरूम ठीक किया खुद पर एक नज़र डाली अव्यवस्थित बालों को सही कियाऔर उनके इंतज़ार में बैठ गयी..
करीब १५ मिनट बाद बेल बजी..रेवती ने दरवाज़ा खोला और मुस्कुराती हुई चंद्रप्रभा जी घर में दाखिल हुई..सबसेपहले उन्होंने रेवती को भरपूर नज़र से देखा और कहा -"बड़ी प्यारी लग रही हो इस चंदेरी में.." रेवती सकुचागयी..यूँ सामने सामने प्रशंसा पाने की वो आदी नहीं थी पर मन को बहुत अच्छा लगा ..चंद्रप्रभा जी ने आगे कहा -" तुमको पारंपरिक साड़ी पसंद हैं ना.कल भी ढाकाई साड़ी पहनी थी " रेवती ने कहा -"जी "..मन में सोचा उसनेअदभुत है ये महिला..क्या ओब्सर्वेशन पॉवर है..मुझे तो याद भी नहीं की कल इन्होने क्या पहना था ".रेवतीचंद्रप्रभा जी के लिए निम्बू पानी बना कर ले आई और उसके बाद उन्होंने कहा की अब आराम से बैठो ..बहुत सीबातें करनी हैं तुमसे ..
रेवती असमंजस की स्थिति में बैठ गयी उनके साथ के सोफे पर .चंद्रप्रभा जी ने उससे उसके जीवन सम्बंधित प्रश्नपूछने शुरू किये.. कब शादी हुई..कब बेटी हुई.. कैसा अनुभव रहा शादी के बाद और कुछ बाद के सालों का..रेवतीसम्मोहित सी हो कर सब बताती चली गयी.. जिन बातों को अब तक वो व्यक्तिगत समझ कहीं ज़िक्र भी नहीं करतीथी वह सब उसने दिल खोल कर चंद्रप्रभा जी से कह डाला..गज़ब की कशिश थी उनके व्यक्तित्व में..और एक सुरक्षाका एहसास भी..जैसे कोई घने पेड़ की छाँव तले बैठा हो..चंद्रप्रभा जी पूरे ध्यान से सुनती रही चेहरे की मुस्कराहटज्यों की त्यों बनी रही.. और रेवती के मन के कपाटो का खुलना महसूस करती रही..
रेवती जब सब कुछ उंडेल चुकी यहाँ तक की संजय का आज का व्यवहार और उससे आहत उसका मन भी तबउन्होंने उसकी तरफ पानी का ग्लास बढाया .और कहा-"संजय को तुमने कभी बताया की तुम गाने का शौक रखतीहो? ".रेवती चुप..अपलक प्रभा जी को देखती रही..वह आगे बोली-देखो रेवती,भारतीय पारंपरिक विवाह की यहबहुत बड़ी विडम्बना है की इसमें दो आत्माओं का बंधन माने जाने वाले विवाह से दो आत्माएं बंधक हो जाती हैं .दोइंसान जो एक दूसरे के सत्व से अछूते होते हैं साथ रहने को बाध्य कर दिए जाते हैं समाज के द्वारा .और उनकी पूरीज़िन्दगी एक दूसरे के हिसाब से खुद को ढालने में निकल जाती है.इंसान खुद को जान नहीं पाता और दूसरे कीइच्छानुसार बनने की कोशिश करता रहता है.परन्तु दुनिया के हिसाब से ढल जाने वाले कभी भी अपने लिए एकखुशनुमा ज़िन्दगी नहीं जी पाते .हमारे समाज में विवाह के लिए सबसे पहले खानदान देखा जाता है फिर स्तरउसके बाद लड़के/लड़की की शैक्ष्णिक योग्यता .और सब कुछ ठीक रहा तो परिवार वालों की उपस्थिति में कुछबातें करने का मौका दिया जाना हमारे समय की आधुनिकता थी..आज की पीढ़ी कम से कम इस दिशा मेंसकारात्मक दृष्टिकोण अपना रही है..पर सही दिशानिर्देशन के अभाव में उनसे भी गलतियाँ हो जाती हैं."
रेवती हतप्रभ सी चंद्रप्रभा जी को बोलते सुन रही थी..और उसे सुकून महसूस हो रहा था क्युंकि जो सोचें अभी तकउसको उद्वेलित करती थी उन्ही को आज कोई शब्द दे रहा था
चंद्रप्रभा जी आगे बोली-"विवाह के बाद कुछ समय नए रिश्ते के उत्साह में निकल जाता है..फिर एक मोह का बंधनजुड़ने लगता है ...और स्वयं को पीछे छोड़ साथी की इच्छा के आगे समर्पित हो जाना विवाह की नियति मान लीजाती है..खासकर यह अपेक्षा नारी से ज्यादा होती है क्युंकि वही सहनशीलता की मूरत मानी जाती है..पर कईजगह नारी प्रभुत्व जमाती हो जाती है और पति निभाने कि कोशिश कर रहे होते हैं..मूल रूप से विवाह संस्थाआत्माओं का देवीय मिलन ना हो कर समझौतों का घर संसार बन जाता है..और जहाँ समझौते काम नहीं आते वहांतलाक की नौबत आ जाती है..तथाकथित सुखद वैवाहिक जीवन जीने वालों के अन्दर कितनी घुटन होती है यहतुम खुद महसूस कर चुकी हो..वह घुटन विवाह के कारण नहीं है..वह घुटन तुम्हारी अपनी उपज है.तुमने अपनीज़िन्दगी को इस तरह जिया है की तुम्हें घुटन महसूस होने लगी है..तुम्हारी आत्मा तड़प रही है अपनी पहचान केलिए..सबसे पहले तो उसे तुम्हें ही पहचानना होगा..तुम जब अपने साथ होती हो तो कितना खुश महसूस करती हो.. कल शाम की रेवती और आज की रेवती में ज़मीन आसमान का अंतर दिख रहा है मुझे ..पर यह अंतर तुमने खुदअपने मन में बोया है..परिस्थितियों को दोष दे कर खुद को निरीह बना लेना एक कमजोर इंसान की पहचानहै..ज़िन्दगी खुश रह कर बितानी है या दुखी रह कर यह इंसान के स्वयं के ऊपर निर्भर करता है।तुमने अपने मन मेंयह सोच लिया की संजय पसंद नहीं करेंगे या संजय के व्यवहार को देख कर तुमने निर्णय ले लिया कि तुम गानानहीं गाओगी . तुम्हारी आत्मा को जो कष्ट हुआ उसे तुम कैसे अनदेखा कर सकती हो॥जब तक तुम अपने कोपहचान कर अपने लिए सम्मान नहीं पैदा करोगी अपने मन में कोई दूसरा कैसे तुम्हारा सम्मान करेगा ...रहीसंजय के व्यवहार की बात तो यह भारतीय पुरुषों की बरसों की कंडिशनिंग का नतीजा है..स्वामित्व की चाह मेंउन्होंने पत्नियों को हमेशा ऐसे ट्रीट किया है कि वह अपने को दोयम दर्जे का ही समझ कर रहे तारीफ करना हमेशायूँही समझा है कि इससे उनके दिमाग ख़राब हो जाते हैं..भावनाएं ज़ाहिर करना भी पुरुषत्व की निशानी नहींसमझा जाता ..यदि कोई पुरुष अपनी भावनाएं ज़ाहिर करता भी है तो दुनिया उसे छिछोरा कहती है.. और इन सबसे बचने के लिए भावनाओं के होते हुए भी कई बार उनको तालों में बंद रखा जाता है.. संजय ने एक जिम्मेदार पतिऔर पिता का कर्त्तव्य निभाया है..पर वो जिम्मेदारी सामाजिक है..भावनात्मक जिम्मेदारी वह समझ ही नहीं पायाक्युंकि उसने कभी जाना नहीं इसका महत्व..उसके लिए भावनाएं जाहिर करना चोंचलेबाजी है ..तुम दुखी इसलिएहो जाती हो क्युंकि तुम्हें लगता है तुम्हारी कोमल भावनाएं आहत होती हैं.. तुम अपेक्षा करना छोड़ कर सहज रूपसे उसके साथ व्यवहार करो ।देखना उसकी खिन्नता और तीक्ष्नता कम होने लगेगी..पर सबसे ज़रूरी है अपनीआत्मा का विकास.."स्वार्थी"हो जाना पड़ता है ..इस शब्द का अर्थ भी शब्दकोष में दिया है..अपना मतलब साधनेवाला..परन्तु मैं इसका अर्थ लेती हूँ"स्व का अर्थ जिसने जान लिया वह स्वार्थी ".
-" , रेवती का मन अब काफी शांत था .उसने मुस्कुराते हुए चंद्रप्रभा जी से पूछा.-"आप अविवाहित होते हुए भी विवाहकी समस्याओं और पुरुष की भावनाओ को इतने अच्छे से कैसे समझती हैं ?"
चंद्रप्रभा जी मुस्कुरा उठी ,बोली-"भावनाओं को समझने के लिए विवाह की नहीं हृदय की ज़रुरत होती है,औरअविवाहित रहने का ये मतलब नहीं की मेरी ज़िन्दगी में कभी कोई पुरुष रहा ही नहीं ,विवाह तो एक सामाजिकव्यवस्था है वरना बिना कसमों और रस्मों के दो व्यक्तियों में कहीं ज्याद दृढ बंधन जुड़ सकता है .खैर इन सब बातोंको छोडो और अब शाम के कार्यक्रम पर पुन: विचार करो..अपनी अंतरात्मा से पूछो वह क्या चाहती है..और जिसकार्य को करने में किसी का अहित ना हो उसे करने से हिचको मत..किसी का आहत होना या पसंद ना करना उसकीअपनी मानसिकता कि निशानी है अपने अस्तित्व को मार कर तुम किसी का भी भला नहीं करोगी " ..
रेवती अपने मन के उदगार उड़ेलने के बाद बहुत हल्का महसूस कर रही थी . वह शाम के कार्यक्रम में गाने का मनबना चुकी थी कि संजय भी अपनी नींद पूरी करके ड्राइंगरूम में चला आया ..रेवती ने उसका चंद्रप्रभा जी से परिचयकराया..और शाम के कार्यक्रम के बारे में बताया ..संजय ने शुष्क भाव से कंधे उचकाते हुए कहा -"देख लो जैसातुम्हें ठीक लगे ..तुम तो स्वनिर्णय लेने में सक्षम हो .मेरे पीछे कौन सा हर काम मुझसे पूछ कर करती हो.."
रेवती की आँखें फिर भीगने को तैयार हुई की चंद्रप्रभा जी ने आँखों आँखों में उसे शांत रहने को कहा .. और उठते हुएबोली -"तब ठीक है रेवती..मैं ठीक ७ बजे गाड़ी भेज दूँगी तुम तैयार रहना ." फिर संजय की ओर मुखातिब हो करबोली -"आप भी आइयेगा साथ में ..हमें ख़ुशी होगी आपकी उपस्थिति से".
और नमस्कार करके वह रेवती से विदा ले कर चली गयी..रेवती जब उनको छोड़ कर घर में आई तो संजयअनमना सा बैठा था..रेवती चुपचाप चाय बनाने चली गयी..संजय सोच नहीं पा रहा था की रेवती को मना करे या नाकरे..रेवती ने भी तो कभी उसके मामलों में हस्तक्षेप नहीं किया ..और अब अगर वो अपनी ख़ुशी के लिए कुछकरना चाहती है तो वह क्यूँ उबल रहा है ..शायद कहीं उसके अहम् को चोट लगी है..कि उसको नहीं पता था किउसकी पत्नी गाना गाती है..कभी जानने की कोशिश ही नहीं की उसने रेवती को व्यक्तिगत रूप से.. उसने उसे बसएक पत्नी एक माँ और उसका घर सँभालने वाली ही समझा..कभी उसके एक व्यक्तिक रूप को क्यूँ नहीं देखा ..ऐसाक्यूँ होता है की शादी के बाद एक लड़की के सारे गुण छुप जाते हैं ..और उस पर अपेक्षाओं का बोझ डालकर उन परखरा उतरने की उम्मीद की जाती है.. शायद पहली बार संजय अपने रिश्ते के इस पहलू को देख रहा था औरसमझने की कोशिश कर रहा था ..
(क्रमश:)
Monday, March 29, 2010
Sunday, March 28, 2010
है तुझे भी इजाज़त...(चौथी किस्त )
एक अलग ही ऊर्जा का एहसास हृदय में समेटे रेवती सभी कलाकारों का धन्यवाद कहती घर को लौट आई .चंद्रप्रभा जी से फ़ोन नम्बर्स का आदान प्रदान हुआ और चंद्रप्रभा जी ने उसे ताकीद करी कि वह उनसे संपर्क बनाये रखेगी.हृदय से उठते आनंद को रेवती पहली बार महसूस कर रही थी .कुछ ऐसा जो उसका स्वयं का है, उसको , दुनिया ने सराहा है ,ये एहसास आनंदित कर रहा था उसे. ये सुखद क्षण स्नेहा से बाँट लेने का मन हुआ उसका पर वह तो इस समय पिता के साथ होगी यह सोच कर रोक लिया उसने खुद को ..एक अव्यक्त ख़ुशी के एहसास से परिपूर्ण भरपूर नींद ली उसने और सुबह तरोताजा मन से उठ कर संजय के आगमन कि तैयारियों में जुट गयी.उसकी पसंद का खाना ..उसके मन की गृह सज्जा.. घर का कोना कोना चमका डाला.स्वयं पर आश्चर्य हो रहा था कि संजय के आगमन का ऐसा इंतज़ार उसने कब से नहीं किया !! और यह सब करते हुए उसे ख़ुशी हो रही है भले ही संजय इन सबको देखे भी नहीं पर उसने अपने मन की ख़ुशी के लिए यह सब किया है इसलिए उसे शायद थकन भी महसूस नहीं हो रही ..करीब ११ बजे तक सब कामों से निवृत हो कर वह नहा धो कर तरोताजा हो गयी और काटन की चंदेरी साड़ी में उसका सुदृढ़ शरीर खिल उठा .४० पार की रेवती किसी भी तरह ३५ वर्ष से ज्यादा उम्र की नहीं लगती थी .आईने में स्वयं को देखा तो चौंक गयी ..यह बिना श्रृंगार के रूप कैसे दमक रहा है..समझ नहीं पायी कि चेहरा तो मन का दर्पण है..अंतर्मन तृप्त महसूस कर रहा है तो चेहरे पर उस तृप्ति कि छाया भी दिखाई पड़ रही है .. .. अभी इन विचारों में डूब उतर ही रही थी कि टैक्सी के रुकने की आवाज़ आई ..और संजय के बेल बजाने से पहले ही उसने दरवाज़ा खोल दिया .संजय रेवती का खिला खिला सा रूप देख कर चकित था ..पर प्रशंसा करना जैसे उसने सीखा ही नहीं था.ना जाने कौन सा काम्प्लेक्स उसको अन्दर ही अन्दर सालता था जिसके कारण रेवती में उसे कोई गुण नज़र नहीं आता था ॥ एक नज़र रेवती पर डाल संजय अन्दर चला आया ..और बहुत औपचारिकता से पूछा -"कैसी हो? " रेवती की आँखों में झिलमिलाते दीयों में जैसे पानी पड़ गया हो..चेहरा भी उतर गया उसका ..पर अगले ही क्षण उसने समझा लिया खुद को ..और संजय के लिए चाय बनाने रसोई में चली गयी ..संजय मुंह हाथ धो कर अखबार पढने बैठ गया था जब रेवती चाय बना कर लायी ॥ औपचारिक सा माहौल घुटन पैदा कर रहा था रेवती के मन में॥ स्नेहा होती थी तो वो सेतु बनी रहती थी दोनों के बीच ..अब जैसे बातों का कोई सूत्र ही हाथ नहीं आ रहा हो॥
अचानक से रेवती पूछ बैठी - " स्नेहा कैसी है ?" ..संजय ने चौंक कर अखबार से मुंह उठाया और हुंकार भरी - " ह्म्म्म अच्छी है ॥ स्मार्ट हो गयी है ।"
और फिर चुप्पी ..उफ़ रेवती का मन कर रहा था भाग जाये इस घुटन के महाल से कहीं दूर , जहाँ वह खुल कर सांस ले पाए ..
अचानक संजय ने अखबार से मुंह उठा कर कहा -" ये कौन सानया शौक पाल लिया है तुमने ?"
रेवती को कुछ समझ नहीं आया वह प्रश्नवाचक दृष्टि से संजय को देखने लगी.संजय ने अख़बार में छपे एक समाचार को उसके सामने फ़ेंक दिया ..रेवती ने अखबार उठा कर देखा उसकी तस्वीर छपी थी स्टेज पर बैठ कर गाना गाते हुए .साथ में उस संगीत संध्या की खबर छपी थी ..रेवती कुछ नहीं कह सकी चुपचाप नज़रें झुकाए बैठी रही ..हृदय की धड़कन यूँ बेकाबू हो रही थी जैसे वो कोई चोरी करती पकड़ी गयी हो.
संजय ने रूखे शब्दों में कहा - "बढ़िया है !वहां बेचारा पति पैसे कमाने के चक्कर में घर से बेघर रह रहा है और यहाँश्रीमती जी रास रंग में व्यस्त हैं॥
कट कर रह गयी रेवती ऐसी ओछी सोच का वो जवाब भी क्या दे ॥ सुबह के सारे उत्साह पर जैसे पानी पड़ गया हो..मन वितृष्णा से भर उठा ॥ इस इंसान के लिए कुछ भी करना बेमानी है॥
संजय तो यह कह कर नहाने चला गया और रेवती दिल ही दिल में आंसू गिराती रही॥ आँखों से छलकने को बेताब आंसू..रोकने सीख लिए थे उसने संजय के सामने॥ जहाँ कद्र ना हो वहां इन मोतियों को नहीं लुटाना चाहिए ..
इतने मन से बनाये खाने को परोसने का उत्साह भी ख़तम हो गया था रेवती का.यन्त्रचालित सी वह टेबल पर खाना लगा रही थी और सोच रही थी कि कैसे कटेगा यह एक महीना ऐसी घुटन के साथ ..संजय खाना खाने आया तो रेवती की मातमी सूरत देख कर भड़क उठा -" क्या यार इतने समय बाद घर आओ तो यह मुहर्रमी चेहरा दिखता है इसी लिए आना छोड़ दिया है मैंने" ..झुंझलाता हुआ वो खाना खाने बैठ गया ..रेवती की आँखें फिर भीग उठी॥संजय क्या कभी उसके मन को नहीं समझ पायेंगे ? ..चुपचाप वह खाना परोसने लगी॥ पहला कौर खाते ही संजय बोल उठा .-"बस यही चीज़ मिस करता हूँ मैं वहां..घर का खाना ."..रेवती को सुकून मिला कि कुछ तो अच्छा लगा संजय को..सरल हृदय रेवती जरा सी बात पर खुश हो जाती थी जरा सी बात पर आँखें भिगो लेती थी ..और यही व्यक्तित्व संजय समझ नहीं पाता था ..दो सर्वथा भिन्न प्रवृतियों के इंसान सिर्फ वैवाहिक रस्मों से एक दूसरे से कैसे जुड़ सकते हैं ये रेवती कभी नहीं समझ पायी..सारी ज़िन्दगी जैसे अपेक्षाओं और समझौतों में ही निकल जाती है और . उसी को लोग सुखद वैवाहिक जीवन का नाम दे देते हैं ॥
(क्रमश:)
अचानक से रेवती पूछ बैठी - " स्नेहा कैसी है ?" ..संजय ने चौंक कर अखबार से मुंह उठाया और हुंकार भरी - " ह्म्म्म अच्छी है ॥ स्मार्ट हो गयी है ।"
और फिर चुप्पी ..उफ़ रेवती का मन कर रहा था भाग जाये इस घुटन के महाल से कहीं दूर , जहाँ वह खुल कर सांस ले पाए ..
अचानक संजय ने अखबार से मुंह उठा कर कहा -" ये कौन सानया शौक पाल लिया है तुमने ?"
रेवती को कुछ समझ नहीं आया वह प्रश्नवाचक दृष्टि से संजय को देखने लगी.संजय ने अख़बार में छपे एक समाचार को उसके सामने फ़ेंक दिया ..रेवती ने अखबार उठा कर देखा उसकी तस्वीर छपी थी स्टेज पर बैठ कर गाना गाते हुए .साथ में उस संगीत संध्या की खबर छपी थी ..रेवती कुछ नहीं कह सकी चुपचाप नज़रें झुकाए बैठी रही ..हृदय की धड़कन यूँ बेकाबू हो रही थी जैसे वो कोई चोरी करती पकड़ी गयी हो.
संजय ने रूखे शब्दों में कहा - "बढ़िया है !वहां बेचारा पति पैसे कमाने के चक्कर में घर से बेघर रह रहा है और यहाँश्रीमती जी रास रंग में व्यस्त हैं॥
कट कर रह गयी रेवती ऐसी ओछी सोच का वो जवाब भी क्या दे ॥ सुबह के सारे उत्साह पर जैसे पानी पड़ गया हो..मन वितृष्णा से भर उठा ॥ इस इंसान के लिए कुछ भी करना बेमानी है॥
संजय तो यह कह कर नहाने चला गया और रेवती दिल ही दिल में आंसू गिराती रही॥ आँखों से छलकने को बेताब आंसू..रोकने सीख लिए थे उसने संजय के सामने॥ जहाँ कद्र ना हो वहां इन मोतियों को नहीं लुटाना चाहिए ..
इतने मन से बनाये खाने को परोसने का उत्साह भी ख़तम हो गया था रेवती का.यन्त्रचालित सी वह टेबल पर खाना लगा रही थी और सोच रही थी कि कैसे कटेगा यह एक महीना ऐसी घुटन के साथ ..संजय खाना खाने आया तो रेवती की मातमी सूरत देख कर भड़क उठा -" क्या यार इतने समय बाद घर आओ तो यह मुहर्रमी चेहरा दिखता है इसी लिए आना छोड़ दिया है मैंने" ..झुंझलाता हुआ वो खाना खाने बैठ गया ..रेवती की आँखें फिर भीग उठी॥संजय क्या कभी उसके मन को नहीं समझ पायेंगे ? ..चुपचाप वह खाना परोसने लगी॥ पहला कौर खाते ही संजय बोल उठा .-"बस यही चीज़ मिस करता हूँ मैं वहां..घर का खाना ."..रेवती को सुकून मिला कि कुछ तो अच्छा लगा संजय को..सरल हृदय रेवती जरा सी बात पर खुश हो जाती थी जरा सी बात पर आँखें भिगो लेती थी ..और यही व्यक्तित्व संजय समझ नहीं पाता था ..दो सर्वथा भिन्न प्रवृतियों के इंसान सिर्फ वैवाहिक रस्मों से एक दूसरे से कैसे जुड़ सकते हैं ये रेवती कभी नहीं समझ पायी..सारी ज़िन्दगी जैसे अपेक्षाओं और समझौतों में ही निकल जाती है और . उसी को लोग सुखद वैवाहिक जीवन का नाम दे देते हैं ॥
(क्रमश:)
है तुझे भी इजाज़त....(तीसरी किस्त )
संगीत संध्या के कार्यक्रम में सिर्फ ४ दिन बचे थे जब संजय का फ़ोन आया कि वो भारत आ रहा है एक महीने की छुट्टी पर ॥और इतेफाक से उसके आने की तारीख वही थी जिस दिन रेवती का संगीत कार्यक्रम था ..सुबह की फ्लाईट से दिल्ली आ कर शाम तक वो पहुँच जाएगा रूडकी ..सुनते ही रेवती को सबसे पहला खयाल अपने संगीत कार्यक्रम का हो आया ..अब क्या होगा..उसी दिन शाम को संजय आयेंगे तो वो कैसे जा पाएगी और संजय को तो उसके बारे में कुछ पता भी नहीं है कि वो यह सब शौक रखती है ..मन दुविधा में फँस गया.. संजय ये बात पसंद नहीं करेंगे कि उनके आने पर वो घर पर नहीं है..इसी उधेड़बुन में २ दिन निकल गए ..रियाज़ भी बंद हो गया ..हर समय सोचों में घिरी रहती ..मन को जैसे किसी ने पिंजड़े में बंद कर दिया हो और वह छटपटा रहा हो बाहर निकलने के लिए ..स्वयं की पहचान की राह में एक पत्नी की पहचान बाधाएं उत्पन्न कर रही थी .एक मन होता की संजय को बता दे फिर लगता कि उनकी प्रतिक्रिया अगर एक दम नकारात्मक आई तो ..इन्ही सब सोचों में डूबी थी कि स्नेहा का फ़ोन बजा .उधर से चहकती हुई आवाज़ सुन कर मन पर जैसे ठंडी फुहारें पड़ गयी ..पर माँ की उदास आवाज़ स्नेहा से छुप नहीं सकी..उसके पूछने पर रेवती ने अपनी उधेड़बुन स्नेहा को बता दी..उसने कहा वह इस कार्यक्रम में शिरकत करना चाहती है पर डरती है कि संजय को कह देने के बाद उसने मना कर दिया तो वह बिलकुल ही नहीं जा पाएगी और बिना बताये जाने में संजय के आने पर घर पर नहीं रह पाएगी ..स्नेहा थोड़ी देर सोचती रही ..और फिर उसने कहा कि मैं पापा को दिल्ली रोक लेती हूँ मेरे साथ समय बिताने के लिए और वह रूडकी अगले दिन चले जायेंगे ..सांप भी मर जाएगा और लाठी भी नहीं टूटेगी ..रेवती को भी ये आइडिया पसंद आ गया ..और स्नेहा ने संजय को फ़ोन मिला कर कहा "पापा,माँ से पता चला की आप ६ तारीख को दिल्ली आ रहे हो.. शनिवार है ना उस दिन..मैं फ्री होती हूँ..उस दिन आप यही रुक जाओ ना कब से आपके साथ तसल्ली से मिलना नहीं हो पाया है..सोमवार से मेरे टेस्ट हैं वरना मैं रूडकी चलती ..और हम तीनो साथ समय बिताते..पर अब आप एक शाम तो मेरे साथ बिता ही सकते हो..रूडकी आप इतवार को चले जाना "..संजय भौंचक सा सुनता रहा ..बेटी की ओर से ये आग्रह !!!!.. पर उसे भी अच्छा लगा ये सोचना कि वो स्नेहा के साथ समय बिताएगा .. ज़िन्दगी में भागते भागते शायद वो भी अब अपने बसेरे को मिस करने लगा था तो उसने हामी भर दी ..स्नेहा ने रेवती को खबर कर दी और रेवती के मन से धुंध हट गयी और वो उसी ग़ज़ल को गुनगुनाते हुए काम में जुट गयी जिसे उसने चुना था संगीत संध्या में गाने के लिए ..."रंजिश ही सही ..दिल ही दुखाने के लिए आ ..आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ " ..
शनिवार की शाम रेवती अपनी मनपसंद ढाकाई साड़ी में गरिमापूर्व व्यक्तित्व के साथ निश्चित स्थान पर पहुँच गयी..बहुत बड़ा आयोजन था देख कर रेवती को घबराहट होने लगी.. स्कूल कॉलेज में हुए फंक्शन्स में उसने स्टेज पर गाया था पर अब २० साल के बाद इतने बड़े जनसमूह के सामने गाने में उसे पसीने छूटने लगे ..स्नेहा की कमी उसे खलने लगी.. काश वह साथ होती ..कांपते कदमो से उसने प्रबंधकों को जा कर अपना परिचय दिया ..प्रबंधकों ने उसकी मुलाकात सुश्री चंद्रप्रभा जी से करवाई..रेवती ने उनका नाम काफी सुन रखा था स्थानीय समाचार पत्रों में उनका नाम प्राय: तीसरे दिन किसी ना किसी कार्यक्रम के सम्बन्ध में आता ही रहता था ..कभी कभी उनकी लिखी कहानिया और कवितायेँ भी रविवासरीय परिशिष्ट में उसने पढ़ी थी .उनको अपने सामने देख वह अभिभूत हो उठी और उनके व्यक्तित्व से बेहद प्रभावित..स्नेह से ओतप्रोत उनका चेहरा उसकी सारी घबराहट को दूर कर गया.. चंद्रप्रभा जी ने उससे परिचय का आदान प्रदान किया और उसको उस दिन कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले बाकी कलाकारों से मिलवाया ..१०-१५ मिनट में ही रेवती खुद को वहां का हिस्सा समझने लगी थी..
रेवती का नंबर जब तक आया तब तक उसकी सारी घबराहट आत्मविश्वास में बदल चुकी थी और उसने अपनी पूर्ण क्षमता के साथ ग़ज़ल प्रस्तुत करी..ग़ज़ल के शब्दों में जैसे उसके दिल का दर्द उतर आया था " आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ ..." सभी श्रोता उसके गायन में इतना डूब गए की हर किसी की आँखें नम थी ..
चंद्रप्रभा जी ने तो स्टेज से उतरते ही उसे गले से लगा लिया और कहा " कहाँ छुपी थी अब तक तुम ? ॥इतनी मीठी आवाज़ से अभी तक सुरों की दुनिया के प्रशंसकों को महरूम रखा ..." रेवती सकुचा गयी उसने तो कभी सोचा ही नहीं था की इतनी प्रशंसा की हक़दार है वह ...
(क्रमश:)
शनिवार की शाम रेवती अपनी मनपसंद ढाकाई साड़ी में गरिमापूर्व व्यक्तित्व के साथ निश्चित स्थान पर पहुँच गयी..बहुत बड़ा आयोजन था देख कर रेवती को घबराहट होने लगी.. स्कूल कॉलेज में हुए फंक्शन्स में उसने स्टेज पर गाया था पर अब २० साल के बाद इतने बड़े जनसमूह के सामने गाने में उसे पसीने छूटने लगे ..स्नेहा की कमी उसे खलने लगी.. काश वह साथ होती ..कांपते कदमो से उसने प्रबंधकों को जा कर अपना परिचय दिया ..प्रबंधकों ने उसकी मुलाकात सुश्री चंद्रप्रभा जी से करवाई..रेवती ने उनका नाम काफी सुन रखा था स्थानीय समाचार पत्रों में उनका नाम प्राय: तीसरे दिन किसी ना किसी कार्यक्रम के सम्बन्ध में आता ही रहता था ..कभी कभी उनकी लिखी कहानिया और कवितायेँ भी रविवासरीय परिशिष्ट में उसने पढ़ी थी .उनको अपने सामने देख वह अभिभूत हो उठी और उनके व्यक्तित्व से बेहद प्रभावित..स्नेह से ओतप्रोत उनका चेहरा उसकी सारी घबराहट को दूर कर गया.. चंद्रप्रभा जी ने उससे परिचय का आदान प्रदान किया और उसको उस दिन कार्यक्रम प्रस्तुत करने वाले बाकी कलाकारों से मिलवाया ..१०-१५ मिनट में ही रेवती खुद को वहां का हिस्सा समझने लगी थी..
रेवती का नंबर जब तक आया तब तक उसकी सारी घबराहट आत्मविश्वास में बदल चुकी थी और उसने अपनी पूर्ण क्षमता के साथ ग़ज़ल प्रस्तुत करी..ग़ज़ल के शब्दों में जैसे उसके दिल का दर्द उतर आया था " आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ ..." सभी श्रोता उसके गायन में इतना डूब गए की हर किसी की आँखें नम थी ..
चंद्रप्रभा जी ने तो स्टेज से उतरते ही उसे गले से लगा लिया और कहा " कहाँ छुपी थी अब तक तुम ? ॥इतनी मीठी आवाज़ से अभी तक सुरों की दुनिया के प्रशंसकों को महरूम रखा ..." रेवती सकुचा गयी उसने तो कभी सोचा ही नहीं था की इतनी प्रशंसा की हक़दार है वह ...
(क्रमश:)
Saturday, March 27, 2010
है तुझे भी इजाज़त--(दूसरी किस्त)
रेवती कि ज़िन्दगी ने जैसे एक नया मोड़ ले लिया था . जहाँ पहले उसका समय काटे नहीं काटता था अब जैसे हर क्षण चुरा चुरा के अपने लिए जीना चाहती थी.सुबह आँख खुलने के साथ ही स्वयं के साथ समय बिताना शुरू होजाता ..मार्निंग वाक के बाद हल्का फुल्का योगा करके स्नेहा को स्कूल भेजती ..नौकरी ,क्यूंकि पहले समय काटने का एक साधन थी इसलिए अब उसने उसे छोड़ दिया ..उसके बाद घर के रोज़मर्रा के कामों से निवृत हो लाइब्रेरी चली जाती..कुछ पत्रिकाएँ उलटती पलटती और कुछ अपने मन कि पुस्तकें ले आती घर पर पढने के लिए ..शाम को स्नेहा के साथ समय बिताना उसे बहुत पसंद था..एक सितार ले आई थी वह और उस पर सुरों की साधना करना उसे खूब भाता था ..दिन प्रति दिन रियाज़ करने से गले में माधुर्य बढ़ता जा रहा था ..ज़िन्दगी को जैसे एक दिशा मिल गयी थी.. संजय का अस्तित्व उन दोनों के लिए बस एक नाम का ही रह गया था.. संजय भी उनसे मानसिक या भावनात्मक रूप से जुड़ा नहीं पाता था खुद को..उन लोगों को पैसे भेज कर ही जैसे उसके कर्त्तव्य की इतिश्री हो जाती थी..पहले जहाँ उसके साल में २ चक्कर भारत के लगते थे अब वो १ ही चक्कर तक सिमट कर रह गया था .रेवती ने सुना था कि संजय वहां एक शादीशुदा ज़िन्दगी बसर कर रहा है..पर वो जैसे संजय से निर्लिप्त सी हो गयीथी..एक सामाजिक बंधन के तहत ही सही संजय ने कभी उपेक्षा नहीं की थी उन दोनों की..इसलिए रेवती ने भी उससे कभी कुछ पूछने की ज़रुरत नहीं समझी..भारत आना भी महज एक खानापूर्ति सी रह गया था..ना स्नेहा को इंतज़ार होता था पिता का ना रेवती को पति का.. हाँ स्नेहा की उपलब्धियों को संजय बहुत गर्व से अपने नाम करा ले जाता था..दसवीं के बोर्ड में पूरे देश में प्रथम स्थान प्राप्त करने वाली स्नेहा के पिता होने का गौरव उसने खूब भुनाया था .."आखिर बेटी किसकी है "..परन्तु वहीं जब स्नेहा ने दैनिक समाचारपत्र को दिए गए अपने interview में अपनी इस उपलब्धि का श्रेय माँ को दिया तो रेवती भीग उठी .सबकी नज़रें बचा कर उसने आँखों की कोरों पर छलक आये आँसुओं को पोंछ लिया ..स्नेहा ने अपनी दिशा चुन रखी थी.. उसे भारतीय प्रशासनिक सेवा में जाना था और उसके लिए वो पूरी तरह तैयार थी ..देश विदेश की ख़बरों के बारे में अपडेट रहना ..देश की राजनीतिक उथलपुथल ..किसी भी विषय पर उसके अपने विचार और उनको कहने की क्षमता उसमें विकसित हो रहीथी..इसमें भी रेवती उसका खूब साथ देती थी ..दोनों दो सहेलियों की तरह आपस में बहस करती ..स्नेहा की दुनिया माँ तक और माँ की दुनिया स्नेहा तक ..बारहवीं की परीक्षा में भी स्नेहा ने देश में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया ..परन्तु अब उसके जीवन को गतिमय रखने के लिए उसे किसी अच्छे कॉलेज में एडमिशन लेना था और उसके लिए उसे रेवती से दूर होना था ..मन बैठा जा रहा था रेवती का ..पर ये तो होना ही था ..स्नेहा ने दिल्ली के लेडी श्री रामकालेज में एडमिशन ले लिया ..और अपने जीवन लक्ष्य को साधने में जुट गयी..रेवती की ज़िन्दगी में जैसे एक ठहराव आ गया ..वह ज़िन्दगी जो अब तक स्नेहा को केंद्र बना कर उसके इर्दगिर्द घूमती थी जैसे केन्द्र्हीन सी महसूस करने लगी खुद को..ना उसका पढने में मन लगता ना स्वर साधना में ..स्नेहा माँ के लिए चिंतित होने लगी थी..उससे हमेशा फ़ोन पर संपर्क बनाये रखती उसको प्रोत्साहित करती लाइब्रेरी जाने को लोगों से मिलने जुलनेको..रेवती भी चाहती थी स्वयं को और जानना समझना .. पर एक उदासी सी घिरती जा रही थी उसके मन पर..
अचानक एक दिन स्थानीय समाचारपत्र में एक संगीत संध्या के बारे में खबर पढ़ी ..उसमें आवाहन था स्थानीय कलाकारों को सामने आ कर अपनी प्रतिभा की पहचान कराने का मौका देने का .रेवती ने सोच लिया की उसे इस उदासी को झटक देना है नहीं हारेगी वो इन नकारत्मक विचारों के सामने.. स्नेहा नज़रों से ही तो दूर हुई है.. मेरी आत्मा में समायी हुई वो किस तरह दूर हो सकती है मुझसे.. और मुझे इस तरह दुखी देख कर क्या वो खुश रह पाएगी ..दृढ निश्चय कर रेवती ने उस समाचार में दिए हुए नंबर पर फ़ोन किया और रजिस्ट्रेशन की डिटेल्स ले कर अगले ही दिन जा कर रजिस्ट्रेशन करवा आई ..और डुबो दिया खुद को उस कार्यक्रम के लिए तैयार होने में ..फिर से ज़िन्दगी को कुछ दिन के लिए ही सही दिशा मिल गयी थी ...
(क्रमश:) ..
अचानक एक दिन स्थानीय समाचारपत्र में एक संगीत संध्या के बारे में खबर पढ़ी ..उसमें आवाहन था स्थानीय कलाकारों को सामने आ कर अपनी प्रतिभा की पहचान कराने का मौका देने का .रेवती ने सोच लिया की उसे इस उदासी को झटक देना है नहीं हारेगी वो इन नकारत्मक विचारों के सामने.. स्नेहा नज़रों से ही तो दूर हुई है.. मेरी आत्मा में समायी हुई वो किस तरह दूर हो सकती है मुझसे.. और मुझे इस तरह दुखी देख कर क्या वो खुश रह पाएगी ..दृढ निश्चय कर रेवती ने उस समाचार में दिए हुए नंबर पर फ़ोन किया और रजिस्ट्रेशन की डिटेल्स ले कर अगले ही दिन जा कर रजिस्ट्रेशन करवा आई ..और डुबो दिया खुद को उस कार्यक्रम के लिए तैयार होने में ..फिर से ज़िन्दगी को कुछ दिन के लिए ही सही दिशा मिल गयी थी ...
(क्रमश:) ..
Friday, March 26, 2010
है तुझे भी इजाज़त..(प्रथम किस्त)
शहनाई की धीमी पड़ती आवाज़ को पीछे छोड़ती हुई रेवती, थके क़दमों से ड्राइंग रूम में सोफे पर आ कर निढाल सी पड़ गयी.. शादी की भागदौड़ में पिछले एक महीने की व्यस्तता की थकन मानो आज ही उसके पोर पोर में समा गयी थी ..स्नेहा के विदा होते ही जैसे एक विराट शून्य सा भर गया उसकी ज़िन्दगी में ..उसके विदा होने से पहले यत्न से रोके गए आंसू अब उसका कहा नहीं मान रहे थे.. और पलकों की सीमाएं तोड़ कर बह निकले थे...पर बहते आँसुओं में एक सुकून का एहसास था ..बेटी से जुदा होने के ग़म के साथ साथ उसको एक खुशहाल और सुदृढ़ ज़िन्दगी देने का सुकून और मुंदती पलकों के साथ रेवती अतीत में खो गयी ...
उसकी पढाई पूरी होते ना होते माता पिता की पसंद संजय उसको पसंद कर गए थे ..उसको ये जानने समझने का मौका भी नहीं मिला कि उसकी पसंद क्या है..अच्छा खानदान ,पक्की नौकरी करते संजय,रेपुटेड यूनिवर्सिटी से हासिल ऍम.बी.ए की डिग्री, एक विवाह योग्य लड़की के लिए इससे ज्यादा और क्या देखना होता है सम्बन्ध जोड़ते समय ? तो सम्बन्ध जुड़ गया.. परिवारों में पहले व्यक्तियों में बाद में और जुड़ा भी या नहीं कहा नहीं जा सकता संजय सहृदय इंसान थे पर बहुत व्यावहारिक भी और रेवती भावुक..कहीं कोई कोना रिक्त रह गया मन का .. पर नए जीवन की शुरुआत में उसका ध्यान नहीं गया ..व्यवहारिक विवाह के मापदंडों पर उनका विवाह १०० प्रतिशत खरा उतरता था ..कोई कमी दृष्टिगोचर हो तो वो किसी से कहे भी पर मन का उल्लास जैसे उमगने से पहले ही रेत पर पड़ी पानी की बूंदों की भांति मन में ही रह जाता था ..एक आदर्श पत्नी,बहु,भाभी सभी के मापदंडों पर खरी उतरती रेवती खुद को कहीं भूलती जा रही थी .. संजय और उसके विवाह के ४ वर्ष के पश्चात् स्नेहा का जन्म हुआ था .रुई के फाहे सी सफ़ेद गोलमटोल नेही को बाँहों में ले कर रेवती पूर्ण हो उठी थी ..हर पल उसकी निगाह टिकी रहती नेही पर ..उसका सोते में मुस्कुराना उसका आँखें खोल इधर उधर देखना..उसका सबसे पहले नज़रें मिलने पर मुस्कुरा कर पहचान होने का सन्देश देना..कोई भी क्षण वो अनदेखा नहीं छोड़ना चाहती थी.. नेही ने कब खुद पलटना शुरू किया कब बैठना, कब खुद खड़े होना ,कब अन्न का पहला दाना खाया , कब उसने ग्लास से दूध पियाया कब उसने पहला शब्द बोला..सब क्षण रेवती ने क़ैद कर लिए थे डायरी में..इन नन्हे क्षणों को संजय से बांटना चाहती थी पर संजय अपनी दुनिया में मशगूल शुष्कता से कह देते थे की बड़ी होगी तो सब कुछ सीखेगी ही इतना नया क्या है इसमें ..धीरे धीरे रेवती की दुनिया जैसे स्नेहा के इर्द गिर्द सिमट गयी थी उसकी चुलबुली शरारतें उसकी तोतली भाषा में कविता सुनाना ..रेवती तो सौ सौ जान निहाल हो जाती उस पर.. बुद्धि की तेज़ स्नेहा २ वर्ष की उम्र में ही सैकड़ों कवितायेँ सुना देती थी..और रेवती की महत्वाकांक्षा जुड़ गयी स्नेहा से..उसको स्कूल में भरती करने के साथ ही उसको प्रथम स्थान पर देखने की महत्वाकांक्षा ..स्नेहा ने भी उसे निराश नहीं किया परन्तु आज रेवती को खुद से ग्लानि होती है..क्यूँ डाल दिया था उसने नन्ही सी जान पर अपनी महत्वकांक्षाओं का बोझ..रेवती को अच्छी तरह याद है जब प्रथम कक्षा में भारत के प्रथम राष्ट्रपति का नाम स्नेहा पंडित जवाहरलाल नेहरू लिख कर आई थी तो कितना झिड़का था उसने बेचारी को..मासूम स्नेहा निशब्द देखती रह गयी थी माँ को.. ४९ मार्क्स का जो पेपर वो सही करके आई थी उसके लिए माँ ने उसकी प्रशंसा नहीं की अपितु १ मार्क के लिए लानत मलानत कर रही है..स्नेहा के चेहरे के वो खिसियाये हुए भाव रेवती की आँखों में आज भी ताज़ा हैं..क्यूँ माँ बाप बच्चों को इतना बाँध देते हैं मार्क्स लाने के लिए ..संजय घर की दुनिया से बेपरवाह रहते थे..ऑफिस में उनका रुतबा, दिन पर दिन प्रोन्नति उनको रेवती और स्नेहा से काटती जा रही थी ..स्नेहा की बालसुलभ हरकतें संजय को परेशान कर जाती और वो झिड़क बैठते थे उसे ..और मासूम नेही सहम जाती थी ..पिता के घर में रहते हुए किताबों में घुसी रहती वहीं माँ के सामने चंचल बातूनी गुडिया बन जाती कैरियर को ऊंचाइयों तक पहुँचाने का जूनून संजय को बाहर देशों में नौकरी ढूँढने को प्रेरित करता था जबकि रेवती संतुष्ट प्रवृति की महिला थी पैसे से ज्यादा मन की शांति और परिवार की ख़ुशी उसके लिए अहमियत रखती थी ..धीरे धीरे संजय और रेवती के प्लेन्स अलग अलग होने लगे..घर का माहौल ना बिगड़े इसके लिए दोनों के वैचारिक संवाद बंद से हो गए ..वैसे भी संजय वैचारिक मामलों में रेवती को निकृष्ट ही समझते थे और दोनों ने सो काल्ड स्पेस के नाम पर एक दूसरे के मामलों में हस्तक्षेप करना बंद कर दिया. रेवती ने स्नेहा को परवरिश देने में अपने संस्कार अपने अनुभव और ज़िन्दगी के प्रति अपनी समझ का भरपूर प्रयोग किया और स्नेहा उत्तरोतर बढ़ती हुई कक्षा ७ में थी जब संजय ने आबुधाबी के किसी बैंक में अपनी नौकरी पक्की हो जाने का ऐलान किया रेवती और स्नेहा को जल्द ही अपने पास बुला लेने का वादा कर वह पैसा कमाने चला गया .रेवती ने समय काटने के लिए स्नेहा के स्कूल में ही शिक्षिका की नौकरी कर ली..अब दोनों माँ बेटी पूरे समय साथ रहती ..समय बीतता गया संजय उन दोनों को वहां बुला नहीं पाया कभी कुछ कभी कुछ अड़चन आती ही रही ..साल में दो बार भारत आता भी तो स्टॉक मार्केट,इन्वेस्टमेंट्स, रियल एस्टेट..इन सब में ही उलझा रहता रेवती उसके बिना घर और बाहर दोनों में सामंजस्य कैसे बिठा रही है या उसकी भावनात्मक ज़रूरतों की तरफ उसका ध्यान नहीं जाता ..खुद की शारीरिक ज़रूरतें पूरी करने का साधन रेवती बन जाती जिससे रेवती के मन में वितृष्णा भर जाती थी..मन से जुड़े बिना तन जोड़ने की वैवाहिक मजबूरी रेवती को कभी रास नहीं आई और उसकी ये वितृष्णा संजय को उससे शारीरिक रूप से भी दूर करती गयी..स्नेहा कैशौर्यावस्था की दहलीज पर अपनी उम्र से ज्यादा समझदार थी .माँ के मन का खाली कोना उसे समझ आने लगा था ..एक दिन रेवती की पुरानी डायरी स्नेहा के हाथ लग गयी जिसमें ना जाने कितने गीत और गजलें रेवती ने इक्कठे किये हुए थे ..उसने माँ से पूछा कि क्या वो गाती है? रेवती ने कहा गाया करती थी..शादी के बाद तो कभी मौका ही नहीं मिला ..उससे पहले उसने २ साल का लाइट वोकल का कोर्स किया था ..तभी ये सब गजलें इक्कठी करी थी..स्नेहा ने जिद करके उससे कुछ गजलें सुनी..इतने साल बाद गाते हुए शुरू में रेवती को झिझक हुई पर फिर सुर गले से हो कर हृदय में उतरने लगे और उन सुरों में रेवती का मन डूबने उतरने लगा ..कैसे भूल बैठी वो खुद को....स्नेहा तो मंत्रमुग्ध सी उसे सुन रही थी उसकी माँ का ये रूप उसने जाना ही कब था.. वो क्षण उसे रेवती के बहुत करीब ले आये माँ बेटी से ऊपर उठकर एक अलग सा सम्बन्ध स्थापित हो गया दोनों में ..अब उसने खोद खोद कर माँ से उसकी पसंद नापसंद के बारे में जानना शुरू किया ..और ये जान कर कि माँ को पढने का शौक है पास की एक लाइब्रेरी में उसको रजिस्टर करवा दिया..रेवती अपनी बेटी की परिपक्वता देख कर हैरान थी ..सोच नहीं पा रही थी कि ये १४ वर्षीय लड़की उसके मन को कैसे समझ पा रही है..स्नेहा की ज़रूरतों का ध्यान उसे रहता है क्यूंकि उसने जन्म दिया है उसे..उसके लहू के एक एक कतरे को समझती है वह ..पर ये नन्ही सी जान..उसके मन को समझने लगी है..सोच कर प्यार से भर उठती रेवती ..
(क्रमश:) .... ..
उसकी पढाई पूरी होते ना होते माता पिता की पसंद संजय उसको पसंद कर गए थे ..उसको ये जानने समझने का मौका भी नहीं मिला कि उसकी पसंद क्या है..अच्छा खानदान ,पक्की नौकरी करते संजय,रेपुटेड यूनिवर्सिटी से हासिल ऍम.बी.ए की डिग्री, एक विवाह योग्य लड़की के लिए इससे ज्यादा और क्या देखना होता है सम्बन्ध जोड़ते समय ? तो सम्बन्ध जुड़ गया.. परिवारों में पहले व्यक्तियों में बाद में और जुड़ा भी या नहीं कहा नहीं जा सकता संजय सहृदय इंसान थे पर बहुत व्यावहारिक भी और रेवती भावुक..कहीं कोई कोना रिक्त रह गया मन का .. पर नए जीवन की शुरुआत में उसका ध्यान नहीं गया ..व्यवहारिक विवाह के मापदंडों पर उनका विवाह १०० प्रतिशत खरा उतरता था ..कोई कमी दृष्टिगोचर हो तो वो किसी से कहे भी पर मन का उल्लास जैसे उमगने से पहले ही रेत पर पड़ी पानी की बूंदों की भांति मन में ही रह जाता था ..एक आदर्श पत्नी,बहु,भाभी सभी के मापदंडों पर खरी उतरती रेवती खुद को कहीं भूलती जा रही थी .. संजय और उसके विवाह के ४ वर्ष के पश्चात् स्नेहा का जन्म हुआ था .रुई के फाहे सी सफ़ेद गोलमटोल नेही को बाँहों में ले कर रेवती पूर्ण हो उठी थी ..हर पल उसकी निगाह टिकी रहती नेही पर ..उसका सोते में मुस्कुराना उसका आँखें खोल इधर उधर देखना..उसका सबसे पहले नज़रें मिलने पर मुस्कुरा कर पहचान होने का सन्देश देना..कोई भी क्षण वो अनदेखा नहीं छोड़ना चाहती थी.. नेही ने कब खुद पलटना शुरू किया कब बैठना, कब खुद खड़े होना ,कब अन्न का पहला दाना खाया , कब उसने ग्लास से दूध पियाया कब उसने पहला शब्द बोला..सब क्षण रेवती ने क़ैद कर लिए थे डायरी में..इन नन्हे क्षणों को संजय से बांटना चाहती थी पर संजय अपनी दुनिया में मशगूल शुष्कता से कह देते थे की बड़ी होगी तो सब कुछ सीखेगी ही इतना नया क्या है इसमें ..धीरे धीरे रेवती की दुनिया जैसे स्नेहा के इर्द गिर्द सिमट गयी थी उसकी चुलबुली शरारतें उसकी तोतली भाषा में कविता सुनाना ..रेवती तो सौ सौ जान निहाल हो जाती उस पर.. बुद्धि की तेज़ स्नेहा २ वर्ष की उम्र में ही सैकड़ों कवितायेँ सुना देती थी..और रेवती की महत्वाकांक्षा जुड़ गयी स्नेहा से..उसको स्कूल में भरती करने के साथ ही उसको प्रथम स्थान पर देखने की महत्वाकांक्षा ..स्नेहा ने भी उसे निराश नहीं किया परन्तु आज रेवती को खुद से ग्लानि होती है..क्यूँ डाल दिया था उसने नन्ही सी जान पर अपनी महत्वकांक्षाओं का बोझ..रेवती को अच्छी तरह याद है जब प्रथम कक्षा में भारत के प्रथम राष्ट्रपति का नाम स्नेहा पंडित जवाहरलाल नेहरू लिख कर आई थी तो कितना झिड़का था उसने बेचारी को..मासूम स्नेहा निशब्द देखती रह गयी थी माँ को.. ४९ मार्क्स का जो पेपर वो सही करके आई थी उसके लिए माँ ने उसकी प्रशंसा नहीं की अपितु १ मार्क के लिए लानत मलानत कर रही है..स्नेहा के चेहरे के वो खिसियाये हुए भाव रेवती की आँखों में आज भी ताज़ा हैं..क्यूँ माँ बाप बच्चों को इतना बाँध देते हैं मार्क्स लाने के लिए ..संजय घर की दुनिया से बेपरवाह रहते थे..ऑफिस में उनका रुतबा, दिन पर दिन प्रोन्नति उनको रेवती और स्नेहा से काटती जा रही थी ..स्नेहा की बालसुलभ हरकतें संजय को परेशान कर जाती और वो झिड़क बैठते थे उसे ..और मासूम नेही सहम जाती थी ..पिता के घर में रहते हुए किताबों में घुसी रहती वहीं माँ के सामने चंचल बातूनी गुडिया बन जाती कैरियर को ऊंचाइयों तक पहुँचाने का जूनून संजय को बाहर देशों में नौकरी ढूँढने को प्रेरित करता था जबकि रेवती संतुष्ट प्रवृति की महिला थी पैसे से ज्यादा मन की शांति और परिवार की ख़ुशी उसके लिए अहमियत रखती थी ..धीरे धीरे संजय और रेवती के प्लेन्स अलग अलग होने लगे..घर का माहौल ना बिगड़े इसके लिए दोनों के वैचारिक संवाद बंद से हो गए ..वैसे भी संजय वैचारिक मामलों में रेवती को निकृष्ट ही समझते थे और दोनों ने सो काल्ड स्पेस के नाम पर एक दूसरे के मामलों में हस्तक्षेप करना बंद कर दिया. रेवती ने स्नेहा को परवरिश देने में अपने संस्कार अपने अनुभव और ज़िन्दगी के प्रति अपनी समझ का भरपूर प्रयोग किया और स्नेहा उत्तरोतर बढ़ती हुई कक्षा ७ में थी जब संजय ने आबुधाबी के किसी बैंक में अपनी नौकरी पक्की हो जाने का ऐलान किया रेवती और स्नेहा को जल्द ही अपने पास बुला लेने का वादा कर वह पैसा कमाने चला गया .रेवती ने समय काटने के लिए स्नेहा के स्कूल में ही शिक्षिका की नौकरी कर ली..अब दोनों माँ बेटी पूरे समय साथ रहती ..समय बीतता गया संजय उन दोनों को वहां बुला नहीं पाया कभी कुछ कभी कुछ अड़चन आती ही रही ..साल में दो बार भारत आता भी तो स्टॉक मार्केट,इन्वेस्टमेंट्स, रियल एस्टेट..इन सब में ही उलझा रहता रेवती उसके बिना घर और बाहर दोनों में सामंजस्य कैसे बिठा रही है या उसकी भावनात्मक ज़रूरतों की तरफ उसका ध्यान नहीं जाता ..खुद की शारीरिक ज़रूरतें पूरी करने का साधन रेवती बन जाती जिससे रेवती के मन में वितृष्णा भर जाती थी..मन से जुड़े बिना तन जोड़ने की वैवाहिक मजबूरी रेवती को कभी रास नहीं आई और उसकी ये वितृष्णा संजय को उससे शारीरिक रूप से भी दूर करती गयी..स्नेहा कैशौर्यावस्था की दहलीज पर अपनी उम्र से ज्यादा समझदार थी .माँ के मन का खाली कोना उसे समझ आने लगा था ..एक दिन रेवती की पुरानी डायरी स्नेहा के हाथ लग गयी जिसमें ना जाने कितने गीत और गजलें रेवती ने इक्कठे किये हुए थे ..उसने माँ से पूछा कि क्या वो गाती है? रेवती ने कहा गाया करती थी..शादी के बाद तो कभी मौका ही नहीं मिला ..उससे पहले उसने २ साल का लाइट वोकल का कोर्स किया था ..तभी ये सब गजलें इक्कठी करी थी..स्नेहा ने जिद करके उससे कुछ गजलें सुनी..इतने साल बाद गाते हुए शुरू में रेवती को झिझक हुई पर फिर सुर गले से हो कर हृदय में उतरने लगे और उन सुरों में रेवती का मन डूबने उतरने लगा ..कैसे भूल बैठी वो खुद को....स्नेहा तो मंत्रमुग्ध सी उसे सुन रही थी उसकी माँ का ये रूप उसने जाना ही कब था.. वो क्षण उसे रेवती के बहुत करीब ले आये माँ बेटी से ऊपर उठकर एक अलग सा सम्बन्ध स्थापित हो गया दोनों में ..अब उसने खोद खोद कर माँ से उसकी पसंद नापसंद के बारे में जानना शुरू किया ..और ये जान कर कि माँ को पढने का शौक है पास की एक लाइब्रेरी में उसको रजिस्टर करवा दिया..रेवती अपनी बेटी की परिपक्वता देख कर हैरान थी ..सोच नहीं पा रही थी कि ये १४ वर्षीय लड़की उसके मन को कैसे समझ पा रही है..स्नेहा की ज़रूरतों का ध्यान उसे रहता है क्यूंकि उसने जन्म दिया है उसे..उसके लहू के एक एक कतरे को समझती है वह ..पर ये नन्ही सी जान..उसके मन को समझने लगी है..सोच कर प्यार से भर उठती रेवती ..
(क्रमश:) .... ..
Friday, February 19, 2010
वह अजनबी -
"जब भी ये दिल उदास होता है .." गाना बज रहा था ऍफ़ एम पर और रिया महसूस कर रही थी एक उदासी को जो पसर रही थी उसके मन में .एक आत्मीय जिसको उसने कभी देखा नहीं, उसे खो देने का एहसास भारी कर दे रहा था उसके मन को, आत्मा को..उलझ गयी थी रिश्तों के तानोबानो में.. सोचें ३ साल पहले की उस रोंग नंबर कल पर जा रुकी जिसने उसे एक ऐसे रिश्ते से जोड़ दिया था जिसका कोई नाम नहीं था ..एक अजनबी अचानक उसकी ज़िन्दगी में आया और दुनियावी रिश्तों से परे एहसास के रिश्ते का आभास करा कर चला गया ..
यादों की परतें खुलने लगी ..रिया को वो सब याद आने लगा जो कहीं उसके मन की गहराई में दबा पड़ा था ..वो शख्सियत जिसको उसने कभी अहमियत नहीं दी थी, आज अचानक उसी के लिए वो आंसू बहाएगी... यह उसने कभी सोचा तक नहीं था ..
"राज"..यही नाम बताया था उसने जब पहली बार गलती से फ़ोन मिल गया था ..और उसके बाद उसकी ओर से दोस्ती की पेशकश.. और रिया का ये कह कर ख़ारिज कर देना की वो अजनबियों से दोस्ती नहीं करती ..फिर उसका बार बार कॉल करके ये विश्वास दिलाना की वो खुद को अजनबी नहीं महसूस करता ..धीरे धीरे रिया के दिल में एक कोमल भाव उत्पन्न कर गया उसके लिए.. रिया संवेदनशील थी.. भावनाओ को समझने वाली पर खुद में बहुत पारदर्शी भी ..अपनी भावनाओं को भी अच्छी तरह जानने वाली ..राज ने उसे एकतरफा प्रेम किया और रिया ने उसकी भावनाओ का सम्मान किया ..इससे ज्यादा दोनों के बीच कोई रिश्ता नहीं था ..रिया ने उसे स्नेह करुणा.ममत्व दिया पर प्रेम वो उसे नहीं दे सकी.
दोनों में सबसे बड़ा अंतर जीवन के प्रति प्रेम का ही था ॥राज की हर बात में मायूसी झलकती थी तो रिया की हरबात में जीवन जीने की उमंग ..राज की दुनिया जैसे रिया तक सिमट कर रह गयी थी.. अपने जीवन का हर दुःख वो उससे बाँट लेना चाहता था ..और रिया सुनती रहती थी .. तभी उसने ये जाना की वो एक अच्छी श्रोता भी है..अभी तक उसे एक अनियंत्रित वक्ता के रूप में सब चिढाते थे ..पर संवेदनाओं से भरा उसका मन राज को उसके अंतस में भरे अवसाद को बहाने के लिए एक श्रोता बना चुका था ।आधे आधे घंटे वो बिना एक शब्द बोले राज को सुनती रहती थी ..राज को उसका साथ ..तपती दोपहर में ठंडी छाँव सा लगता था ..प्रेम को तरसता उसका मन रिया से उम्मीद लगा बैठा था प्रेम की.
पर प्रेम सोच समझ के तो होता नहीं..वो तो बस घटित हो जाता है.. और रिया के मन में करुणा थी पर प्रेम का कोई स्पंदन उसे महसूस नहीं होता था .. और यूँ राज का एकतरफा प्रेम खुद राज के लिए जीने की उमंग बन चुका था उसने रिया से बेशर्त प्यार किया था ..उसने सिर्फ इतना चाहा था कि वो रिया से बात करता रह सके..और प्रेम का सम्मान करने वाली रिया ने भी उसे निराश नहीं किया ..और फिर अचानक उसके फ़ोन आने बंद हो गए.. कुछ दिन यह सब रिया के खयाल में रहा फिर वो उसे भी एक सपना समझ भूलने लगी..दुनिया में ऐसे कितने लोग होते हैं जो समय काटने की खातिर ऐसे प्रेम का इज़हार करते हैं..रिया इस बात पर यकीन करना चाहती थी की राज भी उन्ही में से एक था..पर उसका दिल नहीं मानता था..करीब ६ महीने बीत गए थे कि अचानक एक दिन फिर किसी अजनबी नंबर से फ़ोन कॉल आई ..और फ़ोन करने वाला कोई और नहीं राज था ..रिया तो लगभग भूल चुकी थी उसे..कुछ रहस्यमय सा लगा उस रोज़ राज उसे.. एक नयी जिद पकड़ ली थी उसने .. मिलना है .. सामने बैठ कर बात करनी है.. और रिया सामाजिक बन्धनों में जकड़ी.. साफ़ मना कर बैठी..आत्मिक जुडाव होना अलग बातहै..पर मिलना जुलना किसी अजनबी से.. ये तो उसके संस्कारों में नहीं था ..उस समय तक वह नहीं जान पायी थी कि इस जहाँ में कौन अजनबी है और कौन आत्मीय..सब कुछ तो परिभाषाओं के तहत झूठ ही हो जाता है ...और राज का यूँ कहना कि "तुम मिल लो मुझसे वरना बाद में पछताओगी "..उसे एक गर्वौन्मत कथन लग रहा था उसने भी बड़े गर्व से कह डाला था, "नहीं,मैं कभी मिलना नहीं चाहूंगी तुमसे.."
उसके बाद राज के फ़ोन अक्सर ३-४ महीने के अंतराल पर आने लगे॥रिया पूछती थी कि वह कहाँ है? उसकाजवाब होता, किसी दूर-दराज़ इलाके में हूँ, वहां फ़ोन नहीं है जब शहर आता हूँ तो दोस्त के फ़ोन से बात करता हूँ.. रहस्यमय सी बातें और साथ साथ ये कि तुम हर पल साथ होती हो..मुझे जीवन जीने का हौसला देती हो.. तुम्हें देखता रहता हूँ ...रिया ने पूछा देखते रहते हो ..कैसे?? तो राज ने कहा " लाल बोर्डर कि पीली साड़ी ..माथे पे गोल बड़ी बिंदी और खुले बाल ..एक दम देवी का स्वरुप "
भीग जाता था रिया का मन.. राज के पवित्र एहसासों पर ..वो उसे समझाना चाहती थी कि ये उसके स्वयं के एहसास हैं.. उसमें रिया का कुछ भी नहीं.. पर राज कि कोमल भावनाओं को क्षति पहुंचाए बिना ये वो उसे नहीं समझा सकती थी ..धीरे धीर रिया ने सब समय पर छोड़ दिया था ..ऐसे ही करीब १.३० साल बीत गया .. हर ३-४ महीने में राज का फ़ोन आता और वो उससे मिलने कि गुजारिश करता ..और मना कर देने पर एक ही बात कि एक दिन आएगा जब तुम मिलना चाहोगी और मैं नहीं मिलूँगा "..
सोचते सोचते रिया कि आँखों से आंसू झर रहे थे ... राज के कहे हुए शब्द गूँज रहे थे उसके कानो में, उसके अंतर्मन में....कहा करता था वो " तुम्हारी हंसी मुर्दों में भी जान डाल सकती है ".... झूठ !!.. झूठ कहता था वो.. कहाँ डाल पायी वो जान एक जिंदा इंसान के भी एहसासों में.. पल पल टूटता रहा वो और एहसास भी नहीं होने दिया ..रिया को अपनी सारी जीवन्तता झूठ लगने लगी.. उसकी तस्वीर को सामने रख वो किसी एकांत स्थल पर जूझता रहा ब्रेनट्यूमर से अकेले ..इस कोशिश में कि जाने से पहले इतना कमा जाए कि उसके परिवार को कोई परेशानी ना हो ..उसका परिवार ..जिसमें एक अपने में डूबी पत्नी और दो छोटे बच्चे .. जिनके लिए वो जीना चाहता था ..पत्नी के लिए उसने रिया को बताया था कि बहुत प्रक्टिकल है..भावनाएं किसी के लिए भी नहीं है यहाँ तक कि उसके अपने माता पिता के लिए भी नहीं.. और राज .. ज़रुरत से ज्यादा भावुक इंसान.. कभी कभी लगता है इश्वर के घर से जोड़ियाँ कैसे बन के आती हैं? इन्ही को शायद ऋण बंधन कहते हैं ...
रिया को याद है कि एक बार जब उसके यही कहने पर कि मैं नहीं मिलूँगा जब तुम चाहोगी..वो उससे जिद कर बैठीथी कि ऐसा क्यूँ कह रहे हो..तब उसने बताया था कि पिछले २ साल से वो इसीलिए भाग रहा है.. ज़िन्दगी बहुत कम बची है ..जितनी बची है उसे उसके बाद जीने वालों के आराम के लिए इस्तेमाल कर रहा है
स्तब्ध रह गयी थी रिया ॥उसी पल उसने सोच लिया था कि चाहे कुछ भी हो इस जाने वाले इंसान कि एक दिली इच्छा तो वो पूरी कर ही सकती है.. वो उससे मिलेगी ..चाहे उसे संस्कारों को छोड़ना पड़े ..समाज के नियमों को तोडना पड़े..पर एक ऐसे इंसान कि इच्छा वो ज़रूर पूरी करेगी जिसने उसे निस्वार्थ प्रेम किया है ..और उसने उससे कहा कि अगली बार वो जब भी अपने शहर आये तो उसे बता दे वो कोशिश करेगी उससे मिलने आने की।
पर सोच को हकीकत में बदलना एक भरे पूरे घर की जिम्मेदार गृहणी के बस में नहीं होता .. दुनियावी रिश्ते कभीकभी आत्मीय रिश्तों की राह में बाधा बन जाते हैं..समय बीतता गया ..हर ३-४ महीने में राज का एक छोटा सा कॉल आ जाता था ..उसकी बीमारी अब खुल कर सामने आ चुकी थी .परिवार वाले हर संभव कोशिश कर रहे थे उसके इलाज की.आर्थिक ,सामाजिक जो भी सहारा उसे अपने दुनियावी रिश्तों से मिल सकता था वो मिल रहा था पर एक भावुक इंसान को जो मानसिक सहारा चाहिए वो उसे नहीं मिल पा रहा था और उसी की चाह में वो किसी भी तरह रिया को फ़ोन करता था . और एक दिन उसने कहा कि जब ये कॉल भी आना बंद हो जाए तो जान लेना की मैं अब दुनिया में नहीं हूँ...टीस सी होती थी रिया के दिल में ..लेकिन बस उसी समय तक जब तक उससे बात होती थी.. उसके बाद रिया अपनी दुनिया में मस्त हो जाती थी.. सोचते सोचते रिया को खुद से नाराज़गी सी होने लगी.. "सहानुभूति के तौर पर भी तू क्यूँ नहीं सोच पायी उसके बारे में कितनी खुदगर्ज़ हो गयी थी .." जैसे रिया कि आत्मा उसे धिक्कार रही हो सामने खड़ी.. " बहुत खुशनुमा बनती है .. सब कहते हैं हर समय हंसती रहती है ..क्या कर पायी तू उसके लिए .. बीमारी तो एक बहाना थी.. तूने उसे इतना भी साथ नहीं दिया कि वो बाहर आ पाए उस अवसाद से जिसमें घिर कर उसने आत्महत्या जैसा कदम उठा लिया " ...फूट फूट कर रो पड़ी रिया .....उसके इलाज के लिए USA जाने का पता उसके दोस्त के द्वारा लगा था रिया भी दोस्त के मार्फ़त उसके हाल चाल पूछ कर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ लेती थी
लौट के आने के बाद एक बार राज से बात हुई ।उसने बताया की एअरपोर्ट से बाहर आते ही मेरे दोस्त ने सबसे पहली न्यूज़ ये दी की तुम्हारा अक्सर फ़ोन आता रहा इस बीच मेरे बारे में पूछने को॥ कितनी ख़ुशी झलक रही थी उसकी आवाज़ में ..उसी से रिया ने उसके रेगिस्तान से तपते मन का अंदाज़ा लगा लिया की उसकी करुणा की कुछ फुहारें भी राज के मन को कितना शीतल कर गयी.. उसने पूछा की कैसा लगा ये जानना ..तो राज ने कहा -" मुझे उम्मीद थी की तुमने पूछा होगा ..इतना तो जानता हूँ तुम्हें.."
रिया को राज ने बताया की उसे ब्रेन ट्यूमर का अटैक कभी भी आ जाता है इसलिए वो अपने साथ फ़ोन नहीं रख सकता ..और जब कभी उसका दोस्त उससे मिलने आता है और वो अकेले होते हैं तभी वो कॉल कर सकता है.. धीरेधीरे ठीक हो रहा है.. कुछ दिनों में ऑफिस ज्वाइन कर लेगा ..ख़ुशी हुई रिया को जान कर .. उसके लिए मन से दुआ करी और फिर वक़्त गुजरने लगा अपनी गति से..पिछले ६ महीने से राज कि कोई खबर नहीं थी और इस बार जब उसने दोस्त को कॉल किया तो पता चला कि राज तो चला गया ...संभावित सूचना थी इसलिए रिया को धक्का तो नहीं लगा ..बस उसने इतना कहा लेकिन वो तो ठीक हो रहा था ना..ट्रीटमेंट के बाद .. तो दोस्त ने बताया कि उसने तो suicide कर लिया... रिया पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा हो.. ऐसा क्या हुआ ..इतना बड़ा कदम उफ़ !!!!!
जो सुना उसको सुन कर उसे दुनियावी रिश्तों के खोखलेपन पर विरक्ति सी हो आई.क्यूँ परिभाषाओं के सामने भावनाएं गौण हो जाती हैं..राज के मन को उसके साथ रहने वाले क्यूँ जान नहीं पाए ...राज के दोस्त ने बताया कि उसकी तबियत को ले कर परिवार वाले उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते थे .अकेले से पड़ गए थे वो .उनको लगने लगा था कि मैं अब किसी के काम का नहीं रहा ..बोझ बन गया हूँ सब पर.. तो जब जाना ही है तो कुछ दिन महीने या साल का इंतज़ार क्यूँ करूँ.. सबको मुक्ति दे दूँ इस अनचाहे बोझ से.. और एक दिन उन्होंने फंदा लगा केअपनी जीवन लीला समाप्त कर दी......"
........स्तब्ध सी रिया ..कुछ बोल भी नहीं पायी.. सुन्न सी बैठी रह गयी.. उसे यकीन नहीं हुआ कि उसके जीवन से जुड़ा कोई इंसान इतना कमजोर भी हो सकता है .. सबसे ज्यादा गुस्सा उसे खुद पे आया .. क्या कर पाई वो उसके लिए.. क्यूँ भेजा था इश्वर ने उसकी ज़िन्दगी में उसे.. वो उसकी एक छोटी सी इच्छा भी तो पूरी नहीं कर पायी इतनी सक्षम भी नहीं हो पायी कि कुछ हँसते हुए पल किसी मरते हुए इंसान कि झोली में डाल दे.. और आंसू बहते रहे ..उस इंसान के लिए जिसके प्रेम को उसने कभी अहमियत नहीं दी.. आज उसकी वही आवाज़ गूँज रही थी कानों में " तुम मुझसे मिलना चाहोगी और मैं नहीं मिलूँगा "
और जिस इंसान को उसने कभी देखा भी नहीं था .ज़हन कि दीवारों पर उसकी एक परछाई सी उभर आई ॥साक्षात्मोहब्बत का अक्स हो जैसे..
और रिया बुदबुदा उठी.. " मैं तो तुमको कुछ नहीं दे पायी राज ..पर तुम मुझे सिखा गए कि प्रेम क्या होता है तुम्हारी पाक मोहब्बत को दिल से दुआ देती हूँ.. जहाँ हो .. खुश रहो.. और उस निस्वार्थ प्रेम को अपनी रूह में बसाकर फिर दुनिया में आओ.. और इस दुनिया को प्रेम करना सिखाओ.. परिभाषाओं से ऊपर उठ कर प्यार किसे कहते हैं ये तुम्ही से जाना ..जीवन का एक अध्याय पढ़ा गए तुम ..और मेरे दिल में अपने लिए एक कोना सुरक्षित कर ही लिया तुमने.. आखिर अपनी जिद के पक्के निकले ना " कहते कहते रिया रोते रोते भी मुस्कुरा पड़ी...और अब रिया जब भी हंसती है तो ये वाक्य गूँज जाता है उसके कानो में " तुम्हारी हंसी मुर्दों में भी जान डाल सकती है " ........
काश ये सच होता !!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!!
वह अजनबी उसे मुहब्बत का पहला सबक सिखा गया था... , .. .. " .. " .. ...
यादों की परतें खुलने लगी ..रिया को वो सब याद आने लगा जो कहीं उसके मन की गहराई में दबा पड़ा था ..वो शख्सियत जिसको उसने कभी अहमियत नहीं दी थी, आज अचानक उसी के लिए वो आंसू बहाएगी... यह उसने कभी सोचा तक नहीं था ..
"राज"..यही नाम बताया था उसने जब पहली बार गलती से फ़ोन मिल गया था ..और उसके बाद उसकी ओर से दोस्ती की पेशकश.. और रिया का ये कह कर ख़ारिज कर देना की वो अजनबियों से दोस्ती नहीं करती ..फिर उसका बार बार कॉल करके ये विश्वास दिलाना की वो खुद को अजनबी नहीं महसूस करता ..धीरे धीरे रिया के दिल में एक कोमल भाव उत्पन्न कर गया उसके लिए.. रिया संवेदनशील थी.. भावनाओ को समझने वाली पर खुद में बहुत पारदर्शी भी ..अपनी भावनाओं को भी अच्छी तरह जानने वाली ..राज ने उसे एकतरफा प्रेम किया और रिया ने उसकी भावनाओ का सम्मान किया ..इससे ज्यादा दोनों के बीच कोई रिश्ता नहीं था ..रिया ने उसे स्नेह करुणा.ममत्व दिया पर प्रेम वो उसे नहीं दे सकी.
दोनों में सबसे बड़ा अंतर जीवन के प्रति प्रेम का ही था ॥राज की हर बात में मायूसी झलकती थी तो रिया की हरबात में जीवन जीने की उमंग ..राज की दुनिया जैसे रिया तक सिमट कर रह गयी थी.. अपने जीवन का हर दुःख वो उससे बाँट लेना चाहता था ..और रिया सुनती रहती थी .. तभी उसने ये जाना की वो एक अच्छी श्रोता भी है..अभी तक उसे एक अनियंत्रित वक्ता के रूप में सब चिढाते थे ..पर संवेदनाओं से भरा उसका मन राज को उसके अंतस में भरे अवसाद को बहाने के लिए एक श्रोता बना चुका था ।आधे आधे घंटे वो बिना एक शब्द बोले राज को सुनती रहती थी ..राज को उसका साथ ..तपती दोपहर में ठंडी छाँव सा लगता था ..प्रेम को तरसता उसका मन रिया से उम्मीद लगा बैठा था प्रेम की.
पर प्रेम सोच समझ के तो होता नहीं..वो तो बस घटित हो जाता है.. और रिया के मन में करुणा थी पर प्रेम का कोई स्पंदन उसे महसूस नहीं होता था .. और यूँ राज का एकतरफा प्रेम खुद राज के लिए जीने की उमंग बन चुका था उसने रिया से बेशर्त प्यार किया था ..उसने सिर्फ इतना चाहा था कि वो रिया से बात करता रह सके..और प्रेम का सम्मान करने वाली रिया ने भी उसे निराश नहीं किया ..और फिर अचानक उसके फ़ोन आने बंद हो गए.. कुछ दिन यह सब रिया के खयाल में रहा फिर वो उसे भी एक सपना समझ भूलने लगी..दुनिया में ऐसे कितने लोग होते हैं जो समय काटने की खातिर ऐसे प्रेम का इज़हार करते हैं..रिया इस बात पर यकीन करना चाहती थी की राज भी उन्ही में से एक था..पर उसका दिल नहीं मानता था..करीब ६ महीने बीत गए थे कि अचानक एक दिन फिर किसी अजनबी नंबर से फ़ोन कॉल आई ..और फ़ोन करने वाला कोई और नहीं राज था ..रिया तो लगभग भूल चुकी थी उसे..कुछ रहस्यमय सा लगा उस रोज़ राज उसे.. एक नयी जिद पकड़ ली थी उसने .. मिलना है .. सामने बैठ कर बात करनी है.. और रिया सामाजिक बन्धनों में जकड़ी.. साफ़ मना कर बैठी..आत्मिक जुडाव होना अलग बातहै..पर मिलना जुलना किसी अजनबी से.. ये तो उसके संस्कारों में नहीं था ..उस समय तक वह नहीं जान पायी थी कि इस जहाँ में कौन अजनबी है और कौन आत्मीय..सब कुछ तो परिभाषाओं के तहत झूठ ही हो जाता है ...और राज का यूँ कहना कि "तुम मिल लो मुझसे वरना बाद में पछताओगी "..उसे एक गर्वौन्मत कथन लग रहा था उसने भी बड़े गर्व से कह डाला था, "नहीं,मैं कभी मिलना नहीं चाहूंगी तुमसे.."
उसके बाद राज के फ़ोन अक्सर ३-४ महीने के अंतराल पर आने लगे॥रिया पूछती थी कि वह कहाँ है? उसकाजवाब होता, किसी दूर-दराज़ इलाके में हूँ, वहां फ़ोन नहीं है जब शहर आता हूँ तो दोस्त के फ़ोन से बात करता हूँ.. रहस्यमय सी बातें और साथ साथ ये कि तुम हर पल साथ होती हो..मुझे जीवन जीने का हौसला देती हो.. तुम्हें देखता रहता हूँ ...रिया ने पूछा देखते रहते हो ..कैसे?? तो राज ने कहा " लाल बोर्डर कि पीली साड़ी ..माथे पे गोल बड़ी बिंदी और खुले बाल ..एक दम देवी का स्वरुप "
भीग जाता था रिया का मन.. राज के पवित्र एहसासों पर ..वो उसे समझाना चाहती थी कि ये उसके स्वयं के एहसास हैं.. उसमें रिया का कुछ भी नहीं.. पर राज कि कोमल भावनाओं को क्षति पहुंचाए बिना ये वो उसे नहीं समझा सकती थी ..धीरे धीर रिया ने सब समय पर छोड़ दिया था ..ऐसे ही करीब १.३० साल बीत गया .. हर ३-४ महीने में राज का फ़ोन आता और वो उससे मिलने कि गुजारिश करता ..और मना कर देने पर एक ही बात कि एक दिन आएगा जब तुम मिलना चाहोगी और मैं नहीं मिलूँगा "..
सोचते सोचते रिया कि आँखों से आंसू झर रहे थे ... राज के कहे हुए शब्द गूँज रहे थे उसके कानो में, उसके अंतर्मन में....कहा करता था वो " तुम्हारी हंसी मुर्दों में भी जान डाल सकती है ".... झूठ !!.. झूठ कहता था वो.. कहाँ डाल पायी वो जान एक जिंदा इंसान के भी एहसासों में.. पल पल टूटता रहा वो और एहसास भी नहीं होने दिया ..रिया को अपनी सारी जीवन्तता झूठ लगने लगी.. उसकी तस्वीर को सामने रख वो किसी एकांत स्थल पर जूझता रहा ब्रेनट्यूमर से अकेले ..इस कोशिश में कि जाने से पहले इतना कमा जाए कि उसके परिवार को कोई परेशानी ना हो ..उसका परिवार ..जिसमें एक अपने में डूबी पत्नी और दो छोटे बच्चे .. जिनके लिए वो जीना चाहता था ..पत्नी के लिए उसने रिया को बताया था कि बहुत प्रक्टिकल है..भावनाएं किसी के लिए भी नहीं है यहाँ तक कि उसके अपने माता पिता के लिए भी नहीं.. और राज .. ज़रुरत से ज्यादा भावुक इंसान.. कभी कभी लगता है इश्वर के घर से जोड़ियाँ कैसे बन के आती हैं? इन्ही को शायद ऋण बंधन कहते हैं ...
रिया को याद है कि एक बार जब उसके यही कहने पर कि मैं नहीं मिलूँगा जब तुम चाहोगी..वो उससे जिद कर बैठीथी कि ऐसा क्यूँ कह रहे हो..तब उसने बताया था कि पिछले २ साल से वो इसीलिए भाग रहा है.. ज़िन्दगी बहुत कम बची है ..जितनी बची है उसे उसके बाद जीने वालों के आराम के लिए इस्तेमाल कर रहा है
स्तब्ध रह गयी थी रिया ॥उसी पल उसने सोच लिया था कि चाहे कुछ भी हो इस जाने वाले इंसान कि एक दिली इच्छा तो वो पूरी कर ही सकती है.. वो उससे मिलेगी ..चाहे उसे संस्कारों को छोड़ना पड़े ..समाज के नियमों को तोडना पड़े..पर एक ऐसे इंसान कि इच्छा वो ज़रूर पूरी करेगी जिसने उसे निस्वार्थ प्रेम किया है ..और उसने उससे कहा कि अगली बार वो जब भी अपने शहर आये तो उसे बता दे वो कोशिश करेगी उससे मिलने आने की।
पर सोच को हकीकत में बदलना एक भरे पूरे घर की जिम्मेदार गृहणी के बस में नहीं होता .. दुनियावी रिश्ते कभीकभी आत्मीय रिश्तों की राह में बाधा बन जाते हैं..समय बीतता गया ..हर ३-४ महीने में राज का एक छोटा सा कॉल आ जाता था ..उसकी बीमारी अब खुल कर सामने आ चुकी थी .परिवार वाले हर संभव कोशिश कर रहे थे उसके इलाज की.आर्थिक ,सामाजिक जो भी सहारा उसे अपने दुनियावी रिश्तों से मिल सकता था वो मिल रहा था पर एक भावुक इंसान को जो मानसिक सहारा चाहिए वो उसे नहीं मिल पा रहा था और उसी की चाह में वो किसी भी तरह रिया को फ़ोन करता था . और एक दिन उसने कहा कि जब ये कॉल भी आना बंद हो जाए तो जान लेना की मैं अब दुनिया में नहीं हूँ...टीस सी होती थी रिया के दिल में ..लेकिन बस उसी समय तक जब तक उससे बात होती थी.. उसके बाद रिया अपनी दुनिया में मस्त हो जाती थी.. सोचते सोचते रिया को खुद से नाराज़गी सी होने लगी.. "सहानुभूति के तौर पर भी तू क्यूँ नहीं सोच पायी उसके बारे में कितनी खुदगर्ज़ हो गयी थी .." जैसे रिया कि आत्मा उसे धिक्कार रही हो सामने खड़ी.. " बहुत खुशनुमा बनती है .. सब कहते हैं हर समय हंसती रहती है ..क्या कर पायी तू उसके लिए .. बीमारी तो एक बहाना थी.. तूने उसे इतना भी साथ नहीं दिया कि वो बाहर आ पाए उस अवसाद से जिसमें घिर कर उसने आत्महत्या जैसा कदम उठा लिया " ...फूट फूट कर रो पड़ी रिया .....उसके इलाज के लिए USA जाने का पता उसके दोस्त के द्वारा लगा था रिया भी दोस्त के मार्फ़त उसके हाल चाल पूछ कर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री समझ लेती थी
लौट के आने के बाद एक बार राज से बात हुई ।उसने बताया की एअरपोर्ट से बाहर आते ही मेरे दोस्त ने सबसे पहली न्यूज़ ये दी की तुम्हारा अक्सर फ़ोन आता रहा इस बीच मेरे बारे में पूछने को॥ कितनी ख़ुशी झलक रही थी उसकी आवाज़ में ..उसी से रिया ने उसके रेगिस्तान से तपते मन का अंदाज़ा लगा लिया की उसकी करुणा की कुछ फुहारें भी राज के मन को कितना शीतल कर गयी.. उसने पूछा की कैसा लगा ये जानना ..तो राज ने कहा -" मुझे उम्मीद थी की तुमने पूछा होगा ..इतना तो जानता हूँ तुम्हें.."
रिया को राज ने बताया की उसे ब्रेन ट्यूमर का अटैक कभी भी आ जाता है इसलिए वो अपने साथ फ़ोन नहीं रख सकता ..और जब कभी उसका दोस्त उससे मिलने आता है और वो अकेले होते हैं तभी वो कॉल कर सकता है.. धीरेधीरे ठीक हो रहा है.. कुछ दिनों में ऑफिस ज्वाइन कर लेगा ..ख़ुशी हुई रिया को जान कर .. उसके लिए मन से दुआ करी और फिर वक़्त गुजरने लगा अपनी गति से..पिछले ६ महीने से राज कि कोई खबर नहीं थी और इस बार जब उसने दोस्त को कॉल किया तो पता चला कि राज तो चला गया ...संभावित सूचना थी इसलिए रिया को धक्का तो नहीं लगा ..बस उसने इतना कहा लेकिन वो तो ठीक हो रहा था ना..ट्रीटमेंट के बाद .. तो दोस्त ने बताया कि उसने तो suicide कर लिया... रिया पर जैसे पहाड़ टूट पड़ा हो.. ऐसा क्या हुआ ..इतना बड़ा कदम उफ़ !!!!!
जो सुना उसको सुन कर उसे दुनियावी रिश्तों के खोखलेपन पर विरक्ति सी हो आई.क्यूँ परिभाषाओं के सामने भावनाएं गौण हो जाती हैं..राज के मन को उसके साथ रहने वाले क्यूँ जान नहीं पाए ...राज के दोस्त ने बताया कि उसकी तबियत को ले कर परिवार वाले उसके साथ अच्छा व्यवहार नहीं करते थे .अकेले से पड़ गए थे वो .उनको लगने लगा था कि मैं अब किसी के काम का नहीं रहा ..बोझ बन गया हूँ सब पर.. तो जब जाना ही है तो कुछ दिन महीने या साल का इंतज़ार क्यूँ करूँ.. सबको मुक्ति दे दूँ इस अनचाहे बोझ से.. और एक दिन उन्होंने फंदा लगा केअपनी जीवन लीला समाप्त कर दी......"
........स्तब्ध सी रिया ..कुछ बोल भी नहीं पायी.. सुन्न सी बैठी रह गयी.. उसे यकीन नहीं हुआ कि उसके जीवन से जुड़ा कोई इंसान इतना कमजोर भी हो सकता है .. सबसे ज्यादा गुस्सा उसे खुद पे आया .. क्या कर पाई वो उसके लिए.. क्यूँ भेजा था इश्वर ने उसकी ज़िन्दगी में उसे.. वो उसकी एक छोटी सी इच्छा भी तो पूरी नहीं कर पायी इतनी सक्षम भी नहीं हो पायी कि कुछ हँसते हुए पल किसी मरते हुए इंसान कि झोली में डाल दे.. और आंसू बहते रहे ..उस इंसान के लिए जिसके प्रेम को उसने कभी अहमियत नहीं दी.. आज उसकी वही आवाज़ गूँज रही थी कानों में " तुम मुझसे मिलना चाहोगी और मैं नहीं मिलूँगा "
और जिस इंसान को उसने कभी देखा भी नहीं था .ज़हन कि दीवारों पर उसकी एक परछाई सी उभर आई ॥साक्षात्मोहब्बत का अक्स हो जैसे..
और रिया बुदबुदा उठी.. " मैं तो तुमको कुछ नहीं दे पायी राज ..पर तुम मुझे सिखा गए कि प्रेम क्या होता है तुम्हारी पाक मोहब्बत को दिल से दुआ देती हूँ.. जहाँ हो .. खुश रहो.. और उस निस्वार्थ प्रेम को अपनी रूह में बसाकर फिर दुनिया में आओ.. और इस दुनिया को प्रेम करना सिखाओ.. परिभाषाओं से ऊपर उठ कर प्यार किसे कहते हैं ये तुम्ही से जाना ..जीवन का एक अध्याय पढ़ा गए तुम ..और मेरे दिल में अपने लिए एक कोना सुरक्षित कर ही लिया तुमने.. आखिर अपनी जिद के पक्के निकले ना " कहते कहते रिया रोते रोते भी मुस्कुरा पड़ी...और अब रिया जब भी हंसती है तो ये वाक्य गूँज जाता है उसके कानो में " तुम्हारी हंसी मुर्दों में भी जान डाल सकती है " ........
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